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सिनेमा की सोच और उसका सच
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Classic Tales

हालीवुड ने शख्सियतों एवं जीवनियों पर अनेक फिल्में बनाई हैं । महात्मा गांधी से लेकर नेपोलियन और फिर महारानी एलिजाबेथ के जीवन को परदे पर लाने का दुर्लभ साहस किया । इतिहास से प्रेरित होकर अनुकरणीय कहानियों को याद करने की ख्याति उनके पास है । हिन्दी सिनेमा ने भी ऐतिहासिक कहानियों पर बहुत सी फिल्म
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आमिर खान की पीके हमारी मान्यताओ को लेकर एक एलियन किस हिसाब से सोंचेगा. जवाब की तलाश में बनी लाजवाब हांस्य व्यंग्य फ़िल्म थी. महाकरोड़ क्लब की हालिया फिल्मो की तुलना में आमिर की फ़िल्म आपको निराशा नहीं करेगी..हालांकि वो भी इसी क्लब की बन गई. अजीबोगरीब एलियन वाली यह फ़िल्म इंसानों की दुनिया की बात कर
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गुरुदत्त की 1957 में आई फिल्म प्यासा मानवीय रिश्तों और उनकी निरर्थकता की बात करने वाली दुनिया की सबसे सशक्त फिल्मों में से एक है। बाजी, जाल, आर-पार और सीआईडी जैसी थ्रिलर और मिस्टर एंड मिसेज 55 जैसी हास्य फिल्म के बाद आई यह फिल्म गुरुदत्त के कैरियर ग्राफ को पूरी तरह से बदल देती है और उन्हें भारत के
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छलिया तीन मुख्य व दो सहायक किरदारों वाली एक त्रिकोणीय कहानी थी। मनमोहन देसाई की लोकप्रिय फिल्मों की तुलना में उनकी यह पहली फिल्म सीमित किरदारों की कहानी थी। छलिया में समकालीन दशक की आत्मा थी। इसमें कथा व कथन को सर्वाधिक महत्व मिला। फिल्म में अति नाटकीयता को जगह नहीं मिली व हास्य प्रसंग भी हवा की
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शेक्सपियर की रचनाओं पर फिल्में बनाने में विशाल भारद्वाज के अग्रसर गुलजार थे। आपने बार्ड की कृति ‘comedy of Errors’ पर ‘अंगूर’ जैसी फिल्म बनाई । समरूपी पहचान के शिकार दो जुडवाओं की कहानी के साथ मूल रचना को शानदार तरीके से अपनाया गया। परिस्थिति से उपजी जबरदस्त कामेडी । पटकथा की गतिशीलता अदाकारी में
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13 फरवरी 1975 को गुलज़ार निर्देशित आंधी भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई…प्रदर्शन से पहले ही उस वक्त ये गहरे विवाद से गुजरी …हल्ला उठा कि ये फिल्म उस वक्त भारत की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित थी…दक्षिण भारत में लगे फिलम के पोस्टर में तो ये तक लिखा था “See your Prime Minister
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"वफाओं के बदले जफा कर रिया है, मैं क्या कर रिया हूँ तू क्या कर रिया है", ताँगेवाले के सुनाए गए इसी शेर में एम.एस. सथ्यु की कालजयी फिल्म 'गर्म हवा' का पूरा सार है। यह कहानी है सलीम मिर्ज़ा की जो चमड़े के जूते का एक कारखाना चलाते हैं और अभी हाल ही में भारत पाकिस्तान के हुए बँटवारे के बाद एक-एक करके
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बारह लोग, एक कमरा, एक बड़ी सी सेंटर टेबल और बारह कुर्सियाँ, सिर्फ इतने कलाकारों से एक शानदार और बांधने वाली फिल्म बन सकती है, ये सोचना भी असहज कर देता है लेकिन बासु चटर्जी की 'एक रुका हुआ फैसला' कुछ ऐसा ही करती है और एक संदेश यह भी देती है की रीमेक बनने औए उसका देसीकरण करने का भी एक शास्त्रीय अंदाज
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