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Movie Review Barot House : अनछुए विषय पर बेहतरीन थ्रिलर

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फिल्म – बारोट हाउस ( Barot House )

रेटिंग – ****/5 


Zee 5 की फिल्म ‘Barot House’ बहुत ही कसी हुई…थ्रिल और इमोशन से भरपूर एक बढ़िया कहानी है जो 1 घंटे 35 मिनट में कहीं भी अपनी पकड़ सब्जेक्ट से छूटने नहीं देती..सबसे कमाल की बात ये है कि ये कहानी आपको अंदाजा लगाने की पूरी छूट देती है..लेखक और निर्देशक चाहते भी हैं कि आप कहानी में पूरी तरह दाखिल हों और जितना हो सके उतनी रिजनिंग करें इसका निचोड़ निकालने के लिए..हो सकता है आपका अंदाजा सही भी हो जाए लेकिन आपके तर्क से परे ये फिल्म जो बात स्थापित करती है वो आपको हैरान कर देता है..

ये कहानी है बारोट हाउस की जिसका मुखिया अमित बारोट यानि अमित सद है..उसकी पत्नी है भावना यानि मंजरी फडनिस..घर में उसकी मां है…छोटा भाई रहता है और 4 बच्चे हैं…मल्हार, श्रेया और श्रुति और एक बच्ची गोद में है..एक दिन घर में जश्न का माहौल होता है और उसी दिन घर की एक बेटी श्रुति गायब हो जाती है..अगले दिन उसकी लाश एक कब्रिस्तान में मिलती है…अमित का शक उसके पड़ोसी एंथनी पर जाता है क्योंकि उससे उसका कुछ विवाद है..एक दिन एक और बच्ची घर में ही मरी मिलती है..मौके पर भाई मौजूद होता है तो पुलिस उसे पकड़ लेती है…लेकिन इन सबके बीच एक दिन पड़ोसी की बच्ची भी मरी हुई मिलती है ..तो सबकी समझ से परे हो जाता है ये पता करना कि आखिर खूनी कौन है क्योंकि बाकी दोनों आरोपी तो पुलिस के रडार पर होते हैं..अब असल कातिल और उसके कत्ल के मकसद पर ये फिल्म घूमती रहती है और इसके साथ ही कई सतहों पर परिवार की अंदरुनी खींचतान..संबंधों और कई और पहलुओं पर फिल्म आपको सफर कराती है जो आपके दिमाग में कई तरह की थ्योरी को जन्म देते हैं..इन्ही थ्योरी में से एक थ्योरी आपकी सही भी साबित होगी मगर उस थ्योरी के पीछे जो आप सोच रहे हैं वैसा कुछ नहीं होगा यहीं आपको फिल्म चैलेंज कर देती है,..लेखक संजीव के झा की लिखी बारोट हाउस बहुत मजूबूत वेब फिल्म है..जिसे डायरेक्टर बग्स भार्गव कृष्णा ने कमाल का पेश किया है..भार्गव ने गोवा के माहौल में ये कहानी सेट की है जो फिल्म को अलग मूड, लुक एंड फील देता है..फिल्म पूरी तरह से परफॉर्मैंस ओरिएंटेड है तो जाहिर है इसकी कास्टिंग पर बात होनी चाहिए…एक्टिंग की बात करें तो अमित सद एक पिता का दुख उसका गुस्सा..परिवार की उलझनों में घिरे एक डिप्रेस्ड दबाव से जूझ रहे शख्स का हाव भाव उसकी रवैया बखूबी पेश कर पाए हैं  ..खासकर उनके चलने, बोलने, बैठने, झल्लाने ये सारे मैनरिज्म से आप सीधा जुड़ जाते हैं..मंजरी फडनिस ने भी बहुत ही बढ़िया काम किया है…एक मां जिसकी बच्चियां ऐसे अनायास मर रही हों उसकी मनोदशा क्या होगी वो देखकर आप का दिल पसीज जाता है..लेकिन फिल्म की जान हैं छोटे बच्चे मल्हार का किरदार करने वाले कलाकार आर्यन मेंघजी…इस किरदार को संजीव ने जिस तरीके से लिखा है उससे कई गुना आगे जाकर आर्यन ने जिया है…इस किरदार की सबसे जरूरी बात है इसकी बेफिक्री और मल्हार ने वो बेफिक्री इतनी नैचुरली पेश की है कि मंझे हुए अभिनेता ऐसे भाव नहीं पेश कर पाते..फिल्म की सिनेमैटोग्राफी..प्रोडक्शन डिजाइन और एडिटिंग सभी शानदार हैं..
मेरी तरफ से इस फिल्म को पांच में 4 स्टार्स.. 

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