शेक्सपियर की रचनाओं पर फिल्में बनाने में विशाल भारद्वाज के अग्रसर गुलजार थे। आपने बार्ड की कृति ‘comedy of Errors’ पर ‘अंगूर’ जैसी फिल्म बनाई । समरूपी पहचान के शिकार दो जुडवाओं की कहानी के साथ मूल रचना को शानदार तरीके से अपनाया गया। परिस्थिति से उपजी जबरदस्त कामेडी । पटकथा की गतिशीलता अदाकारी में भी नजर आती है। हालांकि गीतों की खास जरूरत नहीं लगी फिर भी कथा की लय पर खास असर नहीं पडा। कहानी तिलक दम्पत्ति (उत्पल दत्त व शम्मी) के जुडवा संतानों (अशोक) तथा जुडवा पोशपालक (बहादुर) की दिलचस्प हालातों को बयान करती है। फर्क ना बताने की गरज से मां-बाप ने अपने बच्चों का एक नाम रखा । जुडवाओं को अलग अलग कपडे में रखने से हालांकि उलझन को तोडा जा सकता था। एक बार तिलक दंपत्ति छुटटी बिताने सफर पर निकले। उस दरम्यान एक जगह ठहरे। इत्तेफाक से वहां उन्हें बेसहारे जुडवा बच्चों की बात पता चली । मंदिर में मिले इन बच्चों को वो अपना बना लेते हैं। इन दोनों का नाम बहादुर रखा जाता है। सफर जारी करते हुए दंपत्ति आगे चले। तुफान ने उनके जहाज को घेर लिया। भीषण तूफान में राजतिलक व उनकी पत्नी एक-एक अशोक व बहादुर लेकर बिछ्ड गए। सुविधा के लिए यह समीक्षक इन दो जुडवा जोडे बच्चों का नाम अशोक एक व अशोक दो तथा बहादुर एक व बहादुर दो रख रहा है। वक्त गुजरा… एक जुडवा अशोक एक एवं बहादुर एक (संजीव कुमार तथा देवन वर्मा) दीनकपुर निवासी गंगाप्रसाद के जिम्मे पल कर बडे हुए हैं। गंगाप्रसाद के परिवार में सुधा (मौसमी चटर्जी ) एवं तनु (दीप्ति नवल) की दो लडकियां हैं। गंगाप्रसाद ने बडी बेटी सुधा की अशोक एक (संजीव कुमार) से शादी कर दी है। जबकि बहादुर एक (देवन वर्मा) घर में कामकाज करने वाली प्रेमा ( अरूणा ईरानी) से विवाहित है। घर की देखरेख में यह अशोक एवं सुधा तथा अविवाहित तनु के सहायक हैं। सुधा का विवाहित जीवन शक की मार से पीडित था। बाहरी लडकी अलका से नाजायज रिश्तों के शक में सुधा पति से बराबर उलझन में थी।

कहानी के दूसरे छोर पर हमें राजतिलक (उत्पल दत्त) के जिम्मे पले-बढे अशोक दो (संजीव कुमार) व बहादुर दो (देवन वर्मा ) से मिलाया जाता है। बिजनेस का एक लाख रूपया लेकर दोनों दीनकपुर के सफर पर निकले हुए हैं। अशोक दो सामान्य से अधिक स्तर के कल्पनाएं रखने वाला शख्स था। वहीं उसका दोस्त बहादुर दो बिलकुल अपने बिछ्डे जुडवा की तरह अटल वफादार था । हालांकि भांग की लत का शिकार भी । अशोक दो का मानसिक उन्माद साथ लगे रूपए के कारण थोडा ज्यादा बदतरीन हो जाता है। दीनकपुर का स्टेशन मास्टर व स्थानीय टेक्सी चालक अशोक दो व बहादुर दो को गलत रूप से अशोक एक व बहादुर एक मानकर रूपए लूटे जाने का डर मन में बिठा देते हैं। अशोक इन लोगों को किसी गैंग का सदस्य मान बैठा था। दूसरी ओर सुधा ने पति (अशोक एक ) को नेकलस लाने की ताकीद दी थी। उसने जौहरी छेदीलाल को हार बनाने के लिए ताकीद दे दी थी …लेकिन उनका वर्कर मंसूर (युनुस परवेज) जेवर बनाने में काफी देर कर रहा। हार मिलने में देरी की वजह से सुधा पति पर हार पराई अलका को थमा देने का इल्जाम लगा रही। हालात को समझदार तनु किसी तरह संभाले हुए है। अशोक दो एक लाख बचाने के लिए खुद को इंपीरियल होटल के कमरे में बंद कर लेता है। कमरे के बाहर बहादुर (देवन वर्मा) को बिठाकर…प्रीतम आन मिलो गाना गुनगुनाने वाले पर ही दरवाजा खोलने की ताकीद दी थी। वहीं दूसरी ओर अशोक एक सुधा के हार बारे में जौहरी से सवाल करता है। छेदीलाल ने कहा कि अभी देर लगेगी क्योंकि हार अभी बनकर तैयार नहीं हुआ था । हार में लगने वाले हीरे का सपलायर रूपया मांग रहा था। अशोक से कहा गया कि रूपया पहले अदा कर दे। अशोक भी अडिग था कि हार मिलने पर रूपया देगा। हार शाम तक मिलने का वायदा उसे दिया जाता है। देर शाम तक उसे हार नहीं मिला था..

अशोक दो बिजनेस के सिलसिले में आदमी से मिलकर वापसी के लिए बस स्टाप पर चला गया। रास्ते में शहर के बाज़ार पर रूका …यहां पर बहादुर दो भी प्रेमा (अरूणा ईरानी) के लिए खरीददारी कर रहा था। अशोक को वहां देखकर वो अचरज पड गया। दोनों एक दुसरे को देखकर उलझन में थे. दोनों पास आए…अशोक दो को सिगरेट जलाता देख बहादुर एक को हैरानी हुई क्योंकि अशोक एक अब से पहले सिगरेट का नशा नहीं करता था। जुडवा होने कारण दरअसल वो अशोक दो को अशोक एक मान रहा था। वहीं अशोक एक भी बहादुर को वहां देखकर हैरत में था…क्योंकि तय अनुसार बहादुर को इंपीरियल होटल के कमरे में रखे रूपए की हिफाजत करनी थी । दोनों में कुछ देर बात हुई। फिर अपनी अपनी बात लेकर अलग दिशाओं में चले गए—अशोक दो बहादुर को वहां देखकर अचम्भे व क्रोध में था जबकि बहादुर एक यह मन लेकर गया कि वो घर जाकर प्रेमा को बताएगा कि अशोक को सिगरेट की बुरी लत लग गयी है। प्रेमा बहादुर से सुधा को तमाम बातें कह देने के लिए मना लेती है। अशोक के बारे में सुनकर सुधा को पूरा यकीन हो चला कि उसका विवाहित जीवन अधिक दिनों तक टिकने वाला नहीं। बडी बहन की उदासी दूर करने तनु बहादुर एक को अशोक की खोज खबर लाने भेज देती है। तनु नहीं चाहती थी कि नयी मुसीबत की वजह से उसका आज का जरूरी कार्यक्रम रुक जाए …वो बहादुर को अलका के घर से तलाश शुरू करने को कहती है। लेकिन यह कोशिश बेकार रही क्योंकि पत्नी से अनबन होने कारण अशोक उस रोज लेट तक आफिस में पडा था। उस रोज अलका (पदमा) से उसकी मुलाकात नहीं हुई थी। बहादुर प्रेमा को अशोक की बाजार वाली हरकत की शिकायत कर देता है। अशोक के बारे में सुनकर वो काफी अचंभित थी। वो उसे अशोक व सुधा बीच हुई अनबन की बारे में भी बता देता है। अलका के घर से निराश होने बाद बहादुर छेदीलाल के पास जाता है। वहां हीरे का व्यापारी गणेशीलाल छेदीलाल से अपना बकाया मांग रहा था। छेदीलाल गणेशीलाल को अगली सुबह आने को कह टाल रहा… तभी बहादुर एक वहां आकर अशोक का सच उगल देता है। यह सुनकर छेदीलाल उसे अशोक के दफ्तर जाने को कहता है। उसे उम्मीद थी कि अशोक आज रात हार लिए बिना जा ही नहीं सकता। उस शाम तनु का जरूरी कांसर्ट था।

अशोक व बहादुर को देख कर खुशी का ठिकाना नहीं रहा…उसे नहीं मालूम कि यह दोनों वो नहीं जी वह समझ रही थी। कार्यक्रम के समापन बाद वो उन दोनों को बेकस्टेज में बुला भेजती है। अशोक दो के जाने से मना कर देने से बात बढ गयी। तनु ने आपा खोया…बेतरतीब की बहसें हुयीं। इसी बीच स्थानीय पुलिस इंस्पेक्टर सिन्हा भी वहां दाखिल हुआ। अशोक दो को अशोक एक मानकर पुलिस उसे जीप में बिठाकर सुधा के घर ले आई । भ्रम व उलझन का शिकार बहादुर दो भी उनके पीछे चल पड़ा। पति को वापस देखकर सुधा की जान में जान आई। सुधा उसे अपने बेडरूम में ले गयी… अपनी असल पहचान से अशोक दो डरा हुआ था। पीछे आ रहे बहादुर दो को टेक्सी वहां छोड आती है। वो अशोक दो का कोड गीत ‘प्रीतम आन मिलो’ तरकीब याद कर अपने अशोक की पहचान स्थापित करने की कोशिश करता है। लेकिन उसका भ्रम कम नहीं रहा कि प्रेमा भी बहादुर दो को अपना बहादुर मानकर किचन में मदद का आग्रह करती है| जबकि ऊपर कमरे में अशोक ब सुधा से बच निकलने की कोशिश लगा था । सुधा उसे विस्की पिलाने में नाकाम हुई । विस्की इसलिए क्योंकि अशोक एक को नशे में शराब का शौक था। अशोक दो बहादुर दो के सवालों से भी घिरा…बहादुर उसे पकोडा खाने से इसलिए मना कर रहा क्योंकि उसमें भांग मिला था। लेकिन उनमे से से सुधा पकोड़ा खा लेती है। वहीं दूसरे छोर पर अशोक एक एवं बहादुर एक जौहरी की दुकान पर सुधा का हार मिलने का इंतज़ार कर रहे..

.अशोक दो की अशोक एक के परिवार सामने एक नहीं चली… मजबूर होकर शराब ले लेता है। अब वो शराब के नशे में डूब चुका है। वहीं सुधा पर पकोडे में मिले भांग का असर दिखने लगा…नशे की हालत में अशोक दो तनु के कमरे तरफ चला गया। थोडा पकोडा वो तनु को भी खिला देता है। जल्द ही तनु भी बदहोशी की हालत में थी। नीचे सीढी पर बहादुर दो प्रेमा को नशे में लाकर सुला देता है। फिर भाग कर अशोक दो की खोज में ऊपर चला गया। लेकिन अशोक उसे नहीं मिला…परेशान होकर वो भी भांग टोली में शामिल होने चला गया । इसी बीच अशोक एक व बहादुर एक हार लिए बिना वापस घर लौट आ रहे थे। छेदीलाल के वायदे कि जिसमें अगली सुबह हार घर पहुंचा देना रहा..वापस आ रहे थे । दूसरी तरफ होटल दरवाजे पर दस्तक ( अशोक व बहादुर ) को बहादुर दो गैंग का आदमी समझ बैठा है| नगर वालों की ऊलजुलुल हरकतों के लिए इसी गैंग को जिम्मेदार मान रहा था । वो एवं अशोक दो अभी तक यही समझ रहे कि कुछ लोग उनसे उनका रूपया लेने पर तुले हैं। दरवाजे पर खडे लोगों को भगाने के लिए बहादुर दो हास्यास्पद तरीके से कुत्ते की आवाज निकालने लगा। इस तरह अशोक एक तथा बहादुर एक को भी भ्रमित रखने में कामयाब रहा। अशोक एक व बहादुर एक को वहां से भी जाना पड़ा |थक हार कर दोनों अलका के घर आराम करने चले गए।

अगली सुबह अशोक दो व बहादुर दो बेसुध प्रेमा से कमरे की चाभियां लेने में कामयाब हुए। इस तरह वहां से भाग निकल आए। दोनों को भरोसा हो चला कि पूरा शहर उलजुलूल सा हो चला है | यहां उनकी जमापूंजी सुरक्षित नहीं रहेगी…यह भी सोंच लिया। वो रूपया लेकर इंपीरियल होटल की निकल गए । राह में उन्हे छेदीलाल का कारीगर मंसूर मिला। मंसूर से उन्हें हार घर पर पहुंचा देने की बात कहता है। अलका के घर पर आराम करने गए अशोक एक बहादुर को उसके घर से कपडा लाने को कहता है। अपनी पत्नी के बेकार लेकिन परेशान करने वाले शक से डर कर वो उसी वक्त हार लाने के जोहरी छेदीलाल पास निकल गया। आगे क्या होगा ? जब उसे मालूम होगा कि हार पहले ही पहुंचा दिया गया ? अशोक दो आगे क्या करेगा? क्या वो हार लेकर बहादुर दो के साथ शहर से चला जाएगा? सुधा पर क्या गुजरेगी जब उसे पता चलेगा कि पति ने बीती रात पराई औरत के साथ गुजारी ? पति–पत्नी के रिश्ते पर असर नहीं पडेगा ? अब तालाक तय था? उलझन से उलझन को जोडती कहानी एक दिलचस्प समापन को पहुंची ।
