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सिनेमा की सोच और उसका सच
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Classic Tales

कमरुद्दीन आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर है । सन 1953 में शुरू हुई फिल्म सात वर्षों में बनकर पूरी हुई । फ़िल्म की शूटिंग दौरान परदे के पीछे का एक किस्सा
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काशीनाथ सिंह की कृति ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित’ मोहल्ला अस्सी’ को लेकर शुरू से ही उत्सुकता रही थी। ऐसे हालात में जहां पे मुख्यधारा साहित्यिक रचानाओं पर फिल्में बनाने में न के बराबर दिलचस्पी लेती है। वहां पर मोहल्ला अस्सी का बन कर रिलीज़ हो पाना महत्व रखता है।
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गुरुदेव की बहुत मशहूर कहानी है  'काबुलीवाला। '  यह बांग्ला में लिखी गयी थी। लेकिन जब  बिमल राय ने 1961 में इस कहानी को परदे पर उतारा, तो इसकी शोहरत ने भाषा और क्षेत्र सभी की सीमाएं लांघ दी। काबुलीवाले के पात्र से परिचित होना एक नवीन अनुभव विकसित करता है।
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हिन्दी एवं बांग्ला फ़िल्मो के सुपरिचित निर्माता-निर्देशक शक्ति सामंत का जन्म वर्धमान (पश्चिम बंगाल) मे हुआ था। परिवार ने प्रारंभिक शिक्षा हेतु उन्हे देहरादून भेजा | पढाई पूरी कर वापस कलकत्ता (कोलकाता) लौटे और कलकत्ता विश्वविद्यालय के ‘कला संकाय’ मे दाखिला लिया, शक्ति दा मे अपनी मातृभाषा ‘बांग्ला’ के…
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   साल 1964 की बात है एक फिल्म रिलीज हुई ‘यादें’....फिल्म के पोस्टर में केवल सुनील दत्त का ही चेहरा नजर आ रहा था....हालांकि उस पोस्टर में उनके कई तरह से एक्सप्रेशन थे लेकिन उसके अलावा फिल्म की किसी भी और तरह की कोई जानकारी उस पोस्टर पर नहीं थी....      सबसे खास बात ये थी कि उस वक्त से कामयाब…
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वैसे तो बिमल रॉय को 'दो बीघा जमीन' और 'बंदिनी' जैसी फिल्मों के लिए अधिक माना और जाना जाता है लेकिन 1960 में आई 'परख' उनकी सबसे अलग स्वाद वाली फिल्म है जिसमें आजादी के बाद के मोहभंग का उन्होंने इतने व्यंग्यपूर्ण ढंग से चित्रण किया है कि दिल कह उठता है, वाह ये है असली डायरेक्टर जिसकी फिल्में एक दूसरे…
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देश के 1947 में आजाद होने से पहले माहौल कुछ इस तरह का बन गया था कि आजादी मिलते ही देश का कायाकल्प हो जाएगा। भुखमरी, सूखा, बाढ़ और बेरोजगारी हर समस्या का एक ही इलाज नजर आता था आजादी। उम्मीदें बहुत बढ़ गई थीं और उनमें से ज्यादातर झूठी थीं। बेसब्री से आजादी का इंतजार करते लोग जब तक ये समझ पाते कि
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