FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच
Browsing Category

Classic Tales

शेक्सपियर की रचनाओं पर फिल्में बनाने में विशाल भारद्वाज के अग्रसर गुलजार थे। आपने बार्ड की कृति ‘comedy of Errors’ पर ‘अंगूर’ जैसी फिल्म बनाई । समरूपी पहचान के शिकार दो जुडवाओं की कहानी के साथ मूल रचना को शानदार तरीके से अपनाया गया। परिस्थिति से उपजी जबरदस्त कामेडी । पटकथा की गतिशीलता अदाकारी में
Read More...
13 फरवरी 1975 को गुलज़ार निर्देशित आंधी भारतीय सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई…प्रदर्शन से पहले ही उस वक्त ये गहरे विवाद से गुजरी …हल्ला उठा कि ये फिल्म उस वक्त भारत की प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित थी…दक्षिण भारत में लगे फिलम के पोस्टर में तो ये तक लिखा था “See your Prime Minister
Read More...
शोषण के हर रुप का विरोध ज़रूरी है. यह किसी भी रुप में मौजूद हो सकता है.सुजॉय घोष की  'कहानी 2 दुर्गा रानी सिंह' इसी बात को रेखांकित करती फ़िल्म थी. child सेक्सुअल abuse की काली हकीक़त  को फ़िल्म ने बड़ी संजीदगी से लिया सेक्सुअल शोषण पर पर बात करने को बुरा माना जाता है. सौ परदे में रखने से क्या लेकिन सच
Read More...
"वफाओं के बदले जफा कर रिया है, मैं क्या कर रिया हूँ तू क्या कर रिया है", ताँगेवाले के सुनाए गए इसी शेर में एम.एस. सथ्यु की कालजयी फिल्म 'गर्म हवा' का पूरा सार है। यह कहानी है सलीम मिर्ज़ा की जो चमड़े के जूते का एक कारखाना चलाते हैं और अभी हाल ही में भारत पाकिस्तान के हुए बँटवारे के बाद एक-एक करके
Read More...
बारह लोग, एक कमरा, एक बड़ी सी सेंटर टेबल और बारह कुर्सियाँ, सिर्फ इतने कलाकारों से एक शानदार और बांधने वाली फिल्म बन सकती है, ये सोचना भी असहज कर देता है लेकिन बासु चटर्जी की 'एक रुका हुआ फैसला' कुछ ऐसा ही करती है और एक संदेश यह भी देती है की रीमेक बनने औए उसका देसीकरण करने का भी एक शास्त्रीय अंदाज
Read More...
बिमल रॉय की दो बीघा जमीन में एक ही जैसा एक दृश्य या परिस्थितियाँ दो बार आती हैं जब किसान शंभू महतो का बेटा कन्हैया एक साथ ढेर सारे पैसे पाता है। पहली बार वह अपने एक पाकेटमार दोस्त की मदद से एक साथ पचास रुपये पाता है और दौड़ता हुआ अपने पिता के पास आता है जो अपनी दो बीघा जमीन बचाने के लिए जमीन आसमान
Read More...
हिंदी सिनेमा में ऐसी कई प्रतिभाएं आई जिन्होंने अपने काम के दम पर नाम को रोशन किया बल्कि दर्शको की यादों में बस गए। कहना होगा कि जाने माने निर्देशक विजय आनंद भी एक ऐसी ही शख्सियत थे। फ़िल्मी गलियारों में विजय 'गोल्डी' नाम से मशहूर थे। विजय आनंद को हिंदी सिनेमा का महान फ़िल्म निर्देशक का गौरव प्राप्त
Read More...
1 जनवरी 1963 को रिलीज़ हुई बंदिनी पर ये लेख जाने माने लेखक-फिल्म निर्देशक विमल चंद्र पाण्डेय ने लिखा है.. कुछ ही फिल्में ऐसी होती हैं जिनके अंत में आप अंत का अंदाजा लगा चुकने के बावजूद सहमे से बैठे उस पल का इंतजार करते रहते हैं जब फिल्म अपने सबसे तनावयुक्त मोड़ पर होती है और किसी भी पल आपकी आह
Read More...