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सिनेमा की सोच और उसका सच
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Classic Tales

देश के 1947 में आजाद होने से पहले माहौल कुछ इस तरह का बन गया था कि आजादी मिलते ही देश का कायाकल्प हो जाएगा। भुखमरी, सूखा, बाढ़ और बेरोजगारी हर समस्या का एक ही इलाज नजर आता था आजादी। उम्मीदें बहुत बढ़ गई थीं और उनमें से ज्यादातर झूठी थीं। बेसब्री से आजादी का इंतजार करते लोग जब तक ये समझ पाते कि
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बॉलीवुड में थ्रिलर फिल्मों की समृद्ध परंपरा नहीं रही है, कुछ फिल्में बीच-बीच में बनी जरूर हैं लेकिन ये सिलसिला लगातार नहीं रहा है। कारण वही रहा है जो हिंदी साहित्य में सिनेमा पर गंभीर लेखन की कमी का रहा है, अच्छे माने जाने वाले निर्देशकों ने प्रायः थ्रिलर और हॉरर फिल्मों को दोयम दर्जे का काम माना
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गुलज़ार की लिखी राकेश ओमप्रकाश मेहरा जैसे बड़े नामों से जुड़ी 'मिर्जिया' दो कहानियां दिखाती है। एक छोर पर पंजाब की लोककथा मिर्जा-साहिबा का युग है। दूसरी कहानी आज के राजस्‍थान के आदिल-सुचि की है। दोनों कहानियों की तक़दीर एक सी है। अफ़सोस सदियों बाद भी मुहब्बत को लेकर परिवार और समाज का रवैया नहीं
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अगर किसी के प्यार की गहराई समझनी हो तो आम तौर पर आप क्या करते हैं ? आपको अपने पार्टनर से प्यार तो है लेकिन कितना है इसका पैमाना सबका अलग-अलग, ज्यादा, कम हो सकता है।लेकिन वो एक बात क्या है जो अगर प्यार के साथ-साथ मिले तो प्यार और बढ़ता जाता है। मैं बताऊं ? वो है केयर यानि एक-दूसरे का ख्याल
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हालीवुड ने शख्सियतों एवं जीवनियों पर अनेक फिल्में बनाई हैं । महात्मा गांधी से लेकर नेपोलियन और फिर महारानी एलिजाबेथ के जीवन को परदे पर लाने का दुर्लभ साहस किया । इतिहास से प्रेरित होकर अनुकरणीय कहानियों को याद करने की ख्याति उनके पास है । हिन्दी सिनेमा ने भी ऐतिहासिक कहानियों पर बहुत सी फिल्म
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आमिर खान की पीके हमारी मान्यताओ को लेकर एक एलियन किस हिसाब से सोंचेगा. जवाब की तलाश में बनी लाजवाब हांस्य व्यंग्य फ़िल्म थी. महाकरोड़ क्लब की हालिया फिल्मो की तुलना में आमिर की फ़िल्म आपको निराशा नहीं करेगी..हालांकि वो भी इसी क्लब की बन गई. अजीबोगरीब एलियन वाली यह फ़िल्म इंसानों की दुनिया की बात कर
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गुरुदत्त की 1957 में आई फिल्म प्यासा मानवीय रिश्तों और उनकी निरर्थकता की बात करने वाली दुनिया की सबसे सशक्त फिल्मों में से एक है। बाजी, जाल, आर-पार और सीआईडी जैसी थ्रिलर और मिस्टर एंड मिसेज 55 जैसी हास्य फिल्म के बाद आई यह फिल्म गुरुदत्त के कैरियर ग्राफ को पूरी तरह से बदल देती है और उन्हें भारत के
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छलिया तीन मुख्य व दो सहायक किरदारों वाली एक त्रिकोणीय कहानी थी। मनमोहन देसाई की लोकप्रिय फिल्मों की तुलना में उनकी यह पहली फिल्म सीमित किरदारों की कहानी थी। छलिया में समकालीन दशक की आत्मा थी। इसमें कथा व कथन को सर्वाधिक महत्व मिला। फिल्म में अति नाटकीयता को जगह नहीं मिली व हास्य प्रसंग भी हवा की
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