FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

दिल का एक सितारा चला गया है।

गीतकार शैलेंद्र के निधन पर राजकपूर ने कहा था... दिल का एक सितारा चला गया है। ठीक नहीं हुआ। आपके बगिया के खूबसुरत गुलाबों में से कोई एक भी जाए,तकलीफ होती है। अजीज के लिए यह आंसु भी कम पड रहें हैं। किस कदर सादा सच्चा बेखुदगर्ज़ इंसान था। इस…

मुग़ल ए आज़म …के आसिफ़ एवं दिलीप कुमार मधुबाला

कमरुद्दीन आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर है । सन 1953 में शुरू हुई फिल्म सात वर्षों में बनकर पूरी हुई । फ़िल्म की शूटिंग दौरान परदे के पीछे का एक किस्सा

साहित्य के बाद सिनेमा में उतारे गए बनारस की तस्वीर

काशीनाथ सिंह की कृति ‘काशी का अस्सी’ पर आधारित’ मोहल्ला अस्सी’ को लेकर शुरू से ही उत्सुकता रही थी। ऐसे हालात में जहां पे मुख्यधारा साहित्यिक रचानाओं पर फिल्में बनाने में न के बराबर दिलचस्पी लेती है। वहां पर मोहल्ला अस्सी का बन कर रिलीज़ हो…

कमज़ोर कहे जाने वालों को मज़बूत कहती ज़रूरी फ़िल्म ‘फ़्रिज’

फिल्म बच्चों को केंद्र में रखती है। फ़्रिज में बंद कर दिए बच्चे के ज़रिए कहानी कही गई है। सबकुछ ब्लैक एंड वाईट में। बच्चों को लेकर सम्वेदनाएं चिंता का विषय बन चुकी हैं। बच्चों के साथ आमानवीय कृत्यों की खबरें हमेशा बनीं रहती हैं। आए दिन घटती…

अर्जुन कपूर की ‘इंडियाज़ मोस्ट वांटेड’ सबकुछ लगा कर भी गंवा रही

फिल्म की कहानी कमज़ोर नहीं। ना ही उसमें आकर्षण की कमी है। लेकिन ज़रूरी चीजें थोड़ी थोड़ी है। और कहीं कहीं हैं। फ़िल्म कमाल की बन सकती थी। लेकिन इतनी प्रभावी नहीं कि इतिहास में यादगार हो जाए। चिंता की बात यह कि अर्जुन कपूर की फ़िल्म को मनमुताबिक…

‘दे दे प्यार दे’ : पुराने विषय में नया तलाशती फ़िल्म

लव रंजन की पहले की फिल्मों की तरह यहां गहराई नहीं। फ़िल्म हिट तो हो जाएगी लेकिन लोग इसे याद नहीं रखेंगे। पुराने विषय में नया तलाशने की कोशिश हां जरुर कही जाएगी।

शिक्षा माफियाओं के संसार में घुसती फ़िल्म ‘सेटर्स’

पवन मल्होत्रा सेटर्स का सबसे बड़ा आकर्षण हैं । कहानी का नयापन व ट्रीटमेंट में वास्तविकता दूसरे बड़े कारण हैं। दो दोस्तों की कहानी में प्रेम व ज़ुर्म का एंगल इसे मनोरंजक बनाता है। आज की पैसा फेंको तमाशा देखो शिक्षा व्यवस्था की कहानी दिखाती…

रवींद्रनाथ टैगोर की अमर कहानी पर बनी ‘अमर’ फ़िल्म

गुरुदेव की बहुत मशहूर कहानी है  'काबुलीवाला। '  यह बांग्ला में लिखी गयी थी। लेकिन जब  बिमल राय ने 1961 में इस कहानी को परदे पर उतारा, तो इसकी शोहरत ने भाषा और क्षेत्र सभी की सीमाएं लांघ दी। काबुलीवाले के पात्र से परिचित होना एक नवीन अनुभव…