FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

एक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त की अनकही कहानी

0 714

जब हम चलें तो साया भी अपना ना साथ दे..जब तुम चलो बहार चले चांदनी चले..जब हम रुकें तो साथ रुके शामे बेकसी..जब तुम रुके बहार रूके चांदनी रुके….
गुरूदत्त…जिन्हे ज्यादातर लोग एक निर्देशक या कलाकार के तौर पर जानते हैं..उनसे ताल्लुक उन सभी का है जो अक्सर जुनून और व्यवयासिकता के युद्ध में खुद को घिरा पाते हैं..गुरूदत्त..महज एक निर्देशक..नाना ..एक कवि हृदय निर्देशक..या फिर एक प्यासा..एक ऐसा प्यासा जिसकी प्यास उसके छोटे से जीवन में कभी मिट ना पायी..और मिटी भी तो कुछ हद तक उसी की कालजयी फिल्मों से मिले संतोष से…गुरूदत्त के जीवन को समझने के लिए आवश्यक है कि उस आखिरी रात में लिये चलें आपको…जब गुरूदत्त की ज़िदगी धुंधले हस्ताक्षर छोडे थे…साल 1964…तारीख नौ अक्टूबर…वक्त शाम के सात बजे…..
वो शाम गुरुदत्त फिल्म्स की बहारे फिर भी आयेंगी के डेथ सीन को लिखने में उलझी हुई थी..मुंबई के पेड्डर रोड इलाके के ऑर्क रॉयल की बैठक में नायिका की मौत का सीन लिखा जा रहा था..गुरूदत्त का मन बैचैन हो रहा था..वो बार बार शराब को हाथ लगा रहे थे..शाम पांच बजे से उनका शराब पीने का सिलसिला रुका नहीं था। चेहरे पर उदासी शाम के साथ मानो पूरी तरह लिपट सी गयी थी..माजरा गुरुदत्त और गीता दत्त के बदतर होते जा रहे रिश्ते की गवाही दे रहा था..गीता ने गुरूदत्त को उनकी बेटी से मिलने पर पाबंदी लगा दी थी..फोन पर पति पत्नी के बीच लगातार बहस और तनाव अपनी सीमाएं लांघ रहा था..गुरूदत्त के क्रोध का बांध जैसे टूटने को बेताब हुआ जा रहा था..इस बीच फोन पर दी गयी एक चेतावनी उस शाम पर सवार होकर कब सच में बदल जाने वाली थी…इसका किसी को अंदाज़ा ना था..फोन पर गीता दत्त को गुरुदत्त ने गुस्से में कहा…
“आज अगर मैने बिटिया का मुंह ने देखा तो तुम मेरा पार्थिव शरीर देखोगी”
पूरी रात शराब पीते पीते गुरूदत्त सो गये….रात तीन बजे नींद टूटी तो अपने सहायक लेखक अबरार के बारे में पूछा और व्हिस्की मंगाकर दरवाजा बंद कर लिया…सुबह 9 बजे तक जब वो नहीं उठे तो डॉक्टर्स को बुलवाया गया..दरवाजा तोड़ा गया..गुरुदत्त इस दुनिया से रुखसत हो गये थे….

Leave A Reply

Your email address will not be published.