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मेरे प्रिय सितारे : दिलीप कुमार

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11 दिसंबर को जन्मे युसुफ़ सरवर ख़ान से दिलीप कुमार बन जाने का रास्ता खुद इतना कुछ समेटे है कि सिनेमा से मोहब्बत करने वाला हर इंसान ऐसे बेमिसाल व्यक्तित्व की लफ़्ज़ों से खिदमत करना सौभाग्य समझेगा।
वो सर्दियां थीं या गर्मिया या फिर किसी जुनून की का वो मौसम था ना मालूम क्योंकि परदे पर आकर छा जाने वाला भविष्य जिस संघर्ष की पैदाईश थी उसका हर क्षण तो युसुफ़ सरवर ख़ान ने जिया था। पठान परिवार से ताल्लुक रखने वाले दिलीप कुमार को तकदीर ने अभिनेता बनाया। वो सही वक्त पर सही जगह मौजूद थे, बॉम्बे टॉकीज़ उनके अभिनय का स्कूल था जिसमें वो बस छोटा मोटा काम करने गये थे अपने पिता के पारिवारिक डॉक्टर मित्र की सलाह पर..हुआ यूं था कि पेशावर में रहने वाला दिलीप कुमार का बड़ा परिवार दिलीप के बड़े भाई अयूब की रीढ़ की हड्डी की चोट की वजह से बंबई आने को मजबूर हुआ। इस दौरान बड़े परिवार की तंगहाली में युसुफ़ की पढ़ाई जारी रही और भाई अयूब के साहित्य प्रेम नें युसुफ को भी लिखने पढ़ने का माहौल दिया। पारिवारिक तंगी के कारण युसुफ़ को आर्मी कैंप की कैंटीन में नौकरी करनी पड़ी और इस दौरान वो फुटबॉल खेलने के शौकीन बने। फिर उर्दू और भाषा का अच्छा ज्ञान होने के कारण पारिवारिक डॉक्टर की सलाह पर वो देविका रानी से मिलने बॉम्बे टॉकीज़ गये। देविका उस वक्त फेमस बॉम्बे टॉकीज़ स्टूडियो को चला रही थीं। युसुफ का व्यक्तित्व देखकर उन्हे एक हज़ार रूपये माह पर बतौर अभिनेता रख लिया गया। हालांकि अभी तक पिता सरवर खान को इसका पता नहीं था क्योंकि फिल्मों में अब उनकी औलाद दिलीप कुमार हो चुका था। दिलीप इस बात से खुश थे कि उनका नाम बदल दिया गया है क्योंकि पिता की फिल्मों के प्रति नाखुशी का उन्हें इल्म था। मगर इसी दरम्यान राज कपूर के दादा दीवान बशेशरनाथ ने सरवर खान को दिलीप की फिल्म का पोस्टर दिखा दिया जिससे दिलीप के पिता नाराज़ तो हुए लेकिन बाद में बेटे की फिल्म शहीद उन्होने पूरे परिवार के साथ देखकर आंसू भरी आंखों से उन्हें माफ़ कर दिया।
बॉम्बे टॉकीज़ से आग़ाज़ पाकर भी दिलीप के पांव हमेशा ज़मीन पर रहे और काम में लगातर बेहतरी ने उन्हे लाजवाब अभिनेता के रूप में स्थापित करना शुरू कर दिया। वैसे तो उन्हें हम सब ट्रैजेडी किंग के नाम से बुलाते हैं क्योंकि उनकी ज्यादातर फिल्मों में उनके किरदार जज़्बाती होते जो दर्शकों से जल्दी ताल्लुक बना लेते , लेकिन किंग ऑफ ट्रैजेडी हरफनमौला थे क्योंकि कॉमिक किरदारों में भी उन्हें बहुत शोहरत पसंदी मिली। अपने बेहतरीन टाइम में भी बाक़ी अभिनेताओं की तरह दिलीप साहब ने ताबड़तोड़ फिल्में नहीं साइन की ज़ाहिर है पैसे उनके लिए मायने कभी नहीं रहा बल्कि हमेशा बेहतर सब्जेक्ट का उन्होंने चुनाव किया। अपने टॉप टाइम में भी उन्होंने चरित्र भूमिकाए क़बूलीं..और सुपरस्टार का तमगा हासिल किया।
फिल्मों के अलावा इनकी निजी ज़िंदगी भी खुली क़िताब की तरह रही। उनके संघर्षों के अलावा उनके प्रेम संबंधों का ज़िक्र आता है तो भले ही मधुबाला का नाम पहले लिया जाता हो लेकिन मधुबाला से पहले कामिनी कौशल भी उनके प्रेम के दायरे में रहीं। हालांकि कामिनी शादीशुदा थी और इस वजह से इन दोनो ने अपने प्रेम की नुमाइश नहीं की कामिनी के जाने के बाद मधुबाला से दिलीप का प्रेम हुआ और ये जब जगज़ाहिर होने लगा तो मधुबाला के पिता के ऐतराज़ के नतीजतन इस रिश्ते का भी अंत हुआ। मुगले आज़म के तमाम तनाव भरे सीन दोनो ने अपने रिश्ते के उसी नाज़ुक वक्त पर दिये।
use mughal e azam scenes.
हालांकि बाद में फिल्मो की प्रतिबद्धता खत्म करने के बाद मधुबाला ने दुबारा दिलीप से संबंध सुधारने की पहल की मगर इस बात को उन्होने सायरा बानो से शादी करके खारिज कर दिया।
अपने 54 फिल्मों के सफ़र में दिलीप साहब ने लाजवाब काम किया। शहीद, अंदाज,,देवदास, नया दौर, मधुमती, यहूदी, मुगल-ए-आजम, गंगा-जमना, राम और श्याम जैसी फिल्मों के ज़रिये वो हरफनमौला ऐसे कलाकार के तौर पर कसते चले गये जो परदे के हर रंग में खुद को बेहतरीन नायक साबित किया।
ब्लैक एंड व्हाइट एरा से लेकर रंगीन फिल्मों की रौशनाई में नहाई उनकी किरदारी कामयाबियां उस दौर के ट्रायो ‘दिलीप-राज-देव’ में खुद को अलग दिखाती हैं।

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