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जिस्मानी रिश्तों के ज़माने में ‘लव इज़ ऑल अबॉउट केयर’ समझाने पर्दे पर आती है फिल्म ‘अक्टूबर’

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अगर किसी के प्यार की गहराई समझनी हो तो आम तौर पर आप क्या करते हैं ? आपको अपने पार्टनर से प्यार तो है लेकिन कितना है इसका पैमाना सबका अलग-अलग, ज्यादा, कम हो सकता है।लेकिन वो एक बात क्या है जो अगर प्यार के साथ-साथ मिले तो प्यार और बढ़ता जाता है। मैं बताऊं ? वो है केयर यानि एक-दूसरे का ख्याल रखना..लेकिन जब इस एक छोटे लेकिन प्यार में सबसे जरूरी शब्द को लेकर कोई निर्देशक एक पूरी की पूरी फिल्म पर्दे पर रच दे और वो भी इतनी खूबसूरती और सलीके के साथ..तो फिर आप मुग्ध हुए बिना खुद को रोक नहीं पाते..फिल्म अक्टूबर एक खास फिल्म है..उन खास लोगों के लिए जिन्हें प्यार में केयर ज़रूरी लगती है।जिन्हें पता है इस शब्द के असल मायने..जब आप फिल्म अक्टूबर देखना शुरू करेंगे तो शुरुआत में आपको एहसास भी नहीं होगा इसका..


फिल्म अक्टूबर की कहानी एक बिलो एवरेज लड़के दानिश वालिया जो कि डैन है और एक अच्छी लड़की शिवली अय्यर के इर्द-गिर्द है।फिल्म के दोनों किरदार एक होटल में कर्मचारी हैं, जहां शिवली उस होटल में अपनी नौकरी एकदम ठीक और मन लगाकर करती है, वहीं दूसरी ओर डैन एक कन्फ्यूज्ड युवा की भूमिका में है, जो कोई भी काम ठीक से नहीं करता जिस वजह से उसका बॉस उससे चिढा रहता है।
आजकल के दौर के किसी भी हताश युवा की कहानी लगती है डैन की..जो पाना तो बहुत कुछ चाहता है..लेकिन उसे हासिल कर पाने में नाकाम होता है बार-बार..और ये हताशा उसके कैरेक्टर में भी बदलाव ला देती है,,वो हर वक्त फिल्म में परेशान, हताश सा दिखता है।


खैर, लाख बुराईयां हो इसमें, लेकिन डैन की एक अच्छाई है, वो कड़वा और सच्चा बोलता है, जिस वजह से वो लोगों को बुरा भी लगता है।एक ऐसे किरदार को कितनी ईमानदारी से वरुण धवन ने निभाया है, ये आश्चर्यचकित करता है मुझे
डैन बुरा नहीं है, एक बार जब शिवली की कार पंचर हो जाती है तो उसकी कार ठीक करने आने वाला डैन ही होता है।यही एक सीन है जिसमें शिवली और डैन नॉर्मल कपड़ो में दिखते हैं, वरना पूरी फिल्म में वो होटल स्टाफ की ड्रेस में काम करते ही दिखते हैं।


शिवली के एकाध सीन देखेंगे तो पता चल जाता है कि वो एक पॉजिटिव सोल है..सॉलिट्यूट में रहने वाली..जिसे खूबसूरत और सुगंधित फूल पसंद हैं।ये शिवली के किरदार को समझाने का एक तरीका है फिल्म में..
खैर कहानी आगे बढ़ती है और यहां से कहानी बिल्कुल पलट जाती है और अपने केंद्रबिंदु पर आ जाती है, जैसा की मैंने अपनी शुरुआती लाइनों में बताया है।
एक टैरिस यानि छत पर पार्टी चल रही है होटल स्टाफ की पार्टी है।सभी अपनी धुन में मगन है जैसा कि आमतौर पर पार्टियों में होता है।शिवली एक सुकून भरे किनारे बैठी है..अचानक उसका बैलेंस बिगड़ता है, वो सीधा छत से नीचे गिर जाती है।डैन वहां पार्टी में मौजूद नहीं है ये बताना जरूरी है।
शिवली टैरिस से गिरने के बाद मरती नहीं बल्कि वो डीप कोमा में चली जाती है।ये ख़बर डैन को अगले दिन मालूम पड़ती है, वो भागा-भागा मोटरसाईकिल से जाता है, उसे देखता है और चला आता है।ऐसा फिल्म में अगले आधे घंटे तक होता ही रहता है।ये साधारण जरूर लगता है कि डैन रोज हॉस्पिटल जा रहा है लेकिन ये फिल्म के आगे बढ़ने के साथ उतना ही गहरा बनता जाता है।
डैन दरअसल एक सवाल के जवाब के इंतज़ार में है..उसे वो जवाब सिर्फ शिवली दे सकती है।दरअसल, शिवली जब छत से गिरी तो उसने आखिरी बार डैन के बारे में पूछा था..ये सवाल अब डैन के मन में घर कर गया है कि आखिरी बार शिवली ने उसका नाम क्यों लिया ? शिवली के आखिरी शब्दों में उसका ज़िक्र आखिर क्यों था ? कहीं शिवली को उससे प्यार तो नहीं था..जैसा कि डैन को अब होने लगा जब से शिवली उसके पास नहीं है।


फिल्म का एक सीन खासकर जो सबको पसंद आएगा, बड़ा मार्मिक सा सीन है जिसमें कोमा में पड़ी शिवली के आइब्रो बनवाने के लिए डैन दोस्त से उधार के पैसे मांगता है, ये बोलकर कि उसे कुछ काम है।एक कोमा में पड़ी लड़की के आइब्रो का ख्याल तो शायद ही किसी को आता..ये डैन की शिवली को लेकर एक केयर तो दिखाता है और ये सीन फिल्म का पूरा सार प्रकट कर देता है।


केयर उस इंसान के लिए भी, जिसकी सांसें रुकने का इंतज़ार उसका बाप कर रहा है क्योंकि उसके पैसे यूं खत्म हो रहे कि आगे जिंदगी चला पाना मुश्किल हो जाएगा, शिवली को कई बार वेंटिलेटर से हटाने की बात उसका परिवार करता है लेकिन जब-जब ऐसा हुआ डैन वहां मौजूद रहता है वो नहीं मानता, वो तरह-तरह की दलीलें देता है..क्योंकि उसको फिक्र है शिवली की..उस शिवली की जो कोमा में है जो डैन से प्यार करती है या नहीं ये उसके जिंदा होने पर ही पता चलेगा।
शिवली के जिंदा होने का बस उसकी मां और डैन को इंतजार रहता है..शिवली की मां की आंखें तो पथरा सी गई होती है
लेकिन वो वक्त कभी नहीं आता, शिवली दुनिया से रुकसत हो जाती है।


फिल्म खत्म होती है..डैन को कुछ हासिल नहीं होता..ना उसका प्यार ना उसके सवालों के जवाब..फिल्म अपने अंजाम तक सच्चाई के साथ पहुंच जाती है और सबसे बड़ा सबक हमें सिखा देती है।सबक ये कि इस चौंधिया देने वाली दुनिया में लोगों को सिर्फ जिस्मानी प्यार से मतलब है..प्यार के असल मायने डैन और शिवली की अनकही लव स्टोरी में दिखते हैं।
एक साधारण और सादी फिल्म होने के बावजूद अक्टूबर आपके दिल में उतर सकती है अगर आपको प्यार में केयर जरूरी सी लगती है, वरना आप इस लेख को पढ़कर सिर्फ बोर हुए होंगे।

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