-फिल्मसिटी वर्ल्ड के लिए ये लेख लिखा है प्रशान्त पाण्डेय ने ।
ये वर्ल्ड वॉर-2 का वक्त है…साल 1940, ब्रिटेन और फ्रांस नैचुरल अलाईज़ नाज़ी शासन यानि जर्मनी के तानाशाह हिटलर के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहें है। इसी बीच हाउस ऑफ कॉमन्स में नार्वे की हार का मौका देख विपक्षी लेबर पार्टी तत्कालीन ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर पर इस्तीफा देने का दवाब बनाती है। ये दबाव काम भी करता है और प्रधानमंत्री चैंबरलेन अपने पद से हटने का फैसला करते हैं। चेंबरलेन अपनी पार्टी को कहते हैं कि वो चाहते हैं कि हैलीफैक्स प्रधानमंत्री बनें लेकिन हैलीफैक्स के प्रस्ताव ठुकराने के बाद विन्सटन चर्चिल के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचता क्योंकि हैलीफैक्स के बाद सिर्फ उनके नाम पर ही विपक्ष एक राय होता है। तो ये फिल्म किस बारे में ये साफ़ साफ़ बता देता हूं।
ये द्वितीय विश्व युद्ध के साये में बनी एक ऐसी फिल्म है जिसमें युद्ध की पृष्ठभूमि भी नहीं है..मैने कहा साये तले तो बस साया है जो कहीं नज़र नहीं आयेगा..और न ही ये विन्सटन चर्चिल बायोपिक है..ये उनके ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनने के नाज़ुक वक्त के हिस्से की वो कहानी है जिसमें बात उनकी शख्सियत, उनके फैसलों, उनकी कमज़ोरियों और एक ऐसे राष्ट्रनेता की है जिसके लिए उसकी जनता की राय सबसे उपर थी।

ऐसा कई फिल्मों के साथ होता है जिन्हें मैं देखता हूं..उन्हे देखने के बाद घटनाओं को जितनी स्वाभाविकता के साथ याद कर पाता हूं करता हूं..गुजरता हूं जितना गुजर सकता हूं फिल्म से और खोजता हूं वो एक सीन या दो तीन या इससे ज्यादा जो फिल्म पर हावी थे। डार्केस्ट आवर में वैसे तो कई सीन हैं लेकिन शुक्रिया करुंगा अपने दोस्त मिहिर पांडया का जिन्होने मेरी पोस्ट पर एक टिप्पणी की और मेरा काम आसान किया…मैं उस टिप्पणी को न बताकर आपके लिए सस्पेंस जितनी देर कायम कर सकूं उतनी ही लिबर्टी लूंगा। तो जरा सीन सुनिए….
वर्ल्ड वॉर टू का सबसे नाजुक दौर, ब्रिटेन की सेना डनकर्क और कैले बंदरगाहों पर फंसी है..ऑपरेशन डायनमो के तहत ब्रिटेन अपने नागरिकों का आह्ववान करता है कि वो छोटी शिप्स लेकर पहुंचे और तीन लाख ब्रिटिश सोल्जर्स को वहां से निकाला जाय। इस बीच बेल्जियम ने समर्पण कर दिया है, फ्रांस शांति समझौते की तरफ देख रहा है लेकिन चर्चिल अभी भी युद्ध के अलावा कुछ नहीं सोच रहे। सारे दबावों के बीच चर्चिल , अमरीकी राष्ट्रपति फ्रेंकलीन रुज़वेल्ट को फोन लगाते हैं..और ये फिल्म का सबसे बेहतरीन सीन है..एक राष्ट्र का स्वामी दूसरे राष्ट्रपति से जब सबसे दवाब भरे वक्त में बात कर रहा है तो क्या बात होगी । इस सीन को देखते वक्त आप समझ पाते हैं कि दूरदर्शी होना क्या होता है और ये वाकई ईश्वर प्रदत्त गुण है जो बड़े नेताओं में अनुभव के साथ आता है । राष्ट्रहित जब परम ध्येय हो लेकिन अपनी आज़ादी से समझौता भी न करना हो तो किसी लीडर के लिए हर एक सेकेंड कितना मायने रखता है इस एक सीन में आप समझ पायेंगे।

डार्केस्ट आवर आपको चश्मदीद बनाती है चर्चिल की वॉर कैबिनेट का , उनके उस कैबिनेट का जिसमें उसके आलोचकों की राय भी उतनी ही मायने रखती है जितनी की साथ वालों की। एक नेता जब असहाय हो जाये तो उसे क्या करना चाहिए..कितनी जरूरी होती है बातें एक दूसरे से ताकि निकले उन्ही से कोई रास्ता, ये फिल्म इस बात को बखूबी बयां करती है। जनता के करीब होने का दिखावा और उनके पास जाकर उनसे बात करने की व्यवहारिकता के बीच के फर्क को मिटाने के लिए किसी लीडर में क्या खूबी होनी चाहिए , डार्केस्ट आवर माना आईने जैसी है..। बहुत बेहतरीन है डार्केस्ट आवर। जिसमें हर किरदार महत्वपूर्ण है, चर्चिल की टाइपिस्ट से लेकर , ट्रेन में बैठी आम जनता तक। ये जरूरी फिल्म है पूरे विश्व के नेताओं के लिए, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए।

