FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

अबरार..साहिर..गुरूदत्त और प्यासा..

0 1,198

गुरूदत्त जो प्यासा जैसा काम हमेशा से करना चाह रहे थे वो पहले स्थापित होना चाहते थे क्योंकि इंडस्ट्री का तब भी यही उसूल थी कि आपको आपकी हिट फिल्म के ज़रिए ही पहचान मिलती थी। हुआ भी ऐसा..दोनो ही फिल्मे (बाज़ी और मिस्टर एंड मिसेस ५५) कामयाब रहीं और गुरूदत्त को हर बड़ा बैनर फिल्में निर्देशित करने के लिए आमंत्रित करने लगा। उसी दरम्यान नागपुर के उभरते हुए स्क्रीनप्ले राइटर अबरार अल्वी से गुरूदत्त की मुलाकात ने प्यासा की नींव रखी। प्यासा जो पहले कशमकश थी मगर साहिर लुधियानवी के लिखे शानदार गीत जिन्हे नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं की इच्छापूर्ति होते होते ये प्यासा में तब्दील हो गई। प्यासा को गहराई साहिर के सजोये गीतों ने भी दी। प्यासा फिल्म नहीं बल्कि दर्शन है..फिल्म शुरू जिस गीत से होती है वो सीन दर सीन पूरी फिल्म के नज़रिए को सार्थक करता चला जाता है। ये हंसते हुए फूल…ये महका हुआ गुलशन..ये रंग में और नूर में डूबी हुई राहें..गुरूदत्त सिनेमा को मनोरंजन से ज्यादा एक इंटेलेक्चुअल मीडियम तौर पर ट्रीट करते थे। जब सिनेमा की समझ में कुछ दायरागत बातें ही आ रहीं थीं तब गुरूदत्त यथार्थ के चरित्र को रचने में यक़ीन करते हुए फिलॉसॉफिकल हुए जा रहे थे। मगर इन सारी रूहानियत के बीच गुरूदत्त उस स्त्री रूपी नायिका से हार रहे थे जो उनके सृजन की धुरि बनकर रह गई थी या वो ऐसा मान बैठे थे कि उनका बेहतरीन काम इस नायिका के ज़रिए ही निखरता रहा। पहले गीता दत्त फिर वहीदा रहमान..इन दोनो से उनके साफ से संबंध..अपनी फिल्मों में  इन दोनो को दी गई तरजीह ये साबित करते रहे कि गुरूदत्त कलाकार हो गए थे। वो बार बार इनके पास लौट आते, वहीदा को अपनी खोज मानने वाले और सही मायनो में हिंदी सिनेमा को इस नायाब अभिनेत्री से परिचित कराने वाले गुरूदत्त उनपर अपना अधिकार समझते थे। मगर वो ये भूल कर रहे थे जो बेहद व्यवयायिक इस फिल्म उद्योग में किसी को अपना मान बैठे थे। वहीदा आज भी गुरूदत्त से ज्यादा उनके काम की क़द्र करती हैं। इन सबके बावजूद गुरूदत्त सिनेमा के असल साधक थे। सही मायनो में गुरूदत्त प्यासे थे..सिनेमा के ज़रिए उन्होंने अपनी रचनात्मकता की प्यास बुझाई मगर अपनेपन की प्यास अधूरी रह गई।

Leave A Reply

Your email address will not be published.