FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

अलफ्रेड हिचकाक..सिनेमा का शैली गुरू

0 1,557

अलफ्रेड हिचकाक वो नाम जिसे मास्टर ऑफ सस्पेंस कहें या निर्देशकीय कौशल का एक स्कूल..सब जायज़ है..दुनिया भर के फिल्मकार उनकी फिल्में देख कर सीखते आ रहे हैं और कहना गलत ना होगा कि सिनेमा में हिचकाक शैली कहीं ना कहीं दिख ही जाती है..

रोमांच..रहस्य और सीन में एक ऐसा प्रभाव जो हर बार नया होता..कहानी जिसका हिचकाक थ्रिल..सीन में जान डाल देता..किरदारों के गेटअप से लेकर कैमरे की कलाकारी तक..हर तरफ हिचकाक का असर साफ नज़र आता..कह सकते हैं कि हॉलीवुड का जिक्र बगैर अलफ्रेड हिचकाक के पूरा ही नहीं हो सकता..13 अगस्त 1899 को ब्रिटिश फिल्म उद्योग से अपने करियर को स्टार्ट करने वाले हिचकाक ने मूक फिल्मों के ज़रिए हालीवुड में एंट्री ली..बचपन में हिचकाक अकेलेपन के शिकार होते होते बड़े हुए..पिता की कड़क मिज़ाजी ने हिचकाक को तरह तरह की यातनाओं से गुज़ारा…इनमे से एक सज़ा जिसने हिचकाक को झकझोरा वो थी महज़ पांच बरस की उम्र में पिता द्वारा उन्हे पुलिस लॉकअप में देना और वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होने गलत व्यवहार किया था…आगे चलकर जब हिचकाक फिल्मों की दुनिया में दाखिल हुए तो उन्होंनें बचपन के इन तकलीफदेह अनुभवों को फिल्मों में दिखाना शु डिग्री किया..खासकर फिल्म साइको में ये भावना और दृश्य ज्यादा प्रबल हुए हैं…मात्र चौदह बरस की उम्र में पिता को खोने के बाद हिचकाक को तरह तरह के काम करने पड़े…बाद में कहीं जाकर एक एडवर्टाईज़िंग एजेंसी में उन्हें काम मिला..और यही से  हिचकाक की सिनेमा के प्रति दिलचस्पी बढ़ने लगी और वो सिनेमा की हर बारीकी सीखते हुए बन गये सिनेमा के स्टूडेंट..इस दौरान साल 1919 में द हेनली टेलिग्राफ में उनके आर्टिकल्स ने राईटिंग की दुनिया को दिया एक नया नाम…जो था अलफ्रेड हिचकाक..

इसके बाद हिचकाक ने लंदन के फेमस पैरामाउंट स्टुडियों में रहकर फिल्म स्क्रिप्टिंग..स्क्रीनप्ले और डायरेक्शन के साथ फिल्म मेंकिंग के हर डिपार्टमेंट पर पकड़ बनायी..और साल 1925 में परदे पर आयी हिचकॉक की पहली फिल्म द प्लेज़र गार्डेन..इस फिल्म ने सिनेमा को इंट्रोडक्शन टू एक्सप्रेशेनिज़म की एक नयी स्टाईल सिखाई..लेकिन हिचकाक को ब्रेक थ् डिग्री मिला 1927 में आयी उनकी फिल्म द लॉजर से..जिसकी कहानी ने सबको चौकाया..कहानी में फिल्म का प्रोटैग्निस्ट यानि की लीड कैरेक्टर जुर्म की दुनिया का मासूम आदमी है..जो खुद की लड़ाई लड़ रहा है..ये दोनो ही फिल्में मूक थी मगर द लॉजर की रिलीज़ के दो साल बाद सस्पेंस के इस सुल्तान की साउंड से खेलने की व्याकुलता को करार मिला और साल 1929 में आयी ब्लैकमेल बनी उनकी पहली साउंड फिल्म..

ब्लैकमेल की कामयाबी ने हिचकाक को निडर बना दिया और साल 1930 में अपनी अगली फिल्म में वो सेक्स और हिंसा के साथ कहानी को परोसने में कामयाब रहे..सिनेमा में एक विजनरी और ब्रिलियंसी पैदाइश के प्रतीक हिचकाक के करियर में चार चांद लगाये The man who knew too much, The lady vanishes and Jamaica Innजैसी उनकी फिल्मों ने.इस बीच सेकेंड वर्ल्ड वॉर के साये नें उन्हे फिल्मों से दूर कर दिया लेकिन जब वो दुबारा लौटे तो साल 1940 तैयार था हिचकाक की एक लाजवाब फिल्म रेबेका के साथ जिसे ऑस्कर से भी नवाजा गया..अगले ही साल Suspicionआयी जो कहानी थी एक विवाहिता की,.. जिसे ये यकीन हो चला है कि उसका पति कातिल है जो कि है नही..मगर इन सबसे अलग जिस एक फिल्म ने हिचकाक को वर्ल्ड क्लास फिल्ममेकर्स की कतार में आगे ला खड़ा किया वो रही सोबेटॉर..ये एक हाइली एक्लेम्ड थ्रिलर थी जिसने कामयाबी के कलाम लिखे..पचास का दशक इस फिल्मकार के अलग-2 फ्लेवर की सबसे यादगार फिल्मों के लिए जाना जाता है..इस दौर में आयी The Rear window..Vertigo..North By Northwest सफल और बेहतरीन फिल्मों की मिसाल हैं…मगर इसी दशक में आयी जिस एक फिल्म ने सिनेमा के दायरे को नयी ज़मीन दी वो थी हिचकाक की कंट्रोवर्शियल और उतनी ही इन्क्रेडिबल फिल्म साइको..साइको के अलावा the 39 steps भी उनकी चुनिंदा फिल्मों में से एक रहींं जिसने हिचकाक शैली को पहचान दी और हिचकाक बने सिनेमा के एक स्कूल..
ऐसे में जब हम हिचकाक और उनके सिनेमा की पड़ताल करते हैंं तो पता चलता है कि वो भले ही मास्टर ऑॅफ सस्पेंस थे मगर फिल्मों के हर मूड पर उनकी पकड़ थी जो उनकी फिल्मों में दिखायी देती है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.