ऑस्कर फेम फ़िल्म ‘नो मैन्स लैंड’ के निर्देशक डेनिस टेनोविक की फिल्म ‘Tigers’ ज़ी 5 पर स्ट्रीम हो रही । इमरान हाशमी की यह प्रोजेक्ट लंम्बे इंतज़ार के बाद दिन का उजाला देख सकी है। इमरान का बॉक्स ऑफिस पर सोलो हीरो के तौर रुतबा अब रहा नहीं। फ़िल्म के साथ यही दिक्कत है। लेकिन नीयत की प्रशंसा की जानी चाहिए। पाकिस्तानी सेल्समैन की सच्ची कहानी पर आधारित ‘Tigers ’ का कंटेट सराहनीय है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मकड़जाल में उलझी इंसानियत का मार्मिक विषय इंगेज करता है। नायक अयान (इमरान हाशमी) दूध का पाउडर बनाने वाली बड़ी कंपनी में काम करता है। अयान एक नेक नीयत लेकर चल रहा। दुनिया को बताना चाहता है कि कैसे एक कंपनी करोड़ों बच्चों की जान का दुश्मन बन गई है। कारपोरेट घरानों की सामाजिक जिम्मेदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है, फ़िल्म देखकर समझ आता है। पाकिस्तान हो या अपना भारत कारपोरेट घरानों की मनमानी किसी से छुपी नहीं है।

फ़िल्म चर्चित पाकिस्तानी सेल्समैन आमिर रज़ा हुसैन की कहानी कहती है। नब्बे के दशक में पेश आए नेस्ले स्कैण्डल के तार आमिर रज़ा से गहरे जुड़े थे। अपनी ही कम्पनी के विरुद्ध बग़ावत कर उन्होंने पर्दाफाश किया था। नेक नियती से बनी इस फ़िल्म का हृदय सही जगह है। किंतु प्रवाह में नहीं। इसीलिए भी क्योंकि घटनाओं पर फिल्में ऐसी ही होनी चाहिए।

इमरान ने किरदार को अच्छे से जीया है। भीतर उफ़नती खीझ व प्रतिकार की परतें दिखाई देती हैं। ऐसे किरदार उन्हें और मिलने चाहिए। एक तरह से मुझे टाइगर्स इमरान की रिवाईल फ़िल्म नज़र आती है। कहानी की बानगी एक संवाद से ज़ाहिर हो जाती है। देखिए क्या कहता है… वही पुराना किस्सा आज भी है। अत्याचार रह रहकर रिपीट करता है। मासूम लोगों के साथ धोखा होता रहा है। फ़िल्म में मसला मासूमो बच्चों की मौत से जुड़ा है। यही एक विषय ‘टाइगर्स’ को विशेष श्रेणी में ले जाता है। एक सराहनीय व ज़रूरी हस्तक्षेप ।

फ़िल्म सिनेमाघरों में रिलीज़ होनी चाहिए थी। इस किस्म के प्रयासों का सीधे डिजिटल रिलीज़ उदास करता है। कंटेट के हिसाब से एक महत्वपूर्ण फ़िल्म के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए।आम दर्शकों के नज़रिए से यह उदासीन चलन है।
