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द वॉरियर : हारना भी एक नज़रिया है…

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        शांति के लिए युद्ध भी अनिवार्य है..ज़िन्दगी में अच्छा-बुरा जो भी आप निभाते हैं उन सबका हिसाब ज़िन्दगी की जड़ों में होता है और ये भी सौ आने सच है कि ज़िन्दगी अच्छे कर्मों का खिताब अगर अपने तरीके से देती है तो बुरे कामों का इंतेकाम लेने का तरीका भी अलहदा किस्म का होता है। MIRAMAX FILMS और डायरेक्टर आसिफ़ कपाड़िया की द वॉरियर भी पूर्ण रूप से कर्मों के पर आधारित एक उम्दा फिल्म है। द वॉरियर राजस्थान की सामंती व्यवस्था की परंपराओं को दर्शाती है जिनमें आदमी की जान की कोई क़ीमत नहीं है और अगर वह सामंतवाद के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करता है तो सरेआम उसका सर क़लम कर दिया जाता है.

    यह फ़िल्म दरअसल एक ऐसे व्यक्ति (इरफ़ान ख़ान) की कहानी है जो एक स्थानीय सामंत के लिए काफ़ी समय से काम कर रहा है और ख़ासतौर से उसके इशारे पर किसी का भी सर क़लम कर सकता है.लेकिन उसकी अंतरात्मा तब जाग जाती है जब सामंत के लिए यह काम करने से इनकार करने पर उसके बेटे का सर क़लम कर दिया जाता है.बस उसके बाद वह पश्चाताप करने के लिए हिमालय की पहाड़ियों की तरफ़ चल देता है और रेगिस्तान से चलकर हिमालय की तलहटियों तक का उसका सफ़र मानवीय भावनाओं और मनोदशाओं का बेहतरीन चित्रण इस फ़िल्म में है.भारतीय मूल के ब्रिटिश फ़िल्म निर्देशक आसिफ़ कपाड़िया की पहली हिंदी फ़िल्म द वॉरियर (योद्धा) ने साल 2003 में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित बाफ़्टा पुरस्कारों में दो सम्मान हासिल किए।

ये इरफान की पहली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म है और यक़ीन मानिए ये पूरी तरह इरफ़ान की फिल्म हैं। फिल्म में डायलाग्स ना के बराबर हैं और ये तो सभी जानते हैं कि जहां-जहां ऐसे मौके होते हैं वहां-वहां इरफान बेमिसाल होते हैं। निर्देशक आसिफ़ कपाड़िया की ये पहली फिल्म इतनी मेच्योर है कि लगता है संजीदापन और सीन क्रियेट करने का अनुभव उन्हें  बरसों से है। उनकी स्टोरी टेलिंग में एक ईमानदारी है। वो हर सीन में कुछ ऐसा पिरो देते हैं कि सिनेमा की समझ रखने वाले या सिर्फ सामान्य सा दर्शक बस शांत होकर सीन से कनेक्ट हो जाता है। फिल्म के एक दृश्य में प्रायश्चित के लिए एक अंधी वृद्धा को हाथों में उठाये इरफान जब झील पार करा रहे होते हैं तो वो महिला उनके चेहरे पर स्पर्श करते हुए कहती है कि मुझे तुम्हारा सहारा नहीं चाहिए..तुम्हारा चेहरा खून से रंगा है। ये सीन फिल्माने की सोच ही आसिफ को बहुत बेहतर बना देती है। राजस्थान हो या हिमालय..आसिफ ने उन लोकेशन को चुना जिन सिल्वर स्क्रीन पर किसी ने नहीं दिखाया..वीरान रेगिस्तान के बीच में बने छोटे गांव हों या हिमालय के पैरों तले लकड़ी के घर सभी एक पेंटिग की तरह हैं। एक योद्धा की कहानी होते हुए भी ये मारकाट से ज्यादा भावनाओं..कर्म और प्रायश्चित के धागों में सिली बेहतरीन फिल्म है।

 

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