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MANTO SPECIAL REVIEW : तहजीब के मायने यों तो गहरे हो सकते थे पर फ़िलहाल पर्दादारी इसका शॉर्टकट है

मंटो उनमें से रहे होंगे, जो ज़िंदगी भर न समझ पाए कि जो चीज जैसी है उसे वैसी ही लिख देने में हर्ज क्या है !

मंटो एक जगह लिखते हैं कि- ‘उन्हें सियासत में उतनी ही दिलचस्पी रही जितनी गाँधी जी को फिल्मों में। गाँधी जी को फिल्म देखनी चाहिए और मुझे सियासत में दिलचस्पी रखनी चाहिए थी।’ तहज़ीब न गाँधी को कुबूल कर पायी और न मंटो को।

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कुछ लोग जिन्हें जमाना होशियार नहीं कहता वे इस तरकीब को कभी समझ नहीं पाते कि तरक्की के लिए कितनी ही दिखाई देने वाली चीजों को नज़रअंदाज किया जाता है और कितनी ही चीजें जबरन देखी जाती हैं, जो मौजूद में कहीं वज़ूद नहीं रखतीं। मंटो उनमें से रहे होंगे, जो ज़िंदगी भर न समझ पाए कि जो चीज जैसी है उसे वैसी ही लिख देने में हर्ज क्या है ! नज़र आने वाली हर शै को हर नज़र देख सके, जरूरी नहीं। यकीन मानिए दिमाग ही देखता है, आँखें बस गुलामी करती हैं। दीद, दिमाग की तो तसदीक़ आँख की। कुछ के पास नज़र होती है, वे देखते हैं और बयां करते हैं। और फिर ये जरूरी नहीं कि वह बयानात सबको पसंद आये।

अल्लामा इक़बाल का एक शेर है:
“तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगा”

तहजीब के मायने यों तो गहरे हो सकते थे पर फ़िलहाल पर्दादारी इसका शॉर्टकट है। सारी इज्जत इसी छुपाव में है, बनाव में है। मंटो की परेशानी एक और भी है। लेखक मंटो असल मंटो में फ़र्क़ नहीं बरत पाता। बहुतेरे बरत लेते हैं, शान से जीते हैं, लोग-बाग उनकी अदब करते हैं। मंटो एक जगह लिखते हैं कि- ‘उन्हें सियासत में उतनी ही दिलचस्पी रही जितनी गाँधी जी को फिल्मों में। गाँधी जी को फिल्म देखनी चाहिए और मुझे सियासत में दिलचस्पी रखनी चाहिए थी।’ तहज़ीब न गाँधी को कुबूल कर पायी और न मंटो को। मंटो उस तहज़ीब के खिलाफ खड़े थे जो लिहाफ ओढ़कर हर जख्म छुपा लेती थी, मलहम तक उसकी पहुँच रोकती थी। तहज़ीब को मंटो के खिलाफ होना ही था, पर मंटो को भी मंटो ही होना था। बयालीस साल की कुल ज़िंदगी में जो अफ़सानों का अंगार बरपाया मंटो ने उसकी आंच अभी भी तहज़ीब को आती रहती है।

मंटो पर मूवी बनाना खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि सबके मन में मंटो एक से नहीं हैं। एक मंटो बम्बई में स्क्रिप्ट लिख रहे। एक मंटो फ़िल्मी गॉसिप बांच रहे। एक मंटो जिसमें इस्लाम टोपी भर भी बाकी नहीं था। एक मंटो जिरह कर रहे अपने कलमकार दोस्तों के बीच और एक मंटो अपने कलाकार मित्रों से तकरीरें दाग रहे। एक मंटो शराब और सिगरेट से सराबोर हैं तो एक मंटो चक्कर काट रहे उन बदनाम गलियों में जहाँ से उन्हें बजबजाती हकीकत की कहानियाँ सूझती थीं। एक मंटो वो भी जो अपनी माशूका बम्बई को कहता था, जिसे जब आना पड़ा पाकिस्तान तो उसे आजादी परकटे परिंदे की आज़ादी लगी। रोटी का मयस्सर मंटो भी जो सीधा अंकल सैम को खत लिखता था और वह कश्मीरी मंटो जो नेहरू को लिखे खत में खुद को उनसे जियादा खूबसूरत बताता था। इस्मत से अपने रूहानी ताल्लुकात को ऐवें हवा में उड़ाने वाला मंटो जो मशहूर अदाकारा व नगमाकारा नूर जहां को इक मुलाकात के लिए तड़पा देता था और कितनों का बाखूब बयानकार मंटो कितने ही खतों का जबाब देना भी मुनासिब न समझता था। पर्दापोशीदा लोग मंटो के लिखे को देखना चाहते थे, समझना नहीं चाहते थे। और जिस तरहा ज़माने को रद्दी साफ़ करने वाले का गुरूर चुभता है वैसे ही मंटो की कलम कितनों के हलक में गड़ गयी। सफाई करने वाले पर गंदगी का मुकदमा किया गया। कुल छः बार, तीन बार हिंदुस्तान में और तीन बार पाकिस्तान में। कहा गया कि मंटो के लफ़ज़ फ़ह्हाश (अश्लील) हैं और उनसे नस्लों की बर्बादी का खतरा है।

ऐसे मंटो पर मूवी बनाने का खतरा लिया मशहूर चित्रकार जतिन दास की प्रतिभाशाली बेटी एवं प्रख्यात अदाकारा Nandita Das ने। इससे पहले पाकिस्तान में भी मंटो पर एक मूवी बनाई गयी जिसमें सरमद खूसट ने मंटो का रोल किया है और उसे निर्देशित भी किया था। बेहद सफल रही इस फिल्म को उन्हीं कलाकारों से फिर उसे छोटे परदे के लिए उन्नीस एपिसोड्स में बनाया गया और उसे वहां जिओ टीवी पर दिखाया गया था। यह भी चर्चित हुआ लेकिन इसे बनाने में बॉयोपिक की कसौटी कहीं रह गयी और कई मर्तबा कल्पना का सहारा ले लिया गया। मंटो पर बनाई जरूर गयी पर नूरजहां, नरगिस, श्याम चड्ढा, इस्मत, अशोक कुमार, जद्दनबाई को अधिक तवज्जो मिली उसमें। इसतरहा मंटो की कसी हुई बॉयोपिक बनाने की गुंजाइश खंगाली नंदिता दास ने। बेहद भावप्रवण अभिनेत्री नंदिता अपने अभिनय एवं सामाजिक जागरूकता अभियानों के लिए भी जानी जाती हैं। कलाकार का एक हस्तक्षेप होना ही चाहिए यह उन्होंने अपनी निर्देशकीय कृति फ़िराक़ से सिद्ध कर दी थी। फ़िराक़ ही उनके निर्देशक प्रतिभा को साबित करने के लिए काफी है जो मंटो से और भी पुख्ता हो जाती है। मेरा हमेशा मानना है कि यदि निर्देशक/कलाकार साहसी नहीं है तो प्रतिभाशाली भी नहीं है। नंदिता दास मंटो मिशन को कितनी गंभीरता से जी रही थीं कि उन्होंने इसकी कहानी खुद ही लिखी। पाकिस्तान जाकर मंटो की बेटियों और अन्य परिवारवालों से मिलीं और लगातार उनके संपर्क में रहीं। निर्देशक नंदिता मंटो को जितना जानती गयीं उन्हें अपने पिता जतिन दास में मंटो से एक स्तर पर रचनात्मक साम्यता दिखने लगी। एक बॉयोपिक बनाने के लिए संजीदगी की यह खुमारी जबतक तारी न हो, यह मुमकिन हो नहीं सकता। फिल्म की कहानी में मंटो और मंटो के लिखे किरदार इसतरह से आते-जाते हैं कि मंटो भी महसूस होते हैं और उनके गढ़े किरदार भी। जिन्होंने मंटो को पढ़ा है वे फिल्म के डॉयलॉग्स में उनके लेखन के खूबसूरत इस्तेमाल को बिना सराहे न रह सकेंगे, उसमे उन्हें मंटो के बहुलांश लेखन की झाँकी मिल जाएगी। मूवी मंटो में मंटोईय्यत महसूस की जा सकती है। इससे नंदिता की तैयारी दिखती है। नंदिता ने मार्च 2018 में यूट्यूब पर नवाजुद्दीन को लेकर ही एक शार्ट फिल्म रिलीज की थी- ‘इन डिफेन्स ऑफ़ फ्रीडम’, इसमें मंटो के कई संवाद, फिल्म में ज्यों का त्यों रखे गए हैं। यह एक तरह से मंटो के हमेशा प्रासंगिक रहने की घोषणा थी। इस फिल्म के बाद नंदिता दास की हर फिल्म का इंतज़ार होगा जिसे वे निर्देशित करेंगी। मूवी मंटो में नंदिता ने बॉयोपिक के हिसाब से बेहद ही नियंत्रण में रही हैं, रत्ती भर भी मसाला या अतिरेक नहीं है। कालखंड का अंतर, जगह का अंतर और उम्र का अंतर जिस बारीकी से फिल्माया गया है, वह बांधने वाला है। मंटो की किरदारों की तरह ही फ्रेम में कोई बनाव नहीं है, सहजता है। चौंकाने वाले दृश्य भी इतनी सहजता से उतरते हैं कि सहसा विश्वास नहीं होता कि किसी किरदार ने कुछ ऐसा कह दिया। इसे सजग होकर देखना होगा।

Nawazuddin Siddiqui ऐसी फिल्मों की तलाश में रहते हैं। इरफ़ान खान नहीं तो नवाजुद्दीन सिद्दीकी का चयन मंटो की भूमिका में यकीनन जाया नहीं हुआ। सरमद खूसट का मंटो जहाँ अपने किरदार में एक शांत, धीमापन उकेरता है, वहीं नवाज़ अपने पोरट्रायल में लाउड रहे हैं। उनकी चाल में जबान के खरेपन की कड़क दिखती है। इसे सही या गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मंटो के वास्तविक जीवन के वीडियोज मिलते नहीं कि कोई एक शख्शियत उकेरी जा सके। लेकिन नवाज, यह यकीन दिलाते हैं कि मंटो को ठीक कुछ यों ही होना चाहिए। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ी है, मंटो की पत्नी के किरदार में Rasika Dugal फबती चली गयी हैं। पार्क का वह दृश्य जिसमें साफिया, मंटो से शराब की शिकायत कर रही है और फिर मंटो उन्हें छोड़ देने को कह रहे, बच्चे को झूला झुलाते रासिका बेहद ही प्रभावी लगी हैं। श्याम चड्ढा के रोल में ताहिर राज भसीन को जितना सिनेमैटिक स्पेस मिला है उसके अनुपात में तो वे प्रभावी नहीं लगे पर किरदार निभा ले गए हैं। ऋषि कपूर एक चालाक प्रोड्यूसर के किरदार में हैं, जिन्हें इतना छोटा रोल मिला कि उसमें जितना किया जा सकता था, उन्होंने किया है। रणवीर शौरी ने ईशर सिंह के किरदार में असर रखते हैं पर स्क्रीन प्रेजेंस लूटती हैं कुलवंत के किरदार में Divya Dutta। दिव्या दत्ता, शायद ही किसी फिल्म में उम्दा अदाकारी न करती हों। इनकी आवाज, इनकी अदाकारी को सम्पूर्ण बनाती है। इनके लिए किरदार का छोटा-बड़ा होना मायने ही नहीं रखता। Tillotama Shome और परेश रावल के उस छोटे से दृश्य को अगर बिलकुल अलग करके देखें तो अपने आप में वह एक पावरफुल नैरेशन है, जिसे दोनों ने बिलकुल सजीव बना दिया है। इस छोटे से दृश्य में परेश रावल फिल्म तमन्ना की इंटेंसिटी में हैं तो तिलोत्तमा के सत्रह साला अभिनय करियर का अनुभव साफ दिखता है। शाद अमृतसरी के किरदार में Shashank Arora का काम ध्यान खींचता है, खासकर बेलौस संवाद अदायगी में। छोटे परदे से मशहूर हुए साम-दाम-दंड-भेद के विजय नामधारी, Bhanu Uday, अशोक कुमार के किरदार में इस कदर फब रहे हैं कि वह युवा अशोक कुमार की खास संवाद अदायगी को गजब साधते दिखते हैं। एकदम जवान अशोक कुमार की संवाद अदायगी में जो नियंत्रण होना चाहिए वह भानु उदय ने बाखूबी रखा है, बहके नहीं हैं । श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग निर्मम है। फिल्म हर दृश्य में कुछ जरूरी ही कह रही होती है। सिनेमैटोग्राफर कार्तिक विजय जानते हैं कि मंटो को उभारने में कैमरा कैसे इस्तेमाल करना है। रंगप्रवणता, भावप्रवणता में योग देती दिखती है। दृश्यों में जरूरी कोण विषय के हिसाब से संतुलित संयोजन में लगते हैं। अपने प्रयोगों के लिए मशहूर स्नेहा खानवलकर इस फिल्म के संगीत में एक नयापन जरूर देती हैं, गाने सीमा में एक प्रभाव छोड़ते हैं।

इस फिल्म को देखने से पहले मंटो को थोड़ा पढ़ लिया जाय तो फिल्म की ईमानदारी साफ़ दिखेगी। फिल्म देखने के बाद मंटो के लिखे में दिलचस्पी यकीनन और बढ़ेगी। एक बॉयोपिक फिल्म को बहुत छेड़ा नहीं जा सकता, हद से हद मनचाही घटनायें चुनी जा सकती हैं और समकालीन सन्दर्भों में से कुछ का चयन किया जा सकता है। लेकिन नंदिता दास की यह फिल्म समाज के दोहरेपन, राजनीति के दोहरेपन, इतिहास के दोहरेपन, मर्द के दोहरेपन, मानव-स्वभाव के दोहरेपन, साहित्य-समाज के दोहरेपन, फिल्म-समाज के दोहरेपन के साथ-साथ लेखक की दोहरी ज़िंदगी के विडंबनाओं को भी बिना लिहाज उघाड़ देती है। फिल्म भी उसी दोहरेपन पर खतम होती है, जहाँ पागल टोबा टेक सिंह बँटवारे के दोहरेपन को देखकर बेहोश हो उठता है।

मंटो इतना ही लिखना चाह रहे, यह फिल्म इतना ही बताना चाह रही कि विभाजन किसी भी तरह का हो, पागलपन ही है। जाइये इस फिल्म को देखकर आइये, क्योंकि यह महज मनोरंजन नहीं है।

#श्रीशउवाच

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