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सिनेमा की सोच और उसका सच

Thappad Movie Review : वी शुड नीड टू रीबूट टूगेदर।

मूवी Thappad के साथ अनुभव सिन्हा ने बहस की उस डोर को हर आँगन पहुँचा दिया है। हमारी आँखों ने देखा ही नहीं कि हमारे परिवारों में हम क्या किए जा रहे हैं जाने कबसे, शायद शुरू से। सबसे खतरनाक बीमारी वो होती है जो लगती ही नहीं कि बीमारी है।

Special Feature On Film ‘दो पैसे की धूप, चार आने की बारिश’

कुछ फ़िल्में (Film) देखकर मन उखड़ता ही है कि कोई एक जिंदा फ़िल्म फिर से सिनेमा से मुहब्बत को जवां कर देती है। नेटफ्लिक्स पर कुछ अच्छा ढूँढ रहा था, एक फिल्म का पोस्टर बार-बार सामने आता था, मैं इसका नाम पढ़ता था और यह सोचकर कुछ और खोजने लगता…

“कीचड़ बहुत है? लोग भी बहुत हैं।” : Article 15 पर डॉ. श्रीश पाठक की राय

तुम बिन की ताजी बयार वाले रोमानी निर्देशक में सहसा यह साहस आ जाना कि कला हस्तक्षेप का भी पुरजोर माध्यम है और ऐसा करते हुए मनोरंजन भी संजोया जा सकता है; एक बेहद ही राहत देने वाली बात है। पढ़िए Article15 पर डॉ. श्रीश पाठक की राय

Mirzapur को क्या ऐसी बारीकी से देखा आपने ?

Mirzapur में एक्शन सींस पर मेहनत हुई है, कैमरा एंगल लुभाते हैं। संगीत भी इस सीरीज का एक उम्दा पक्ष है, जो अमूमन नेगलेक्ट किया जाता है फिल्मों से इतर।

MANTO SPECIAL REVIEW : तहजीब के मायने यों तो गहरे हो सकते थे पर फ़िलहाल पर्दादारी इसका शॉर्टकट है

मंटो एक जगह लिखते हैं कि- ‘उन्हें सियासत में उतनी ही दिलचस्पी रही जितनी गाँधी जी को फिल्मों में। गाँधी जी को फिल्म देखनी चाहिए और मुझे सियासत में दिलचस्पी रखनी चाहिए थी।’ तहज़ीब न गाँधी को कुबूल कर पायी और न मंटो को।