FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

गंगा की धारा पर गाने वाले महान गायक को भारत का सर्वोच्च सम्मान

0 374

भारत के महान लोक और पार्श्व गायक स्व. भूपेन हजारिका को भारत सरकार देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ सम्मानित कर रही है…मूल रूप से एक लोक कलाकार होने के नाते दिवंगत भूपेन हजारिका का ये सम्मान लोक जगत के साथ-साथ पूरे संगीत जगत के लिए एक बहुत बड़े सम्मान की बात है….


8 सिंतबर 1926 में असम के सदिया में भूपेन हजारिका का जन्म हुआ था…10 भाई-बहनों में सबसे बड़े हजारिका को गाने की प्रेरणा अपनी मां से मिली…भूपेन हजारिका विलक्षण कलाकार थे… उन्होने बचपन में ही असमिया भाषा में गाना शुरू कर दिया….उस वक्त फिल्मकार ज्योतिप्रसाद ने जब उनकी आवाज सुनी तो वो बहुत प्रभावित हुए और उन्होने हजारिका से अपनी फिल्म ‘इंद्रामालती’ के लिए 2 गाने रिकॉर्ड करा लिए और इस तरह साल 1936 में महज 10 साल की उम्र में ही असम सम्राट के संगीत का सफर शुरू हो गया…


भूपेन हजारिका ने असम में अपनी इंटर तक की पढ़ाई पूरी और आगे की पढ़ाई के लिए वो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी चले गए…हालांकि उनके बनारस जाने से भी एक बड़ा दिलचस्प किस्सा जुड़ा हुआ है…बात सन 1947 की है जब राष्ट्र पिता महात्मा गांधी असम के अपने अंतिम प्रवास के दौरान गुवाहाटी के शरणिया पहाड़ी पर एक झोपड़ी में ठहरे हुए थे…जहां उनसे मिलने असम के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बरदलै और प्रसिद्ध गीतकार विष्णु प्रसाद राभा पहुंचे…बातों-बातों में बापू ने उनसे महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव रचित बरगीत सुनने की इच्छा जाहिर की…अब बापू की इच्छा पूरी करने के लिए गोपीनाथ बरदलै और विष्णु प्रसाद भूपेन हजारिका को ढूंढते-ढूंढते उनके पिता के घर पहुंचे…जहां उन्होने बताया कि युवा भूपेन आगे की शिक्षा के लिए बनारस चला गया है…अब इस बात को लेकर गोपीनाथ और विष्णु प्रसाद बहुत परेशान हो गए…तभी विष्णु प्रसाद ने भूपेन की बहन सुदक्षिणा का नाम सुझाया…दरअसल उस समय सुदक्षिणा विष्णु प्रसाद राभा से ही संगीत का प्रशिक्षण ले रही थीं…जिसके बाद सुदक्षिणा ने ही बापू के सामने बरगीत पेश किया….


बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में एम.ए. करने के बाद भूपेन हजारिका आगे की पढ़ाई के लिए विदेश चले गए…भूपेन ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पीएचडी की….अमेरिका में पढ़ाई के दौरान भूपेन की मुलाकात प्रियम्वदा पटेल से हुई…दोनों में प्यार हुआ और उन्होने वहीं पर साल 1950 में प्रियम्वदा से शादी कर ली…वहां उन दोनों को एक बेटा हुआ, जिसके बाद हजारिका पूरे परिवार के साथ वापस गुवाहाटी आ गए…लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था…वापस आने के बाद भूपेन हाजारिका ने गुवाहटी यूनिवर्सिटी में अध्यापक की नौकरी कर ली…हालांकि वो ज्यादा वक्त तक ये नौकरी कर नहीं पाए और इस्तीफा दे दिया….जिसके बाद घर में पैसों की तंगी होने लगी और इसी कारण प्रियम्वदा ने उन्हे छोड़ दिया…जिसके बाद हजारिका ने संगीत को ही अपना साथी बना लिया…हालांकि उनकी पत्नी प्रियम्वदा ने एक बार एक असम चैनल को दिए इंटरव्यू में अपने तलाक की वजह भारत की स्वरकोकिला लता मंगेशकर को बताया था…
प्रियम्वदा ने कहा कि लता उनके पति भूपेन से बेहद प्यार करती थी और उनसे शादी करना चाहती थी…उन्होने इस बात का जिक्र अपनी आत्मकथा ‘मोई एती जजाबार’ में भी किया है….हालांकि इस बात में कितनी सच्चाई है ये कोई खालिस तौर पर नहीं कह सकता…क्योंकि अपनी पत्नी और परिवार से अलग होने के कुछ वक्त बाद से भूपेन अभिनेत्री, निर्माता और निर्देशक कल्पना लाजमी के साथ मरते दम तक रहे….


कल्पना लाजमी महज 17 साल की थी जब उन्होने अपने से 28 साल बड़े भूपेन हजारिका को पहली बार देखा और उन्हे देखते ही कल्पना को उनसे पहली नजर का प्यार हो गया…जिसके बाद दोनों ने 40 साल का लंबा वक्त एक दूसरे के साथ गुजारा…कल्पना ने भूपेन हजारिका के साथ अपने वक्त को किताब की शक्ल दी, जिसका नाम ‘Bhupen Hazarika: As i knew him’ है…इस किताब में उन्होने लिखा है, भूपेन हजारिका के साथ मेरी प्रेम कहानी अलहदा थी, भूपेन के साथ 40 साल खुशियों से भरी व्यक्तिगत और अशांत यात्रा रही, जिसने हमारे किरदारों पर गहरा प्रभाव छोड़ा…लाजमी ने लिखा कि 40 साल बाद भी मेरे प्यार का प्रतिबिम्ब उनकी आंखों में नजर आता था…वो कल्पना की ही फिल्म थी जिसकी एक गाने को जिस किसी ने सुना उसकी आंखे भर आई…फिल्म थी ‘रूदाली’ और गाना था ‘दिल हूम हूम करें’ जिसे गाया था भूपेन हजारिका ने….
साल 1993 जब कल्पना लाजमी की फिल्म ‘रूदाली’ पर्दे पर आई तो फिल्म के साथ-साथ उसके संगीत ने भी एक अलग मुकाम बनाया…एक ऑफबीट और उसका फिल्म के परिवेश में बुना गया संगीत…फिल्म के संगीतकार भूपेन हजारिका थे…और उन्होने अपने लोक कला का साथ निभाते हुए रूदाली का संगीत सजाया था…हालांकि उस दौर में इस फिल्म के संगीत को जो तवज्जो मिलनी चाहिए वो मिली नहीं…लेकिन आज भी जब कभी भूपेन हजारिका का नाम आता है तो अनायस ही ये गाना जुबान पर आ जाता है….और आता है एक और गीत…’गंगा बहती हो क्यों’…
ब्रह्मपुत्र के कवि भूपेन हजारिका यूं तो असम के सबसे शुरूआती दौर के कवि, गीतकार, गायक और संगीतकारों में से एक गिने जाते है और उन्होने हजारों गीत और कविताएं लिखी है….लेकिन अपने शुरूआती दिनों में विदेश प्रवास के दौरान उनकी मुलाकात पॉल रॉब्सन से हुई….पॉल लोकगायक थे जो उस वक्त अमेरिका में रंगभेद के खिलाफ लड़ रहे थे…रॉब्सन से मुलाकात ने युवा भूपेन पर गहरी छाप छोड़ी….भूपेन हजारिका की आवाज अलग थी और सुनने वालों पर गहरा असर करती थी….ऐसी आवाज जिसमें विलाप था, असंतोष था, विद्रोह था, उपेक्षितों का दर्द था और निरूत्तर कर देने वाला सवाल…’गंगा बहती हो क्यों’
सिर्फ ये ही नहीं भूपेन दा ने कई बार अपने संगीत के माध्यम से लोगों की सोच पर भीन असर किया, जैसे कल्पना लाजमी की फिल्म ‘दरमियां’…जहां वो किन्नरों के लिए ‘दुनिया पराई लोग यहां बेगाने’ गाते हुए सुनाई देते है….भूपेन दा के संगीत और सोच का असर ये था कि बड़े-बड़े नेता-अभिनेता उनके प्रशंसक थे….ऐसे ही एक फैन थे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न स्व. अटल बिहारी वाजपयी जी…
बात 90 के दशक की है….भूपेन दा दिल्ली के रामलीला मैदान में एक कार्यक्रम पेश कर रहे थे…उस वक्त वहां अटल बिहारी वाजपयी जी भी मौजूद थे…वो वहां एक गीत सुनने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे….लेकिन जब कार्यक्रम अपने अंतिम क्षण में पहुंच गया और वो गाना नहीं आया तो बेताब अटलजी ने हजारिका जी को एक पर्ची भिजवाई…पर्ची पर भूपेन दा का लोकप्रिय गाना ‘मोई एती जाजाबोर’ गाने की फरमाईश थी और पीछे अटलजी का नाम लिखा हुआ था….जिसके बाद भूपेन दा ने वो गाना गया…बाद में जब वो अटलजी से मिले तो उन्हे पता चला कि वो पहली पंक्ति में बैठे हुए और इस गीत का इंतजार कर रहे थे….
आज संगीत के पुरोधा भूपेन दा हमारे बीच नहीं है…लेकिन उनका संगीत और उस संगीत के पीछे की सोच मौजूद है जो कि बहुत गहरी है और कभी मिटाई नहीं जा सकती….वो सुनने वालों के मन-मस्तिष्क पर गहरा असर छोड़ी है….भूपेन दा के इस अप्रतिम योगदान के लिए संगीत जगत उनका हमेशा आभारी रहेगा…

Leave A Reply

Your email address will not be published.