हरमंदिर सिंह हमराज़ का काम बोलता है
कानपुर निवासी हरमन्दिर सिंह हमराज द्वारा संकलित ‘हिन्दी फ़िल्म गीतकोश’ की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम ।आपने लगनशील प्रयास से भारतीय सिनेमा को एक अमर सौग़ात देने का काम किया।हिन्दी फिल्म गीतकोश का समयकाल पांच दशकों में फैला हुआ है। हमराज जी ने इसमें सन तीस से सन अस्सी तक के हिन्दी फ़िल्मी गीतों को बड़ी खूबसूरती से संजोया।
अकेले आदमी ने वो कर दिखाया, जिसे संस्थाएं,बाज़ार एवं सरकारें भी नहीं कर सकीं। कानपुर निवासी हरमन्दिर सिंह हमराज द्वारा संकलित ‘हिन्दी फ़िल्म गीतकोश’ की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम ।आपने लगनशील प्रयास से भारतीय सिनेमा को एक अमर सौग़ात देने का काम किया।हिन्दी फिल्म गीतकोश का समयकाल पांच दशकों में फैला हुआ है। हमराज जी ने इसमें सन तीस से सन अस्सी तक के हिन्दी फ़िल्मी गीतों को बड़ी खूबसूरती से संजोया।
संगीत के कद्रदानों के बीच हमराज जी एक ख़ास मुकाम रखते हैं। जो कभी महज़ एक शौक़ था, धीरे-धीरे पेशे में तब्दील हो गया। मां और नानी को संगीत से बेहद लगाव था। नानी तो एक बेहतरीन गायिका भी थी। संगीत को लेकर दीवानागी को पारिवार से बहुत समर्थन मिला फिल्मी गीतों को एक जगह नोट करने का शौक स्कूल के दिनों से था।उन दिनों भूले बिसरे गीतों की महफिल अक्सर रेडियो सीलॉन पर सजा करती थी। सीलॉन पर गीतांजली में श्रोताओं की भागीदारी जानकर हमराज के अंदर के रिसर्चर को काफी प्रेरणा मिली।
बैंक की नौकरी में से वक्त निकालकर संगीत साधना को देते रहे। इस जुनूं को फिरोज रंगूनवाला की शख्सियत में मार्गदर्शक मिला। फिरोज साहब की ‘भारतीय चलचित्र का इतिहास’ आपकी साधना का आधार बनी। हालांकि गीतों के ऊपर विशेष जानकारी रेडियो सीलॉन व विविध भारती से ही मिली। हरमिंदर जी का शोध अनेक पड़ावो का समागम रहा…रेडियो पर कभी-कभार ही प्रसारित होने वाले गानों को नोट करने से शुरू हुआ यह काम ‘माधुरी‘ में लिखने तक पहुंचा। माधुरी के माध्यम से सीधे पाठकों से संवाद किया। जिसमें गीतों के संकलन हेतु सहयोग का आहवान था।कभी कभी वहां से भी मदद मिली जहां पर उम्मीद की बिल्कुल नहीं थी। संगीत प्रेमी आर. के. लाल के मामले में यही हुआ। इंदौर से ताल्लुक रखने वाले लाल साहेब ने जनाब शंकरलाल की दुकान में बेशकीमती बुकलेट्स से परिचित कराया।
हालात ने किताब की दुकान को पान की दुकान में तब्दील कर दिया था। स्वभाव से चिडचिडे शंकरलाल को बड़ी मुश्किल से मनाया गया। आरके लाल की जान पहचान के दम पर बेशकीमती फिल्मी बुकलेट्स को खरीदने का सपना पूरा हुआ। इसमे आपको 1930-40 बीच की रिलीज़ फिल्मों के गीत मिले। फ़िर बीसवें दशक से जुड़े फिल्मी दस्तावेज़ मिले। उस ज़माने में निर्माताओं को फिल्म से जुड़ा हर एक ब्योरा सेंसर बोर्ड को देना होता था। इसमें गानों का लिखित उल्लेख किया जाता था। इस महत्वपूर्ण खोज में भी हालांकि हमराज को गायकों का नाम नहीं मिला। इस कमी को एचएमवी के दुर्लभ रिकार्डस ने पूरा किया।
अगला पड़ाव प्रकाशक के खोज की थी। इसके लिए हरमंदिर ने 25000/- की रक़म किसी तरह अपने बोनस व सहयोग से जमा कर ली। यकीं तो नहीं होता लेकिन हरमंदिर हमराज की शख्सियत ने बड़े पैमाने के काम को खूबसूरती से अंजाम दिया। हमराज जी के मित्र यसीन दलाल को भरोसा ही नहीं था कि कोई अकेला आदमी फिल्मी गीतों का इतना वृहद संकलन लिख सकता है ! वे ही नहीं इस प्रयास ने हर पाठक को चौंका दिया था ।हिन्दी फिल्मी गीतों को समर्पित इस महान काम को कोई भी विशेष संस्थागत सहयोग नहीं मिला।
एक व्यक्ति ने सरकार से मदद लेने का मशविरा दिया। लेकिन अगले ही पल उदासीन हो पड़ा। हरमंदिर जी को बहुत बाद में पता लगा कि वो आदमी और कोई नहीं बल्कि एक मिनिस्टर था। हरमिंदर हमराज के रिसर्च वर्क राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखाग्रह से पुस्तको से कोई विशेष सहयोग नहीं मिला।हालांकि साथियों की मदद से पुरानी फिल्मी पत्रिकाओं को पढ़ने का अवसर ज़रूर मददगार रहा ।तीन खंडों में तीसरे खंड की पुस्तक पहले प्रकाशित हो सकी। यह सन 1980 में साया हुआ।
हालांकि अजमेर के रतन लाल कटारिया ने रुपए से सहयोग दिया किंतु पहला खंड पहले नहीं आ सका. पहला खंड 1988-89 में प्रकाशित हुआ..हरमंदिर हमराज को मालूम था कि पहले खंड को पहले निकालने का लाभ नहीं क्योंकि उसमें बहुत पुराने गीत संकलित थे। इन गीतों को लेकर पाठकों में रुचि नहीं होती। गानों के ऊपर एकत्र जानकारी को पक्का करने का मसला भी हरमिंदर जी को रोके रहा। अगली चुनौती इस संग्रह का डिजिटल संस्करण निकालने की थी। गीतकोश को डिजिटल रुप देने में दिल्ली के सुधीर कपूर का सहयोग मिला। अप्रेल 2018 में इस संग्रह का छठा वॉल्यूम आया।