काबिलियत के दम पर कई अवार्ड्स जीतने वाली फिल्म ‘ गली बॉय’
यह कहानी अपने जूनून को पूरा करने की है। उसके पीछे तब तक भागने की है जब तक वो सच्चाई न बन जाए। हर मुश्किल का सामना करके अपनी किस्मत पलटना फ़िल्म का सार है।
रैपिंग दुनिया भर में संगीत का एक पॉपुलर फॉर्म है । यह गलियों से ऊपर उठकर आया और अब समाज के हर वर्ग में पंसदीदा संगीत फ़ोर्म बन गया । भारत में भी रैपिंग में डिवाइन और नेज़ी ने काफ़ी नाम कमाया ।
ज़ोया अख़्तर की पुरस्कृत ‘ गली बॉय’ इसी दुनिया को महसूस कराने वाली शानदार फिल्म है। गली बॉय झुग्गी बस्ती में रहने वाले एक साधारण शख्स की कहानी है जिसकी जिंदगी काबलियत के दम पर बदल जाती है ।
मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ का शुमार विश्व सिनेमा की बेहतरीन फिल्मों में है। मुंबई की झुग्गियों में सांस लेने वाली कठिन जिंदगियों का यथार्थ इससे बेहतर शायद ही दिखाया गया हो। अस्सी की दशक में आई यह फिल्म यथार्थ का जादुई असर रखती है। रणवीर सिंह की फिल्म के निर्माण में सलाम बॉम्बे जरूर पहली प्रेरणा रही होगी।
हम ‘गली बॉय’ देखते वक्त झोपड़पट्टियों से पटी पड़ी धारावी को सांस लेते हुए महसूस कर पाते हैं। सिनेमेटोग्राफर जय ओज़ा- प्रोडक्शन डिजाइनर सुजैन ने धारावी के जीवन को जीवंत दिखाया । लेकिन स्वयं ज़ोया भी धारावी को एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर नजरशानी करती नहीं मालूम होती। उन्होंने फिल्म को झुग्गियों में पले-बढ़े किसी शख्स तरह दिखाया । फिल्म के पीछे यह मेहनत ही दरअसल उसे ख़ास कर गई। फिल्म धारावी को भी एक किरदार मानकर चली है।
कहानी मुंबई के धारावी के मुराद (रणवीर सिंह) की है । मुराद की मेडिकल स्टूडेंट, सफ़ीना (आलिया भट्ट) से दोस्ती है। सफ़ीना रूढ़िवादी उच्च मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती है । जबकि मुराद एक मामूली से मुस्लिम परिवार का है। एक दिन उसकी मुलाक़ात रैपर एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) से होती है । शेर मुराद को रैप करने के लिए प्रेरित करता है । यहीं से उसकी जिंदगी में बदलाव की नींव पड़ जाती है। इसके बाद आगे क्या होता है, यह बाकी फ़िल्म की कहानी है । ग़रीबी से उठकर शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचने वाले रैपर्स के जीवन से प्रभावित ‘गली बॉय’ भीड़ में खोए हुनरमंदों की कहानी है।
एक साधारण से ड्राइवर के लड़के मुराद ( रणवीर सिंह) के अपने सपनों को पहचानने की कहानी है। मुराद सपनों को पंख देकर उड़ना सीखता है। फर्श से अर्श तक का सफर तय करता है।
अभिनय पक्ष की बात करें तो सबसे पहले शीर्षक रोल करने वाले रणवीर सिंह की तरफ ध्यान जाता है। मुराद के रूप में रणवीर ने किरदार की बारीकियों को नज़दीक से पकड़ा है। रैपर के रूप में वह छा गए है । कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि वह महज भूमिका निभा रहे । वहीं आलिया भट्ट भी फ़ोर्म में नजर आई । दोनों मुख्य लीड कलाकारों ने कमाल का काम किया है। हालांकि सहायक अभिनेता सिद्धान्त चतुर्वेदी अपने अभिनय से सभी को चौंकाते है। वहीं मुराद के पिता के रोल में में विजय राज़ भी ध्यान आकर्षित करने वाला काम किया है। एक बेहतरीन फिल्म का धीरे धीरे हरेक पहलू दमदार
महसूस होने लगता है।
गली बॉय किस्म की कहानियां की थीम ऐसी ही होती है । फिल्म खेल आधारित हों या फिर संगीत – उनकी पटकथा दरअसल कामयाबी की कहानी होती है। ज्यादातर सक्सेस स्टोरीज ख़ास टेकनीक का उपयोग करती हैं । ज़ोया अख़्तर की ‘गली बॉय’ में भी वही तमाम बारीकियां देखने को मिलती हैं। रीमा कागती और जोया अख्तर की कहानी बांधे रखने वाली है । मुराद का किरदार और उसके आस-पास की दुनिया का बारीकी से चित्रण है ।
फ़िल्म जुनून, महत्वाकांक्षा को दर्शाती है और साथ ही गरीबी, सामाजिक स्तर, बाल अपराध, बहु विवाह इत्यादि पर भी टिप्पणी करती है । किन्तु मुुख्य स्वर जिंदगी की जीत में यकीं है। रीमा कागती -जोया अख्तर की पटकथा इसे बहुत प्रेरक फ्रेम से दिखाती है।
यह कहानी अपने जूनून को पूरा करने की है। उसके पीछे तब तक भागने की है जब तक वो सच्चाई न बन जाए। हर मुश्किल का सामना करके अपनी किस्मत पलटना फ़िल्म का सार है।
रैप की जड़ें अमेरिका को जाती हैं। वहां जब रैप म्युज़िक आया तो उसके जनको को अंदाजा भी नहीं था कि वो दबी-कुचली आवाज़ों को कितना बड़ी शक्ति दे रहे हैं। भोगे हुए यथार्थ को अपने समूचे Raw फॉर्म में पेश करने की छूट रैप देता है। अभिव्यक्ति का ऐसा अनूठापन कही दूसरी जगह नहीं।
