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‘दे दे प्यार दे’ : पुराने विषय में नया तलाशती फ़िल्म

लव रंजन की पहले की फिल्मों की तरह यहां गहराई नहीं। फ़िल्म हिट तो हो जाएगी लेकिन लोग इसे याद नहीं रखेंगे। पुराने विषय में नया तलाशने की कोशिश हां जरुर कही जाएगी।

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अजय देवगन, तब्बू और रकुल प्रीत की ‘दे दे प्यार दे’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। उम्र के अंतर वाले प्रेमियों की दिलचस्प कहानी कहती यह फ़िल्म है। स्टीरियोटाइपड इंटरटेनर है। उम्र की दो सीमाओं पे खड़े प्रेमियों के बीच उम्र का फासला ज़्यादा है। फिर भी दोनों एक दूसरे की तरफ़ आकर्षित होते हैं। प्यार होता है। शादी तक बात जाती है। इस रुमानियत की फिल्में पहले भी बन चुकी हैं । आपको तब्बू से लेकर अक्षय खन्ना नसरुद्दीन शाह अमिताभ बच्चन के चेहरे याद होंगे। एक ही किस्म की कहानी को नई कास्टिंग कर देने से फिल्में कमाल नहीं बन जाती। इस मामले में अकिव अली की फ़िल्म न बहोत निराश करती है। ना ही ज़्यादा उम्मीद बांधती है।

फिल्म लंदन में रहने वाले बिजनसमैन आशीष (अजय देवगन) की कहानी है। आशीष भारत में रहने वाली अपनी पत्नी मंजू (तब्बू) और बच्चों से कई साल पहले अलग हो चुके हैं । उसकी अकेली जिंदगी में उसकी बेटी की हमउम्र दिलकश आएशा (रकुल प्रीत सिंह) दाखिल होती है। इस बेमेल जोड़ी को देखकर आशीष का डॉक्टर दोस्त राजेश (जावेद जाफरी) उसे समझाता है कि खूबसूरत जवान लड़कियां अक्सर दौलतमंद लोगों की दौलत के लिए ऐसे रिश्ते बनाती हैं। इस सलाह से बेपरवाह आशीष आएशा एक-दूसरे के काफी करीब आ जाते हैं। मामला शादी तक आ जाता है। लेकिन इससे पहले आशीष आएशा को अपने पहले परिवार से मिलवाने के लिए भारत लाता है। यहां आशीष की बेटी की शादी की बात चल रही है। यहां से कहानी में कई मजेदार मोड़ आते हैं।

अभिनय की बात करें तो अनुभवी तब्बू हमेशा अपनी फिल्मों के चुनाव से चौकाती रहीं हैं। इस फ़िल्म में भी उनकी मौजूदगी ताज़ी हवा का झोंका सा है। चुलबुली रकुल प्रीत के बिंदास अंदाज़ को कड़ी टक्कर देती हैं। तब्बू में आज भी बहुत संभावना है। अजय देवगन के साथ उन्होंने पहले भी बेहतरीन फिल्में की हैं । अलग अलग किस्म के किरदार निभाए हैं। इस बार भी वो प्रभावित करती हैं। रकुल प्रीत बिंदास अंदाज़ में भाती हैं। आयशा के किरदार को सीमाओं के बावजूद अच्छे से जीया है। रकुल प्रीत ताजगी का एहसास देती हैं। आव भाव व आवरण से रुचि जगाती हैं।

अजय देवगन गंभीर व लाइट फिल्मों का बड़ा अच्छा संतुलन शुरू से लेकर चल रहे हैं। लव रंजन की फ़िल्म में दर्शक उनका हल्का फुल्का प्रारूप पसंद कर रहे हैं। जिमी शेरगिल पांच मिनट स्क्रीन टाइम में भी कमाल करना जानते हैं। जावेद जाफ़री का किरदार भी फ़िल्म के होने की वजह है। आलोक नाथ को भी आप यहां नोटिस करेंगे। दरअसल केमियो फिल्मों की छुपी हुई ताकत होते हैं। फ़िल्म हालांकि रूटीन कहानी वाली है। फिर भी इस अंदाज के किरदारों से लोग रिलेट करते हैं। कितुं लव रंजन की पहले की फिल्मों की तरह गहराई नहीं नज़र आती। फ़िल्म हिट तो हो जाएगी लेकिन लोग इसे याद नहीं रखेंगे। पुराने विषय में नया तलाशने की कोशिश हां जरुर कही जाएगी।

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