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ऋतिक रोशन और खोजा बंगले का कनेक्शन

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फिल्मसिटी वर्ल्ड के लिए ये लेख लिखा है अग्निपथ ( 2012 ) के सह संवाद लेखक अविनाश घोडके ने।

सन 2000 में टीवी सीरियल प्रवाह का पायलट एपिसोड लिखने के बाद 3एक टेलीफिल्म राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन के लिए लिख चुका था ।प्रवाह में अल्का कुबल के साथ वर्सोवा, यारी रोड के खोजा बंगले में एक दिन का पायलट शूट करने शूट प्लान डायरेक्टर आनंद शिशुपाल ने दिया..साथ ही ये भी कहा कि “अविनाश जी आप सुबह 9 बजे आ जाएं तो बेहतर” उसी दौरान मेरे घर में छोटे भाई की शादी का माहौल था.. शूटिंग वाले दिन रिसेप्शन था लेकिन चूँकि काम काम है और सबसे पहले काम है तो मैं तय समय पर पहुँच गया । सोचा कि शाम को जल्दी निकलकर ठाणे ( मुंबई का एक इलाका) रिसेप्शन में पहुँच जाऊंगा ..ये सब सोचते हुए जब बंगले के अंदर जा रहा था तो साइड में एक और फिल्म की शूटिंग जारी थी…उस फिल्म का जवान नायक शान्ति से चुपचाप एक कोने में उस झमाझम लाइटिंग के तामझाम से अलग खड़ा था.. यकीन करना मुश्किल हुआ कि कुछ दिनों पहले रिलीज़ हुई सुपर डुपर हिट “कहो ना प्यार है” का नवोदित सुपर स्टार ऋतिक रोशन यूं शांत और विनम्र चुपचाप खड़ा था । मैंने अंदर जाते हुए जब मुड़कर देखा तब भी वही शान्ति और नम्रता उस सुपरस्टार के चेहरे पर चमक रही थी । उसके पास से निकलकर जाना और उसका विनम्रता से मुझे रास्ता देना मेरे दिल को छू गया ।

कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है और एक बार फिर उस आकर्षक व्यक्त्वि और नम्रता के धनी ऋतिक रोशन के साथ दूसरी स्क्रिप्ट “फिजा” का शूट भी खोजा बंगले में हुआ और मैं उस दौरान उसको कहो ना प्यार है के लवर बॉय से भटके हुए आतंकवादी की भूमिका को सहज निभाते हुए देख रहा था ।

अपने करियर में मॉडल, लवर बॉय, चॉकलेट बॉय या किसी एक इमेज से कहीं अधिक स्वयं के अभिनय से अपने आप को ऋतिक ने सिद्ध किया है । मैं “अग्निपथ” में विजय दीनानाथ चव्हाण के इंतकाम की आग चूंकि अमिताभ बच्चन साहब के अभिनय में देख चुका था और धर्मा प्रोडक्शंस के “अग्निपथ” में जब ऋतिक रोशन का नाम आया तो मन आशंकित था.. लेकिन उसकी आँखों के अंगार ने असंभव को संभव कर दिखाया । फिल्म ने विजय की नयी परिभाषा गढ़ी।

ऋतिक भले ही मंझे हुए न हों..लेकिन शांत हैं…काम के प्रति समर्पित हैं..गजब के मेहनती हैं..काम के प्रति समर्पण का वही रूप ऋतिक का मैंने अपनी फिल्म अग्निपथ के ओपनिंग सीक्वेंस के दौरान उसी खोजा बंगले में देखा.. इतने सालों के बाद भी वो उसी तरीके से शांत और समर्पित नजर आये…ये भंगिमा देख मैं अपनी पुरानी यादों के गलियारों से होकर आ गया ।

कुछ लोग देवदूत से होते है और उनसे परे निकल पाना वास्तव में असंभव होता है ।

📝 अविनाश घोडके

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