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रोमांचक फिल्मों में अगली कड़ी हो सकती थी ‘बदला’

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स्पैनिश फिल्म ‘द इनविज़िबल गेस्ट’ की आधिकारिक रिमेक ‘बदला’ एक रोमांचक फॉर्म की अच्छी कोशिश है। फ़िल्म मुख्यत किरदारों नैना सेठी (तापसी पन्नू) और बादल गुप्ता (अमिताभ बच्चन) की कहानी है। नैना सेठी पर आरोप है कि उसने होटल के एक कमरे में अपने बॉय फ्रेंड अर्जुन (टोनी ल्यूक) की हत्या कर दी है। वो वकील बादल गुप्ता केस लड़ने लिए कहती है। गुप्ता एक जानेमाने वकील हैं। नैना को अपनी बात रखने के लिए वो तीन घंटे देते हैैं। नैना अपनी आपबीती बताना शुरू करती है।

तीन घंटे की बातचीत में कई रहस्य उजागर होते हैं। नैना को कौन फंसा रहा है। अर्जुन की हत्या किसने की है। क्या बादल गुप्ता अपने मुवक्किल को बचा पाएगा। कई प्रश्नों के उत्तर उजागर होते हैं। बातचीत के दरम्यान दरअसल सच का खुलासा होता है। फिल्म की मूल कहानी ओरिओल पाउलो की है । जोकि आपको बांध कर रखती है। जैसे-जैसे विस्तार बढ़ता है तथ्य सामने आने लगते हैं। जिस किसी ने भी ‘द इनविज़िबल गेस्ट’ देखी उसने ‘बदला’ नहीं देखी होगी। क्योंकि हिंदी रीमेक में ख़ास बदलाव नहीं मिलते।

अभिनय की बात करें तो अभिताभ बच्चन एक तेज तर्रार वकील के किरदार में दमदार दिखे हैं। उन्हें कई भारी भरकम डायलॉग्स भी दिये गए हैं, जो प्रभावित करते हैं। वहीं तापसी पन्नू भी बढ़िया हैं। उनके किरदार में कई परते हैं, जो हर सीन के साथ आपके सामने आती है। कहना होगा कि बदला तापसी के अच्छे किरदारों में जाएगी। अमृता सिंह भी अपने किरदार के साथ न्याय करती हैं। अमृता सिंह को ज्यादा से ज़्यादा रोल मिलने चाहिए । बदला की वो सरप्राइज़ ताक़त साबित हुई । मानव कौल ने न्यायिक सलाहकार के अपने किरदार से प्रभावित किया । वहीं मलयालम एक्टर टोनी ल्यूक के बॉलीवुड डेब्यू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अविक मुखोपाध्याय की सिनेमेटोग्राफी ठीक है।

फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी दिलचस्प पहलू है। सुजॉय घोष की फिल्म एहसास दिलाती है कि कभी कभी जो आपके बिल्कुल सामने होता है, आप उसे ही नहीं देख पाते। पिंक के बाद अमिताभ बच्चन- तापसी पन्नू फिर साथ आए। दोनों ने अपने अपने किरदारों को निभाया है । पिंक, मनमर्जियां, मुल्क जैसी फिल्मों के जरिये तापसी अपनी प्रतिभा पहले ही कायम कर चुकी थीं। अमिताभ के साथ तापसी का सामंजस्य अच्छा बनता है। फिल्म में संवाद उम्दा हैं। लेकिन थोड़े और होते तो अच्छा। इस किस्म की पटकथा में गानों के लिए संभावना रहती नहीं। यहां भी नहीं थी।

ज्यादातर घटनाक्रम एक घर के अंदर घटता है। मुख्य किरदारों के बीच संवाद टेबल के आर-पार बैठकर होता है। बदला उस स्तर का तनाव हालांकि लगातार बरकरार नहीं रख पाती जैसा कि घोर बातचीत आधारित ‘द इनविजिबल गेस्ट’ आखिर तक बरकरार रखने में कामयाब रही थी। जहां ‘द इनविजिबल गेस्ट’ एक अहम किरदार को साधारण बनाकर आखिर तक सफल रही थी। जबकि ‘बदला’ शुरू से उसी किरदार को फिल्म में हावी दिखाकर राज खोल देती है। अपनी मिसाल ‘कहानी’ जैसी दमदार पटकथा-को आगे बढ़ाने के लिए ही सुजॉय घोष हर साल नए-नए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इन प्रयासों में वे मौलिक लेखन की तरफ ध्यान नहीं दे रहें। बदला में बहुत कुछ होने के बावजूद ‘कहानी’ वाली बात नहीं लगी।

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