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Rishi Kapoor The Last Roman : ऋषि कपूर से जुड़ा एक ऐसा किस्सा जो पक्का आपको नहीं मालूम

फिल्मसिटी वर्ल्ड के लिए फिल्म अग्निपथ के सेट Rishi Kapoor से जुड़ा एक खास किस्सा लेकर आए हैं फिल्म के डायलॉग राइटर अविनाश घोडके

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“उठाईगिरा !? … ये क्या वर्ड है?  मैने तो कभी नहीं सुना .. रायटर को बुलाओ यार !”……..
‘अग्निपथ’ के सेटपर ऋषि कपूर तनतना रहे थे। रौफ लाला कांचा के मुंह पर उसे ‘ उठाईगिरा’ संबोधित करके उसे जलील कर देता है ऐसा संवाद मैने लिखा था। निर्देशक करण मल्होत्रा ने अपनी ओर से ऋषि जी को समझाने की कोशिश की लेकिन वो सुनने से रहे। “राइटर को बुलाओ” ऐसा कहते रहे। मेरे जाने पर शायद ऋषि जी मुझसे शब्द बदलवा ही लें ऐसा करण ने सोचा होगा इसलिए करण ने भी मुझे ऋषि जी के सामने ले जाना टाल दिया। इस तरह ऋषि जी के साथ मेरा ‘एनकाऊंटर’ होते होते टल गया।ऋषि जी ने संवाद में मेरा लिखा हुवा ‘उठाईगिरा’ शब्द काँचा को देखते हुए ज़लालत भरे अंदाज मे बडी ताक़त से उच्चारित किया।’एक औक़ात हीन लफ़ंगा इंसान’ यह उठाईगिरा शब्द का अर्थ मानो उनको पता ही था।
                   ‘स्विच ऑन – स्विच ऑफ‘ नाम की एक अभिनय पद्धति होती है।जिन अभिनेताओं के व्यक्तित्व का प्रभाव जनमानस पर होता है ऐसे स्टार अभिनेता इस तरह की अभिनय पद्धति प्रयोग में लाते है।इसमें किरदार के बारे बहुत सारा पूर्व पाठ या अभ्यास करना नहीं होता।निर्देशक के एक्शन बोलते ही बस पूरी ताक़त से किरदार में खुद को झोंक देना होता हैं। निर्देशक के ‘कट इट ‘ कहते ही किरदार से बाहर । ऋषि कपूर जी को इस तरह का spontaneous अभिनय करने में महारत हासिल थी। काम को एक convincing level तक लाने में बडी ताक़त लग जाती है इस तरह की अभिनय पद्धति में।अभिनेता के व्यक्तित्व में एक Aura होना भी ज़रूरी होता है। ये सब ऋषि जी के पास भरपूर था। रौफ लाला का जबरदस्त किरदार ऋषि जी ने अपने स्वाभाविक बलस्थानों की ताकत से जिंदा कर दिया। दर्शकों के दिलाें में रौफ लाला का पात्र सदा के लिये ‘ स्विच ऑन’ हो गया है।
                      सिनेमा उद्योग में आये ‘कॉरपोरेट कल्चर’ से ऋषि जी नाराज़ थे। करार नामों में लिखी ‘अभिनेता की film portion के लिये अनिर्वाय उपस्थिति ‘ वाली शर्त पर उनका बड़ा ऐतराज़ था। “ एक्टिंग भी करो… फ़िल्म प्रमोशन को भी आओ … ये क्या बात हुई !।” ऐसा वो कहते। आजकल के अभिनेता रात को भी काले चश्मे पहन के क्यों निकलते है ये उन्हें समझ नहीं आता। रेडियो से लेकिन उनकी खासी जम गयी थी ; क्यों की उसमें उनके पसंदीदा पुराने गाने बजते।वो रेडिओ एडिक्ट थे। घर में पत्नी नीतू से कोई अनबन या शाब्दिक झडप हो जाये तो वो उसपर कोई अनसुना सा कठिन अंग्रेजी शब्द फेंक देते। नीतू जी फिर झल्लाई सी सोच में पड जातीं की ये क्या शब्द है । पति ने आख़िर कहा क्या है ?… फिर डिक्शनरी खोली जाती .. शाब्दिक झड़प अब English vocabulary development का मोड़ ले लेती।उधर ऋषि जी आराम से रेडियो पर पुराने गानों का आस्वाद लेते बैठते। ऐसा अक्सर होता।  शब्द का अर्थ ना समझ आने सी होनवा ली नीतूजी की झल्लाहट की झलक शायद मेरे जरिये ऋषि जी को मिल गयी ऐसा एक हास्यास्पद तर्क भी मैं कर लेता हूं।
                   अग्निपथ शूटिंग के उस प्रसंग के बाद करण ने मुस्कुराकर कहा था “ कपूर्स की डिक्शनरी में शायद वो शब्द नहीं होगा!” । औकात हीन लफंगा इंसान इस अर्थ का शब्द कपूर्स की डिक्शनरी में हो भी कैसे। कपूर इस शब्द में ही एक production value है। फिल्म इंडस्ट्री की इस कपूर कौम ने इंडस्ट्री को बहुत कुछ दिया है।अपने काम के प्रति वे हमेंशा समर्पित और आग्रही रहे है। ऋषि जी की “रायटर को बुलाओ!” इस माँग में दरअसल उनका लेखक के प्रति विश्वास उजागर होता है। ये Old School thinking है जिसमें लेखक को मुख्य स्त्रोत माना जाता है। लेखक क्या कहना चाहता है ये जानने में इन्हें रस होता है। यही उनका इकलौता ‘मेथड’ होता है। टैक्सी ड्रायव्हर का किरदार निभाना है इसलिये वे टैक्सी चलाने का अनुभव नहीं लेते रहते। किसी भूमिका के लिये छह महीने कसरत करके बॉडी बनाना भी उन्हें नहीं आता। अपने Aura के साथ किरदार में धाड़ से छलाँग लगानेवाली  उस Old School पीढ़ी के ऋषि जी ‘ लास्ट रोमन’ होंगे शायद ।……… जिस पीढ़ी में परामर्श के लिये “ रायटर को बुलाओ ! “ ऐसा कहने की पुरानी परंपरा होगी।
~ अविनाश घोडके
सह संवाद लेखक (अग्निपथ)
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