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Modern Day Classic The Lunchbox : बेशक़ीमती ‘लंच बॉक्स’

बनने दीजिए सौ करोड़िया क्लब और दो सौ और उसके आगे के भी क्लब बनने दें क्योंकि ऐसी सस्ती फिल्मों के करोड़ों क्लब भी बनकर हिंदी सिनेमा को वो हैसियत या सम्मान नहीं दे सकते जैसा रितेश बत्रा आपकी एक प्राइसलेस लंचबॉक्स (The Lunchbox ) दे गयी।

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सस्ती चीज़ों पर लोकप्रियता की मक्खी की भनभनाहट के खीझ भरे शोर से अच्छा चंद लोगों के थियेटर से बाहर निकलकर ऐसी बेशकीमती फिल्मों के कसीदे का मधुर संगीत है जहां वो बता नहीं पा रहे थे कि The Lunchbox उन्हें किस हद तक अच्छी लगी।ना डैनी बॉयल और ना ही मीरा नायर जैसों ने भी मुंबई को इतनी बारीकी से परदे पर उतारा जितना रितेश जैसे पहली पहल वाले लाजवाब फिल्ममेकर ने साकार किया। इस कहानी का हर पात्र आपको याद रह जाने वाला है यहां तक की केवल सुनाई दे सकने वाली देशपांडे आंटी भी जिनके पति के कोमा के होने का एहसास भी आपको हमारी हिरोइन इला करा देगी। इला का किरदार निमरत कौर ने जिस सौम्यता और सटीक लहज़े में निभाया है वो अच्छी अच्छी मेनस्ट्रीम हीरोइनों के बस की बात नहीं।

एक ग़लत टिफिन के ज़रिए ज़िंदगी के उस फलसफ़े को आपको नैरेट किया जा रहा है जिससे इस वक्त आप जूझ रहे हैं। कोई औरत है जो हर जगह होकर भी अपने पति के पास नहीं है और उस अजनबी अधेड़ को टिफिन लेटर के ज़रिए सब बता रही है और उस अधेड़ को अपनी उम्रदराज़ी का पता चल रहा है क्योंकि उसके बाथरूम में वही महक उससे नथुनो में सरक रही है जो उसके बचपन में उसके दादा जी के बाथरूम से निकलने पर होती थी। एक असिस्टैंट जो उससे सीखने की ज़िद कर रहा है और स्वभाव से खट्टा होने की वजह से उम्र के इस मुहाने पर वो उसको कुछ सीखाकर अपनी अबतक कायम की गई परंपरा तोड़ने में भरोसा नहीं करना चाह रहा तो टिफिन में एक पत्र में कोई उससे कुछ कहना चाह रहा है जिसे शुरू में छोटे और बाद में बड़े जवाब देना उसे अच्छा लगने लगता है। वो दोनो जो एक दूसरे से बस पत्र के ज़रिए जुड़े हैं भूटान में साथ रहने का सोचने लगते हैं मगर उस रेस्त्रां में जब वो उस अधेड़ का इंतज़ार कर रही है तो वो बस उसे देखकर चला जाता है और बताता है कि उस नयी उमर की ब्याहता के लिए सपने देखने की उमर हैं। लेकिन जो लड़की अपने पति से ये भी नहीं पूछ सकती कि उसका अफेयर किस लड़की के साथ है वो सपने देखने की जुर्रत कैसे करे।

ये एक ऐसी फिल्म है जिसे सौ बार देखने पर भी नया नया कुछ मिलेगा आपको। समझ नहीं आ रहा कि मैं अपने पसंदीदा अभिनेता इरफान की तारीफ क्या क्या लिख कर करूं। इस किरदार की जटिलता इसकी उम्र है और इरफान जो उस उमर के आसपास भी अभी नहीं है उनके लिए ना जाने क्या ऑब्ज़र्वेशन काम आयी क्योंकि एक प्रीमेच्योर रिटायरमेंट लेने वाले प्रौढ़ के रोल को निभा पाना वो भी बिना लाउड हुए वाकई ये टैलेंटेड ही कोई कर सकता है और फिल्म के एक फलसफ़े के अनुसार टैलेंटेड लोगों की कोई कदर नहीं होती। नवाज़ुद्दीन के किरदार में नवाज़ुद्दीन का काम भी बेविकल्प कहूंगा क्योंकि वो भी किरदार किसी और के बस का नहीं। कुल मिलाकर द लंचबॉक्स ना केवल इस साल की बल्कि गये कई सालों की सबसे बेहतरीन कृति है।

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