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Mirzapur को क्या ऐसी बारीकी से देखा आपने ?

Mirzapur में एक्शन सींस पर मेहनत हुई है, कैमरा एंगल लुभाते हैं। संगीत भी इस सीरीज का एक उम्दा पक्ष है, जो अमूमन नेगलेक्ट किया जाता है फिल्मों से इतर।

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Mirzapur को डॉ. श्रीश पाठक के चश्मों से देखने का मज़ा आप इस लेख को पूरा पढ़ने के बाद ही पायेंगे..

हम बात आज वेब सीरीज़ Mirzapur की कर रहे हैं जिसके बारे में श्रीश जी लिखते हैं कि पूर्वांचल का जो अंचल है वहाँ मर्द का मतलब महज मकान और गाड़ी वाला होना है और औरत मतलब बच्चे वाली होना है। राजनीति को लेकर यहाँ किसी को कोई मुगालता नहीं है, सब जानते हैं कि इससे चोखा धंधा नहीं है। चुनाव लाटरी है, पुलिस प्रशासन भौकाल है, कचहरी थिएटर। बचपन में हनुमान चालीसा और फिर जिंदगी भर लक्ष्मी चालीसा बांचने का रिवाज है यहाँ। जैसे रात में चांद-तारे देखते हैं वैसे ही इंटरनेट और टीवी से हम पूर्वांचली बाकी चमकती दुनिया देखते हैं, शाहरुख की दुनिया, रणवीर की दुनिया, ट्रंप की दुनिया, मोदी की दुनिया, पेरिस, लंदन जिसे कोई-कोई लड़के, लड़की कभी-कभी छू लेते हैं तो ज्यादातर वापस नहीं लौटते।

दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़ से देखेंगे पूर्वांचल तो मानेंगे नहीं, कहेंगे कि अखबार तो कहीं का उठाकर देखलो, एक ही माफिक है। लेकिन मानिए पूर्वांचल का सूरज कुछ अलग ही चमकता है। कोई रोजमर्रा का खौफ नहीं है। कोई रोजमर्रा का बवाल, खून भी नहीं है लेकिन रोजमर्रा एक भौकाल है जिसे पाने में सब जूझे पड़े हैं। एक वाक्य में बुजुर्ग कई विशिष्ट शब्द बोल देते हैं जब लवंडे दुहरा देते हैं तो कहते हैं कि ‘जुग जमाना जराता (जमाना जल रहा)’ ।

एक क्षेत्र में कितनी ही बेहतरीन, शानदार, प्रेरक बातें भी साथ ही होती रहती हैं पर ईमानदार कला के माध्यम हमें आईना भी दिखाते हैं। अमेजन के प्राइम पर उपलब्ध मिर्जापुर वेब सीरीज लिखने वाले पुनीत कृष्ण ने पूर्वांचल की वह स्याह तस्वीर जरा उतारी तो है। क्षेत्र की अच्छाइयों को छान अलग कर लें तो गाली, कट्टा या लाईसेंसी, शराब, पुलिस, नेता, वकील, ठेकेदार, व्यापारी, बदमाश से बनती है पूर्वांचली सामाजिकता। यही लिख दिया है पुनीत ने।

ढेरों फिल्में हैं अब किसी जगह के क्राइम को दिखाती हुई पर पूर्वांचली मसाला है Mirzapur में। हासिल फ़िल्म इलाहाबाद, बनारस होते हुए फिर बिहार उतर जाती है, जिसमें अब अनुराग कश्यप और तिग्मांशु धूलिया अपनी ट्रेडमार्क शैली गढ़ चुके हैं। मुंबई क्राइम पर राम गोपाल वर्मा की धाक है। पूर्वांचल के क्राइम सीन में बात सीधे नहीं की जाती, घुमाफिरा के बात बनायी जाती है। ऊपर से सब नॉर्मल और इज्जतदार तरीके से रखा जाता है, कमीनेपन की कालीन भीतर बुनी जाती है। यह बारीक बुनावट Mirzapur के राइटर पुनीत कृष्ण ने पकड़ी है और निर्देशक Karan Anshuman ने इसे बखूबी सजाया है।

Mirzapur  सीरीज के पहले भाग को देखने के बाद मुझे जो सबसे बुरा लगा इसकी दो टुच्ची-लुच्ची आलोचनाएँ। कहा गया कि यह अनुराग कश्यप स्टाइल क्राइम ड्रामा है जो कि आखिर बिखर जाता है और बोर करता है। दूसरा कि इसमें कोई नयापन नहीं है, बेवजह का वायलेंस है और गालीगलौज है। बिल्कुल इसमें क्राइम ड्रामा है, वायलेंस है, गालीगलौज है पर यह कत्तई अनुराग कश्यप स्टाइल का नहीं है। इतना धीरज नहीं है कश्यप में, उनकी शैली को धीरज की जरूरत भी नहीं है। कश्यप का ध्यान दो विरोधाभासी चीजों को स्वाभाविक व समानांतर दिखाने पर होता है। यहाँ जहाँ ध्यान है, तो उसपर पूरा है, गहराई में है।

निर्देशक करण अंशुमान को कोई जल्दी नहीं है। Mirzapur के एक-एक फ्रेम में पूरा रंग लाने की कोशिश हुई है। थोड़ा अतिरेक तो कला में प्रभाव के लिए किया ही जाता है और जो सभी करते हैं लेकिन यहाँ करण ने कहीं भी अपनी पकड़ छूटने नहीं दी है। इन चीजों को मैंने कुछ हिस्सों में अपने यहाँ देखा है, ऐसा ही सोचा है और शुरू में वे चीजें मुझे यों ही दिखी भी हैं।

Mirzapur में नयापन क्या है, जमीन ही नई है वरना क्राइम में नया क्या है, रंजिश, मर्डर, सेक्स में नया क्या है, वज़हें वहीं हैं कभी न अघाने वाला लालच, व्यवहार का दोहरापन। सब्जियाँ उग जाती हैं हर जगह, उनके जायके में जगह कुछ फरक डाल देता है और वह फरक ही उसे नया बनाता है, जहाँ करन अंशुमान और पुनीत कृष्ण चुके नहीं हैं। कहानी का हर किरदार अपने रौं में है। किरदार का दोहरापन है तो कहा गया है। इसे देखते हुए आप कभी निश्चित नहीं होंगे कि अब क्या होगा!

अभिनय पक्ष Mirzapur सीरीज का ऐसा पक्ष है जो मुझे यह कहने को मजबूर करता है कि मिर्जापुर देखी जाय। मुझे जिस क्रम में अभिनय पसंद आया है यों ही मै जिक्र करूंगा। यह सीरीज पूरी तरह Pankaj Tripathi के अभिनय की है। ऐसे ही एवरेज कदकाठी के बाहुबली होते हैं, उनके ऐसे ही आवारा लड़के होते हैं जो बाद में कॉलेज राजनीति में हारते-जीतते फिर नेता बन जाते हैं या ठेकेदार। दिखता है कि बड़ी स्वाभाविक रीति से निभा रहे हैं पंकज इस चरित्र को, लेकिन यहीं तो वह अपने अभिनय की रेंज दिखा रहे।

पंकज, बिहार से हैं और अमूमन फिल्मों में और सेक्रेड गेम्स के अपने रोल में वह बिहार की माटी के अनगिन रंगों में से कोई एक रंग चुन लेते हैं लेकिन यहाँ Mirzapur में उन्होने हाव-भाव भाषा सब ही खालिस पूर्वांचली ली है यह इतना आसान तो नहीं रहा होगा। एक बारीक अंतर है जो दिल्लीवाला या बॉम्बेवाला नहीं बुझता, पर होता है, पंकज यहाँ चुके नहीं। दर्जनों जगह वह लाजवाब कर रहे हैं। हूँ, हाँ कर रहे तो भी प्रभाव छोड़ रहे। जब चुप हैं तो आँखें और चेहरा अपने काम पर हैं। उनका इंतजार रहता है कि किस अगले सीन में वे आएंगे। बड़े इत्मीनान से वे बोल रहे हैं, कहीं वे अपने को दोहरा नहीं रहे और कहीं भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनका अभिनय प्रेडिक्टेबल है। नाराजगी के दो सीन में वे दो तरह से गुस्सा हैं। यह सीरीज उन्हें अभिनय जगत में काफी आगे ले जाएगी और वे इसके हकदार भी हैं।

Divyendu Sharma अपने काम से अपने ड्रमैटिक सेंस का लोहा मनवा लेंगे सबसे। क्या खूब जमे हैं Mirzapur में वो। इनके किरदार से कोफ्त भी होती है और अंदर के दर्शक को मजा भी आता है, इस इंटेंसिटी का काम किया है दिव्येंदु ने। इन्होने दिखा दिया है कि अब इनसे कोई भी भूमिका करवाई जा सकती है। किरदार में उतरे पड़े हैं इस कदर कि पिछली भूमिकाएँ इन्हें पहचानने से इंकार कर देंगी। Ali Fazal जैसे अपने एक नए अवतार में हैं। कभी का मेट्रोसेक्सुअल पर्सन पूर्वांचल का साड़ बना बैठा है जो सींग मारने को हर दम बेताब है। अली फैजल ने जिस किरदार को जिंदा कर दिया है, वह मुझे अपने ग्रेजुएशन के दिनों में मिलते थे हाँ थोड़े कम लाउड होते थे पर अभिनय में तो लाउड होना बनता है। विक्रांत मेसी एक बेहद बैलेंसड रोल में हैं और उन्होने अभिनय में भी अपने किरदार की एकसारता बनाए रखी है।

अभी मंटो मूवी में आयीं राशिका दुग्गल तो यहाँ पहचानी भी न जा रहीं।Mirzapur में इनका किरदार जीतना इंट्रेस्टिंग है उतने ही करीने से इन्होने इसे कैरी भी किया है। कहीं भी कुछ बनावटी नहीं लगता। एकदम एफर्टलेस। श्रिया पिलगाँवकर के किरदार में जितनी गुंजायश थी, उन्होने उसे एक बेहतर प्रभाव में निभाया है। श्वेता त्रिपाठी और अमित सियाल को अभी कहानी ने बहुत मौके दिए नहीं हैं। शीबा चड्ढा और कुलभूषण खरबंदा अपने स्वाभाविक अंदाज में हैं और अपने अभिनय में खासे प्रेडिक्टेबल रहे। लाला के किरदार में अनिल जार्ज का काम लोगों को पसंद आएगा।

Mirzapur में एक्शन सींस पर मेहनत हुई है, कैमरा एंगल लुभाते हैं। संगीत भी इस सीरीज का एक उम्दा पक्ष है, जो अमूमन नेगलेक्ट किया जाता है फिल्मों से इतर। इंट्रो सींस बोर नहीं करते जबकि वे हर बार आते हैं। डॉयलॉग में कंटेंट कम है पर शब्द खांटी देशी हैं उनकी अदायगी में भी इस भदेसपना का ध्यान रखा गया है। इसे देखते हुए मुझे किसी और सीरीज या फ़िल्म का ध्यान नहीं आया, जो कि अमूमन मुझे ध्यान आता है जब कोई सीरीज या फ़िल्म देखता हूँ। पुलिस स्टेशन बहुत देखे फिल्मों में, यहाँ मिर्जापुर में वहाँ भी नयापन है।

बहुत स्पष्ट कहूँ तो Mirzapur मुझे सेक्रेड गेम्स से बेहतर लगी। वहाँ बारीकियों पर काम नहीं है, कैनवास के बड़े होने पर ध्यान है। यहाँ रेसिपी के हर इनग्रेडीएंट पर काम है, महीन। इंतजार मुझे यकीनन मिर्जापुर के दूसरे भाग का अधिक रहेगा।

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