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सिनेमा की सोच और उसका सच

मुग़ल ए आज़म …के आसिफ़ एवं दिलीप कुमार मधुबाला

कमरुद्दीन आसिफ़ की मुग़ल-ए-आज़म भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर है । सन 1953 में शुरू हुई फिल्म सात वर्षों में बनकर पूरी हुई । फ़िल्म की शूटिंग दौरान परदे के पीछे का एक किस्सा

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 सिनेमा इतिहास में मुग़ल-ए-आज़म एक मील का पत्थर है । सन 1953 में शुरू हुई के .आसिफ की यह फिल्म सात वर्षों में बनकर पूरी हुई । बहरहाल 5 अगस्त 1960 को रिलीज हुई । शकील साहब के इश्क-ए-जज्बात से भरे नगमों से दिलीप कुमार-मधु्बाला मोहब्बत के किस्सों को रूह देकर सुनने वालों को दिल जीत
लिया था ।

मोहब्बत की झूठी कहानी पे रोए… और प्यार किया तो डरना क्या,जब प्यार किया तो डरना क्या… की चर्चा यहां की जा सकती है । मुग़ल-ए-आज़म ने आम दर्शकों के साथ पढे-लिखे व एलिट वर्ग में भी इश्क के प्रति एक अप्रतिम आकर्षण पैदा किया ,प्यार की वह रोशनी जिसकी बदौलत उदासीन दिलों में उम्मीद का उजाला हो गया था।

फिल्म में ‘अनारकली’ के किरदार के लिए उपयुक्त कलाकार की खोज बहुत दिनोंतक जारी रही,फिर जाकर ‘मधुबाला’ का नाम सामने आया । युवराज सलीम की भूमिका के लिए दिलीप कुमार के नाम पर पहले से ही मुहर थी । इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने बाद दिलीप साहब—मधुबाला का इश्क परवान चढा, शूटिंग के दौरान एक-दूसरे से बनी पहचान धीरे-धीरे मोहब्बत में तब्दील हुई । लेकिन सन 1956 में ‘नया दौर’ के ताल्लुक एक मुकदमे से इस रिश्ते में तल्खी आ गई।

तल्ख रिश्ते का असर मुग़ल-ए-आज़म की शूटिंग दरम्यान साफ महसूस किया गया । दरअसल उस दृश्य में यह साफ नज़र आया जिसमें सलीम को ‘अनारकली’ के
रुखसार पर थप्पड लगाना था।

दिलीप कुमार ने मधुबाला को जोरदार थप्पड मारा, सीन तो जरूर पास हो गया लेकिन दिलीप—मधुबाला मोहब्बत के किस्से शायद वहीं थम गए । ऐसा महसूस हुआ कि शायद नाराज होकर मधुबाला शूटिंग छोड देंगी लेकिन मधुबाला के प्रतिक्रिया के पहले कमरूददीन आसिफ(निर्देशक) आ गए । आसिफ साहब ने मधुबाला को सीन के लिए मुबारकबाद देते हुए कहा कि वह यह जानकर खुश हैं कि दिलीप आज भी उससे पहली जैसी चाहत रखते हैं ।

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