FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

हुस्न…हुनर…और वहीदा

0 816

पचास का दशक इस बेजोड़ एक्ट्रेस के आगाज़ का गवाह बना..साठ के दशक तक आते आते लोग वहीदा को कामयाबी की गारंटी मानने लगे और साठ के दशक में वो असर छोड़ा जिसका ख्वाब ग्लैमर वल्र्ड में दाखिल होने वाली हर लड़की देखती है। उम्र ढलने लगा मगर फिल्मों से नाता नहीं छोड़ा..आज भी वहीदा जी परदे पर असरदार रोल्स में नज़र आती हैं…क्योंकि सिनेमा उनकी चाहत और इबादत दोनो है। सलाम सिनेमा आज इस लाजवाब अदाकारा के सिनेमाई सफर से वाकिफ करा रहा है आपको… सी.आई.डी की बिंदास कामिनी हो… या तीसरी कसम की सौम्य हीराबाई प्यासा की बिंदास गुलाबो हो या गाईड की अल्हड़ रोज़ी .. वहीदा रहमान हर किरदार को कुछ ऐसे जी जातीं कि परदे की कहानी असल मालूम होती और किरदार अपने आस पास का..वहीदा होने के मायने गुरूदत्त के ज़िक्र के बगैर कुछ ऐसे निकलेंगें जैसे बगैर माली का बाग़..हैदराबाद के एक छोटे से थियेटर से मायानगरी की रानी बनाने का चमत्कार गुरूदत्त जैसे गाईड ने ही मुमकिन किया।प्रोड्यूसर्स खिलाफ थे फिर भी खुद की चलायी और अपने असिस्टेंट राज खोसला की पहली ही फिल्म सीआईडी में वहीदा को मौका दिया। गुरूदत्त फिल्म्स के बैनर तले बनी ये मर्डर मिस्ट्री साबित कर गयी कि वहीदा में वो स्पार्क है जो एक हीरोइन में होना चाहिए.. सीआईडी कामयाब हुई मगर इसका फायदा वहीदा को नहीं मिल रहा था..इस बीच गुरूदत्त ने कालजयी प्यासा की कहानी तैयार की और स्क्रीनप्ले राइटर अबरार अल्वी से गुलाबो के कैरेक्टर मे वहीदा को कास्ट करने की इच्छा जतायी..अबरार के नाराज़ होने के बावजूद वहीदा ही गुलाबों के लिए फाइनल हुईं मगर फिल्म के पहले ही गाने के कुछ अंश देखकर सभी ने वहीदा को नकार दिया..बाद में इसी गाने को फिल्माने गुरूदत्त वहीदा को लेकर हैदराबाद गये और सच में कमाल हो गया..जाने क्या तूने कही जाने क्या मैने कही और सच में इस गाने से बात बन गई। ऐसा नहीं है कि प्यासा या सीआईडी से पहले वहीदा ने फिल्मों में काम नही ंकिया..एक तेलुगु मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के कारण भरतनाट्यम में ट्रेन्ड वहीदा ने 1955 में आयी सुपरहिट तेलुगु फिल्म रोजुलु माराई में उस समय के साउथ सुपरस्टार जेमिनी गणेशन के साथ स्क्रीन शयर किया। गुरूदत्त इस फिल्म के गीत से प्रभावित होकर वहीदा को मुंबई लाये। तब उनकी उम्र महज़ 19 बरस थी। प्यासा गुरूदत्त की महत्वाकांक्षी फिल्म थी मगर टिकट और टिकट खिड़की पर बेअसर होकर भी आज ये कालजयी है। प्यासा को मिले क्रिटिकल एक्लेम और दुनियाभर मे मिली वाहवाही ने वहीदा को गुरूदत्त फिल्म्स का पर्मानेंट मेंबर बना दिया। इसके बाद आयी 12 ओ क्लॉक कमर्शियली कामयाब हुई मगर गुरूदत्त की तसल्ली के लिए काफी नहीं थी। साल 1959 अगली फिल्म काग़ज़ के फूल में वहीदा और गुरूदत्त एक लगातार तीसरी बार एक साथ नज़र आए..फिल्म नहीं चली लेकिन गुरूदत्त की हिदायतकारी का सिनेमा के जानकार लोहा मान चुके थे। काग़ज़ के फूल में वहीदा ने एक अभिनेत्री का किरदार निभाया, फिल्म को देखते हुए लगता है कि ये गुरूदत्त के निजी अनुभवों का एक दस्तावेज़ था जिसे इंडस्ट्री ने अपने खिलाफ सिनेमाई बयान के तौर पर भी लिया। काग़ज़ के फूल की नाकामी के बाद गुरूदत्त ने डायरेक्टर की चेयर छोड़ प्रोड्यसर का हक अदा किया और अपने असिस्टेंट डायरेक्टर्स को प्रोमोट किया.। चौदवीं का चांद एम सादिक ने निर्देशित की मगर गुरूदत्त की अनिवार्य शर्त वहीदा फिल्म में मौजूद रहीं..जमीला का किरदार कुछ ऐसे पे¶ा किया कि मानो लखनउ की सारी नज़ाकत और नफ़ासत उन्हें विरासत मे मिली हों। चौंदहवीं का चांद कामयाब हुई और गुरूदत्त ने अपने एक और शागिर्द और सबसे अच्छे दोस्त अबरार अल्वी को निर्देशकीय पारी के आग़ाज़ का मौका दिया..बिमल मित्रा के उपन्यास साहेब बीवी और गुलाम पर अबरार ने इसी नाम से शानदार फिल्म तराश डाली। मीना कुमारी भले ही इस फिल्म के केंद्र में रही हों मगर वहीदा रहमान के किरदार ने तो जैसे जादू कर दिया। जिस सिम्पलिसिटी के साथ वहीदा ने जबा का रोल अदा किया वो आजतक याद किया जाता है। गुरूदत्त के अलावा वहीदा ने देव आनंद के साथ भी कई बेहतरीन फिल्में की..करियर के आगाज़ में ही सीआईडी..सोलवां साल..और काला बाज़ार जैसी हिट फिल्मों की हीरोइन बनी वहीदा को गाईड की रोज़ी के लिए हमेशा पहचाना जाता रहा है। देव आनंद के होम प्रोडक्शन की गवाह गाईड राजू और रोज़ी के संबंधों में पिरोई एक लाजवाब और कामयाब फिल्म साबित हुई। तीसरी कसम वैसे तो नाकाम रही मगर हीराबाई के किरदार को वहीदा अपने बेहतरीन रोल्स में से एक मानती हैं।फणीश्वर नाथ रेणु की लिखी कहानी मारे गये गुलफाम की एडॉप्टेशन तीसरी कसम को जाने माने गीतकार शैलेंद्र ने प्रोड्यूस किया था जिसे डायरेक्ट किया बासु भट्टाचार्य ने.. इन दोनो फिल्मों से पहले वहीदा ने बीस साल बाद नाम की एक फिल्म की..राधा के रोल में वहीदा ने यहां भी झंडा गाड़ा..और फिल्म सुपरहिट साबित हुई.. आगे का फिल्मी सफर खामोशी..राम और ¶याम..आदमी..प्रेम पुजारी..रेशमा और शेरा..लम्हे.. कभी कभी और नीलकमल जैसी शानदार फिल्मों का गवाह रहा। बाद के सालों में वहीदा ने ओम जय जगदीश..15 पार्क एवेन्यू दिल्ली-6 और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों में अपनी अलग छाप छोड़ी. कहना लाज़मी होगी कि वहीदा ने अपने हुस्न और हुनर दोनों से सिल्वर स्क्रीन पर राज किया…

Leave A Reply

Your email address will not be published.