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सिनेमा की सोच और उसका सच

अरसा पहले उन्होने मुल्क और मज़हब में से मुल्क चुन लिया था

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फिल्मसिटी वर्ल्ड के लिए ये लेख डॉक्टर श्रीश के. पाठक ने लिखा है-

अपने मुल्क से मोहब्बत की तमाम वज़हें महसूस होती हैं और उमर के साथ कितनी ही और ईजाद कर ली जाती हैं। पर कोई अपने मुल्क का बाशिंदा एक ऐसी मूवी बनाए जो आपको अपने मुल्क से मोहब्बत करने की और भी जियादा जायज वज़हें दे जाए तो ऐसी मूवी है, मुल्क। चिंगारियों की खबर लगाते छापते कब बारूद बाँटने लगे अख़बार कि, ऐसी ही एक खबर पढ़कर निर्देशक Anubhav Sinha के मन में पक्का जम गया कि इक मूवी लिखनी और बनानी है जिसमें मुल्क से मोहब्बत को फिर से जरा करीने से समझा जाय। वर्ल्ड पॉलिटिक्स और वर्ल्ड हिस्ट्री की अपनी थोड़ी समझ से जब देखता हूँ तो पाता हूँ कि सारे चमकदार मुल्कों के मुकाबले अपने वतन की जिस साझी मिट्टी की सोंधी खुशबू पर हर एक का मन मचल जाता है उसकी चिकनाहट में इंसानियत और नेकनीयती का वो तसव्वुर पैबस्‍त है जिसे और कहीं ढूँढना मुश्किल है।

जबकि देख रहा हूँ कि सरकारों ने जगह-जगह बँटवारे के बारूद बो दिए हैं, लोगों ने अपने-अपने बौने खांचों के मुताबिक मन में मुल्क के मायने उकेर लिए हैं, मीडिया व्यूज के हिसाब से न्यूज बेच रही, विद्या कुछ ऐसी परोसी जा रही कि विद्यार्थी में विनय की जगह एक अपाहिज घमंड पैदा कर रही जिसमें विज्ञान और कला में विभेद कर दिया जा रहा, कला को गैरजरुरी करार उसके सहज रोजगारों को भी छीन लिया जा रहा और विज्ञान को कारखानों के सामने पाँचों वक्त की नमाज करने को मजबूर किया जा रहा जिसमें न भविष्य की सोच है और न ही अपने इतिहास व संस्कृति को महसूस करने की ललक, ऐसे में कोई ऐसी मूवी की गुंजायश ढूँढ लेता है जो आपको संवाद करने को उकसाती है, आपसे तर्क करती है, कहती है कि जो मानते हो उसकी तह तक भी जाते हो, तह तक जाकर जो मानते हो उसे ही मानते रहने की वज़ह क्या पाते हो? मुल्क वो तमाम सवाल जेहन में जगाती है और मजबूर करती है कि उनके जवाब ढूंढे जाएं भीतर क्योंकि बहकाव में आकर हमने इस मुहिम को मुल्तवी कर रखा है और लगता नहीं कि हमें इसका इल्म भी है।

निर्देशक अनुभव सिन्हा की लिखी और गढ़ी इस मूवी में उनकी कितनी मांस मज्जा लगी है इसका अंदाजा तो उसी वक्त लग जाता है जब मूवी रिलीज के पहले के एक प्रेस वार्ता में वे एक पत्रकार को तमतमाकर दो टूक जवाब देते हैं। पत्रकार उसी प्रचलित रिटॉरिक से काबिल निर्देशक से सवाल पूछता है कि क्यों मुस्लिम युवक आतंकवाद की तरफ मुड़ रहे? जवाब अनुभव कुछ यों देते हैं कि बगल में बैठी तापसी पन्नू लाजवाब हो मुस्कराकर ताली बजाती हैं। अनुभव डपटकर उस पत्रकार से पूछते हैं कि न्यूज देखते हैं आप, पढ़ते हैं? कल दंगाइयों को माला पहनाकर उनका स्वागत किया गया! यही जवाब है। अनुभव इस फ़िल्म की प्रसव पीड़ा को जी रहे हैं और यह उनके और इस मूवी के खून को बराबर गर्म रखती है। फिल्मों में रियलिस्टिक प्रभाव रखने के लिए बहुधा बैकग्राउंड स्कोर रखा ही नहीं जाता, मुल्क में फ्रेम दर फ्रेम माहौल के मुताबिक असंबद्ध चीजों की आवाज सुनायी पड़ती है जो इसे खासा इंटेंस बनाती है। संपादन कसा हुआ और फ़िल्म देखते हुए लगती नहीं कि फ़िल्म चल रही, इतनी गहरे आकर जुड़ती है। एक निर्देशक के तौर पर तुम बिन, दस, रा. वन, गुलाब गैंग, ज़िद जैसी फिल्मों के साथ अनुभव सिन्हा के मायालोक का कोई एक तराशा तसव्वुर उभरता ही नहीं पर मुल्क के साथ उन्होने अपना कद पक्का कर लिया है। यहाँ अनुभव एक गाढ़े सरोकारों वाले साहसी निर्देशक के तौर पर आए हैं। फ़िल्म पढ़े लिखे और अशिक्षित मुसलमानों और देश के बाकी बाशिंदों पर बराबर तंज करती है, यह संतुलन साधा तो है अनुभव ने पर इसे महसूस करने के लिए खुद का चश्मा जरूर साफ होना चाहिए।

कुछ के चरित्र ही मजबूत होते हैं और कुछ उन्हें अपनी अदाकारी से उसे गहरा बना देते हैं। इस फ़िल्म में मुझे Manoj Pahwa ने बहुत प्रभावित किया। उनके चेहरे और संवाद अदायगी में इतना इंटेंस इंडेल्जेंस है कि वे अपने फ्रेम में नज़र कहीं और रखने ही नहीं देते। अच्छा हुआ कि अनुभव सिन्हा ने उनके रोल को Rajat Kapoor के रोल से बदल दिया, वर्ना रजत की स्वाभाविक अपेक्षित अदाकारी में मनोज का इतना उम्दा प्रदर्शन कहीं जरूर गुम हो जाता। Tapsee Pannu इतनी सहज हैं कि तेज तंजीदा संवादों के बाद जब वे मुलायम एहसास की बातों के नर्म पिच पर आती हैं तो एक बेहद कुशल पायलट की तरह लैंडिंग कराती हैं। Rishi Kapoor का आधा प्रभाव उनकी चाल और गेट अप से बना है, बाकी अपने उम्दा अभिनय और संवाद अदायगी से वो उसे खासा मुकम्मल बनाते हैं। Ashutosh Ranaको फिर अपने रौ में लौटते हुए देखना भीतर से खुशियों से भर देता है। इनकी प्रतिभा को अभी भी किसी अनुराग कश्यप या तिग्मांशु की जरूरत है! Prateek babbar जैसे लगते हैं उससे अलहदा ही कर जाते हैं। नीना गुप्ता बड़ी प्यारी सास लग रहीं। एक जज के किरदार में Kumud Mishra फबते हैं लेकिन जॉली एलएलबी के सौरभ शुक्ला जैसे उनके जेहन में हों। कुमुद अब प्रशंसित अभिनेता हैं उन्हें हर फ़िल्म में अपने चरित्र में अभिनय से एक नया किरदार गढ़ना होगा।

फ़िल्म का संगीत कम से कम ऐसा नहीं कि जनता के जुबान पर चढ़े लेकिन स्वांनद किरकिरे का लिखा गाना ‘ठेंगे से’ के बोल बेहद क्यूट से हैं और बनारसी ठाठ से भारतीयता का स्वाद चखाती है। शफक़त अमानत अली का गाया गाना संजीदा सा है। डायलॉग्स बेहद उम्दा लिखे गए हैं उन्हें पात्रों ने बड़ी सहजता से कहे हैं, लगता नहीं कि उन्हें बोला जा रहा। दो घंटे बीस मिनट की फ़िल्म कहीं से भी उबाऊ या लंबी नहीं लगती।

फ़िल्म देखी जानी चाहिए। हर क्लासरूम हर चौराहे हर घर हर चौपाल पर दिखायी जानी चाहिए। जो बात भारत की शिक्षा व्यवस्था के डीएनए में जगह जगह टांकी जानी चाहिए थी उसे पर्दे पर देखना राहत देता है। कोई भी मुल्क अपने इतिहास के सबकों को परे रखकर अपना भविष्य नहीं गढ़ सकता। अपने देश का संविधान हमारे तितर-बितर इतिहास को एक बार फिर सहेज आगे बढ़ने को उकसाता है पर भटकी शिक्षा अपने साक्षरों को संविधान की प्रस्तावना समझने भर की ताकत उन्हें भी नहीं देती जो उच्च शिक्षित हैं।

साफ मन से मुल्क को देखकर आएं, बहुत ही ध्यान से इसके संवादों को सुनिएगा, क्योंकि मेरा मानना है कि इस फ़िल्म को देखने से अधिक सुना जाना चाहिए और इसलिए ही कहानी और इसके कुछ उम्दा संवादों को मैंने यहाँ उद्धृत नहीं किया है। मुझे मेरे Mulk की परवरिश पर नाज़ है जिसने इतने गरम हवा वाले मौसम में भी मुल्क जैसी फिल्मों की गुंजायश बचा रखी है।

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