FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

मोहम्मद रफ़ी.. आवाज़ की तरह मधुर फ़नकार

Rafi साहब ने कम वक्त में जो गायकी की दुनिया में जितना विविधता भरा काम किया उतना कम ही लोग कर पातेे हैं..आज फिल्मसिटी वर्ल्ड में हम उन्हे य़ाद कर रहे हैं..

0 1,181

लोकप्रिय गायक मो रफ़ी के लिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि वह हिन्दी सिने संगीत के सर्वश्रेष्ठ फ़नकारों मे एक थे ।रफ़ी साहेब की गायकी मे विविधता का सर्वोत्तम स्वरूप रहा। जब कोई भी अभिनेता अपने होठ हिलाता तो मानो मो रफ़ी की आवाज़ उसी की प्रतीत होती। रफ़ी साहेब की कला हर अभिनेता के स्टाइल के हिसाब से हुआ करती । विविधता की बानगी कुछ इस तरह रही कि
दिलीप कुमार, देव आनंद, शम्मी कपूर, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त,धर्मेन्द्र, राज कुमार, शशी कपूर ,अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना तकरीबन सभी एक्टर्स के स्टाइल मे सहजता से फ़िट बैठ गए । इसी कारण रफ़ी साहेब आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं ।

Mohd.Rafi

श्रोताओं को आज भी मंत्रमुग्ध करने मे सक्षम उनकी गायकी : नफ़रत की दुनिया को छोड के , आया रे खेल खिलौने लेकर आया रे, मधुबन मे राधिका नाचे, जब भी यह दिल उदास होता है, ओ दुनिया के रखवाले जैसे गीतो मे आज भी जीवित है । मो रफ़ी को भारतीय सिने संगीत परम्परा का ध्रुव तारा होने का गौरव प्राप्त है ।

मो रफ़ी का जन्म अमृतसर के निकट कोटला सुल्तान गांव मे हुआ, जीवन के आरंभिक वर्ष और तालीम का आगाज़ यही से होता है । थोडे बडे हुए तो संगीत शिक्षा के लिए अमृतसर से लाहौर आए,उस समय उनकी उम्र तकरीबन 14 वर्ष थी। बचपन के दिनों में संगीत जुनून पर चर्चा करते हुए रफ़ी साहेब ने फ़कीर और एकतारा की बात कही थी। उन दिनों वह एकतारा लेकर चलने वाले फ़कीर के फ़न से बहुत प्रभावित रहे।

फ़कीर अक्सर एकतारा पर कुछ गाते हुए दूर-दूर तक चले जाते हैं। जिन श्रोताओं ने किसी फ़कीर को गाते सुना होगा,वह जानते हैं कि रफ़ी साहेब की दीवानगी यूं ही नही थी । फ़कीर के जुनून को सलाम करते हुए बालक रफ़ी उससे सीख लेकर रियाज़ और गायकी करते थे। यह प्रयास आने वाले स्वर्णिम भविष्य संकेत के रूप मे देखा जा सकता है । जब लाहौर पहुंचे तो वहां उस्ताद अब्दुल वहीद खान, जीवन लाल मट्टु एवं गुलाम अली खान का आशीर्वाद प्राप्त हुआ, युवा रफ़ी को संगीत की संस्थागत शिक्षा-दीक्षा तीनो से मिली ।

रफ़ी साहेब ने सबसे पहले रेडियो लाहौर मे संगीत सेवाएं दी। दरअसल सगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी इस फ़नकार नगीना को परखकर यहां लाए थे। इस तरह एक सुनहरे कैरियर का आगाज़ हुआ, पहला फ़िल्मी गाना श्याम सुंदर के संगीत से सजी पंजाबी फ़िल्म मे रिकार्ड हुआ। सन 1944 मे लाहौर से सफ़र के ध्येय लक्ष्य बम्बई(मुंबई) चले, मुंबई आना रफ़ी साहेब के कैरियर मे निर्णायक रहा,रिश्तेदारों व दोस्तों  की मदद से भिंडी बाज़ार  इलाके मे रहने का ठिकाना
मिल गया।

Rafi Song recording

थोडा वक्त गुज़रने के बाद उनकी भेंट अब्दुल रशीद करदार, महबूब खान, नौशाद अली, फ़िरोज़ निज़ामी से हुई । अब वह यहां रहते हुए फ़िल्मों मे प्ले बैक गायन कर सकते थे। नौशाद साहेब रफ़ी की क्षमता से इस कदर प्रभावित हुए कि हिन्दी फ़िल्म संगीत  दुनिया मे ब्रेक दिया, अनमोल घडी एवं शाहजहां मे गीत दिए |फ़िर तो जैसे नौशाद रफ़ी के आवाज़ के मुरीद रहे । नौशाद ने रफ़ी को शुरुवाती अवसर अवश्य दिए लेकिन संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी की फ़िल्म ‘जुगनु’ से उन्हे दमदार आगाज़ मिला। एकल गायन का सफ़र : नौशाद के धुनो से सजी ‘चांदनी रात’, ‘दिल्लगी’, ‘दुलारी’ फ़िर श्याम सुंदर के संगीत मे ‘बाज़ार’ तथा हुश्नलाल भगतराम के लिए ‘मीना बाज़ार’ से शुरू हुआ।

कैरियर के आरंभ मे श्याम सुंदर, जी एम दुर्रानी, नौशाद ने अच्छा मार्गदर्शन किया ।मो रफ़ी को पहला सिने ब्रेक श्याम सुंदर ने एक पंजाबी फ़िल्म मे दिया। जी एम दुर्रानी की फ़िल्म मे पहले हिन्दी गीत के लिए नौशाद से पहल की। इस समय मे संगीतकार हुश्नलाल भगतराम व गीतकार राजेन्द्र कृष्ण के साथ ‘ सुनो सुनो ओ दुनिया वालों’ व ‘बापू जी की अमर कहानी’ जैसे विशेष गीत भी गाए । तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू जी ने बापू की हत्या के शोक मे रफ़ी को गीत सुनाने को कहा, रफ़ी ने ‘बापू जी की अमर कथा’ गाया।

कहा जाता है कि शुरू मे रफ़ी साहेब की गायकी जी एम दुर्रानी से प्रभावित रही। इस का अनुभव ‘एक दिल के टुकडे हज़ार हुए’ (प्यार की जीत) व ‘सुहानी रात ढल चुकी’(दुलारी) मे किया जा सकता है । एक दिल के टुकडे हज़ार हुए और सुहानी रात ढल चुकी जैसे गीतों ने रफ़ी को फ़िर भी एक पहचान दी। मो रफ़ी को समकालीन सभी शीर्ष संगीतकारों  के साथ काम करने का सौभाग्य मिला । नौशाद व सचिन देव बर्मन का साथ विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। रफ़ीसाहेब ने नौशाद के लिए : ‘दीदार’ , ‘आन’ , ‘उडन खटोला’ , ‘कोहीनूर’ ,‘मुगल-ए-आज़म’ , ‘गंगा जमुना’ , ‘मेरे महबूब’ मे एक से बढकर एक गीत गाए। वहीं सचिन देव बर्मन की ‘प्यासा’ , ‘नौ दो ग्यारह’ , ‘काला पानी’ , ‘काला बाज़ार’ एवं ‘गाईड’ मे भी गायकी का बेजोड नमूना प्रस्तुत किया ।

Rafi -Lata

शक्ति सामंत की ‘आराधना’ से हिन्दी सिनेमा को राजेश खन्ना के साथ किशोर कुमार का नाम मिला। मो रफ़ी की बादशाहत को किशोर कुमार के फ़न से कडा मुकाबलामिला।सत्तर के दशक मे किशोर कुमार की लोकप्रियता आगे हो चुकी थी| यह किशोर कुमार का समय रहा जो नासिर हुसैन की ‘हम किसी से कम नही’ के पूर्व तक कायम रहा। यह सुपरस्टार राजेश खन्ना का भी वक्त रहा।

आराधना के रिलीज़ के समय तक किशोर कुमार फ़िल्मों मे बीस बहुमूल्य वर्ष निवेश कर चुके थे। इस तरह अनुभव के मामले मे रफ़ी साहेब के बराबर और उम्र के लिहाज़ से कुछ ही कम थे । राजेश खन्ना के सुपरहिट गीतो के अंदाज़ ने उन्हे कई बरस जवां कर दिया। यहां पर यह कहना भी लाज़मी होगा कि ‘आराधना के बाद ही किशोर रफ़ी साहेब से जादुई तरीके आगे नही हो गए, रफ़ी की गायकी ने उन्हें कडा मुकाबला दिया।

Rafi Muhammad Ali

दरअसल मो रफ़ी एवं किशोर कुमार मे से किसी एक को अधिक महान बताना उचित न होगा क्योंकि दोनों का अंदाज़-ए-फ़न अलग था । किशोर कुमार व मो रफ़ी की गायकी का अंदाज़ अलग-अलग रहा। रफ़ी व किशोर की क्षमता व फ़न की तुलना तो अवश्य की जा सकती है, लेकिन किसी को अधिक अच्छा कहना गायकी के फ़न के साथ इंसाफ़ न होगा।

Rafi Rd Burman

साठ व सत्तर दशक की पीढी का सौभाग्य रहा कि वह रफ़ी साहेब के ज़माने मे पैदा हुए। वह लोग रहे जिन्होंने रफी को लाइव भी सुना |फ़िर जो नयी फ़सल आई उसमे किशोर कुमार की दीवानगी रही। सत्तर के दशक मे संगीत  की महफ़िल मे किशोर दा की जबरदस्त मौजूदगी के बावजूद मो रफ़ी ने बेहतर गीत दिए : दिन ढल जाए (गाईड), क्या हुआ तेरा वादा (हम किसी से कम नही),बडी दूर से आए है (समझौता), राही मनवा दुख की चिंता ( दोस्ती) , हुई शाम उनका ख्याल आ गया( लाल पत्थर), गर तुम भुला न दोगे(यकीन) जैसे गीत श्रोताओं को आज भी मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

Mohd. Rafi Kishore Kumar

सत्तर दशक मे रफ़ी साहेब ने नासिर हुसैन की फ़िल्म से जबरदस्त वापसी करते हुए गायन के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता। इसी वर्ष मनमोहन देसाई की सुपरहिट ‘अमर अकबर अंथोनी’ के गीतों से मो रफ़ी एक बार फ़िर शीर्ष पर पहुंचे । रफ़ी साहेब ने कैरियर की दूसरी पारी दमदार तरीके से शुरू की,फ़िल्मफ़ेयर व राष्ट्रीय पुरस्कार से वह  फ़िर से चर्चा मे आ गए थे।

लोकप्रिय पत्रिका ‘फ़िल्म वर्ल्ड’ ने भी ‘तेरी गलियों मे न रखेंगे
कदम’ के लिए उन्हे सम्मानित किया।
दूसरी पारी का यह सफ़र 31 जुलाई,1980 को हृदयघात से समाप्त हुआ, तो मानो ऐसा लगा कि संगीत की महफ़िल अधूरी हो गई। अपने स्वर्णिम संगीत को पीछे छोड रफ़ी साहेब हमारे बीच से सदा के लिए जा चुके थे।

हम सभी जानते हैं कि वह एक महान गायक थे पर रफ़ी के गीतो के गीतों के महत्त्व पर कम ही चर्चा हुई । किसी भी गीत के महत्त्व पर विचार करने से पूर्व उस पर गंभीरता से सोचना होगा, दरअसल श्रोताओं मे संगीत को टाईम-पास समझने की गलत अवधारणा बनी हुई है । सभी संगीत ऐसा नही होता| रफ़ी साहेब के गीतों या किसी भी उच्च श्रेणी गीत-संगीत को ध्यान से सुनने पर उसमे एक विचार समक्ष आता है । संगीत को उसे पूर्ण रुप मे समझने के लिए उसे ज़िंदगी से जोड कर देखना होगा।

Cheerful Rafi

ज़िंदगी के अनेक पहलू संगीत के माध्यम से समझे जा सकते हैं। इस बिंदु पर रफ़ी की गायकी के संदर्भ  मे चर्चा कुछ विचारनीय गीतों जैसे ‘ नफ़रत की दुनिया को छोड के’ (हांथी मेरे साथी) , ‘आया रे खिलौने वाला’( बचपन), ‘मिले न फ़ूल तो कांटों से दोस्ती’(अनोखी रात), ‘कभी खुद पे कभी हालात पे रोना (हमदोनो), ‘राही मनवा दुख की चिंता’ (दोस्ती), ‘हर फ़िक्र को धुंऐ मे उडाता’ (हम दोनों), ‘सुख के सब साथी’(गोपी), ‘मन रे तु काहे न धीर धरे’ (चित्रलेखा) के साथ जा की सकती है ।

फ़िल्म ‘हांथी मेरे साथी’ का गीत पशुओं के प्रति आदमी की निष्ठुरता पर कडी टिप्पणी करता है। मानव समाज मे पशुओं को लेकर अमानवीयता विचारनीय बिंदु है । वही ‘बचपन’ का गीत ‘आया रे खेल खिलौने वाला’ मे हाशिए पर जा चुके कारीगरों , मेहनतकशों व आम आदमी की पीडा को बयान करता है। फ़िर ‘सुख के सब साथी’ गीत के साथ ज़िंदगी मे मानव के प्रति मानव के निष्ठुर आचरण को बताया गया। इस तरह रफ़ी के गीतों का एक अलग महत्त्व है।

Leave A Reply

Your email address will not be published.