Interview Ayushmann Khurrana : ‘एंटी हीरो रोल करने की बड़ी तमन्ना है’
Ayushmann की फिल्म बाला को लोग खूब पसंद कर रहे हैं..अपनी फिल्मों और निजी जीवन पर खुलकर बात की उन्होने फिल्मसिटी वर्ल्ड से..ब्यौरा पेश कर रहीं हैं वर्षा दीक्षित..
रिपोर्टर – Ayushmann पहले आर्टिकल 15 हिट हुई, फिर ड्रीम गर्ल को ड्रीम सक्सेस मिली और अब बाला को लेकर भी काफी पॉजिटिव माहौल है तो क्या कहेंगे कामयाबी के इस सफर पर ।
आयुष्मान – बहुत अच्छा लग रहा है..लोगों को मेरा काम पसंद आ रहा है, फिल्में सफल हो रही हैं..लोग वो पसंद कर रहे हैं जिन विषयों को मैने अपने अंदर से आती आवाज से चुना है और अब बाला है जो एक बार फिर से बड़ी अनोखी और लाजवाब कहानी है।
रिपोर्टर – इतनी सारी कामयाबी, ढेर सारी फिल्में, फैंस का प्यार ..नाम शोहरत पैसा सबकुछ आ जाने के बाद भी क्या बात है जो आपको जमीन से जोड़े रखती है ?
आयुष्मान – परिवार का होना आपको डाउन टू अर्थ रखता है..आपके पास सबकुछ है..ढेर सारा काम है, पैसा है, नाम है , शोहरत फिल्में प्रमोशन नए लोग, नए आईडियाज सबकुछ है लेकिन आपके पास नहीं है तो वो है परिवार के लिए ढेर सारा समय और ये बात आपको हमेशा एहसास दिलाती है कि ये सब बस आपको एक पोजीशन दिला सकते हैं मगर परिवार आपको एक तरह से जो़ड़ता है। अभी मैं वो संतुलन नहीं बना पाता कि काम भी कर लूं और परिवार को भी समय दे लूं..शायद जिस दिन वो कर लूंगा तो थोड़ा उड़ने लगूं ( हंसत हुए)
रिपोर्टर – बाला कमियों से लड़ने की बात कहती है, आप किन बातों से जूझते रहे थे अपने जीवन में या बचपन में ?
आयुष्मान – बचपन में मैं बहुत पतला था और ये बात बहुत परेशान करती थी मुझे.. मैं खाता तो बहुत था लेकिन मेरी पाचन शक्ती इतनी मजबूत थी कि मेरा वजन नहीं बढ़ता था..मैं तब टेनिस खेलता था और मेरे कोच ने मुझे बोला था कि आप टेनिस खेलना बंद कर दो..फिर मुझे वो छोड़ना पड़ा..बाद में 15-16 का जब हुआ तो थोड़ा वजन बढ़ा लेकिन तब भी टेनिस खेलते वक्त ये हिदायत की ज्यादा मत खेलो क्योंकि तुम बहुत पतले हो। तो मेरी जिंदगी में ये एक बात बाला के मैसेज से जोड़कर देखें तो याद आती है।
रिपोर्टर – बतौर एक्टर और साथ ही बतौर इंसान आपने खुद में क्या खोजा है या बदलाव किया हाल के दिनों में ?
आयुष्मान – एक अभिनेता के तौर पर मैनै पाया है कि अपने अंदर का आवाज यानि अंतरआत्मा की आवाज सुनना बहुत ही जरूरी है इस कला में..विकी डोनर के फौरन बाद मैं अनुभवी लोगों को सलाह लेने पर फोकस करने लगा था क्योंकि मुझे लगा था कि फला इंसान ज्यादा वक्त से इंडस्ट्री में है तो उसे ज्यादा पता होगा । लेकिन सच बताउं तो किसी को भी कुछ नहीं पता होता क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री में कोई खास पैटर्न पर कुछ नहीं चल रहा होता । कोई मंझा हुआ डायरेक्टर या एक्टर भी गलत हो सकता है तो बाद में मैने अपनी गट फीलिंग की सुनना शुरु किया और जबसे अपने अंदर से आती आवाज पर फिल्में चुनना शुरु किया मेरी फिल्में चलनी शुरु हो गईं। पर्सनल स्तर पर मैने बदलाव किया कि मैं किसी भी रिश्ते में टकराव को टालने की कोशिश करता हूं..अगर कहीं कोई मनमुटाव है तो उसका समाधान निकालने की कोशिश करें बात करें न कि एक टेंस माहौल बनाए रखें जो मैं पहले बहुत करता था। मैं और मेरी पत्नी पहले कॉऩफ्लिक्ट में ही रहते थे..बाद में हमने इसे सॉल्यूशन के लेवल पर लाया और जब आप ये कर लेते हैं तो फिर एक टीम बन जाते हैं ।

रिपोर्टर – नेशनल अवार्ड मिलने के बाद आपको किसी तरह का दबाव महसूस होता है फिल्में चुनते वक्त ?
आयुष्मान – दबाव तो नहीं लेकिन हां एक तरह की जिम्मेदारी का एहसास जरूर होता है और उससे भी ऊपर इस बात की खुशी होती है कि मेरे काम को एक वैलिडेशन मिला है सम्मान मिला है। ये सम्मान आपको हिम्मत देता है और भी रिस्क लेने का और साथ ही ये बताता है कि आप सही रास्ते पर हैं और जो कर रहे हैं वो लोगों के साथ साथ दिग्गजों पारखी लोगों को भी रास आ रहा है.
रिपोर्टर – आपकी ज्यादातर फिल्मों की शूटिंग और किरदार यूपी के लखनऊ या कानपुर जैसे शहरों में होती है तो इसका कोई खास कनेक्शन ?
आयुष्मान – मेरी फिल्मों में हिंदी को काफी उभारा गया है..और यूपी की भाषा ही हिंदी है..हिंदी भाषी बेल्ड है यूपी का एक बड़ा इलाका..मेरी फिल्मों में या मेरे किरदार को यूपी के फ्लेवर में फलने फूलने का बढ़िया मौका मिलता है..और यूपी में शूट करना आज के वक्त में बहुत आसान हो गया है जो पहले नहीं था..यूपी में शूटिंग करने पर प्रोड्यूसर को सब्सिडी भी मिलती है जो बाकी राज्यों से ज्यादा है..दिल्ली फिल्मों में बहुत दिखा चुके तो अब यूपी दिखाते हैं। दिल्ली की एक तरह की लैंग्वेज है लेकिन यूपी में हर 10 किमी पर भाषा लहजा सब बदल जाता है जो फिल्म को नया रंग दे देता है।

