चश्मदीद मैं भी हूं : चौथी कूट( FOURTH DIRECTION)
पंजाबी फिल्मों में खास जगह रखने वाली चौथी कूट पर ये विशेष लेख लिखा है प्रशान्त प्रखर ने...
मैने अन्हे घोरे दा दान पढ़ी है..देखी नहीं…मगर मैने चौथी कूट ( फोर्थ डायरेक्शन ) देख ली है….दोनों फिल्मों के निर्देशक गुरविन्दर सिंह हैं… मैं इस लेख को जिनता आसान बना पाउंगा उतना बनाउंगा क्योंकि चौथी कूट एक मुश्किल फिल्म है…और फिल्म जोड़ने का दबाव मुझपर न हो तो चौथी कूट मेरे जैसे बाहरी व्यक्ति को भी अपने अंदर दाखिल करा लेने वाली जिन्दगी है….एक ऐसी जिन्दगी जिसकी भाषा..जिसका रहन सहन..जिसके खेत..जिसकी छत..जिसकी दूथ रोटी सभी से मैं सपनों में भी कभी नहीं मिला… .ये खुलती है तो समय और सड़क दोनों पर मैं होता हूं….कोई और होता ही नहीं…..और फिर दौड़कर आते हैं बारी बारी से कुछ लोग..वो पगड़ियां पहने लोग मुझसे कहते हैं..ये गल्त बात है …मुझे अकेला ही छोड़ चल दिये…ये लोग फिर भी सफर में मेरे साथ थे..मुझसे बातें तो नहीं की लेकिन साथ थे…लेकिन टॉमी तो नहीं था..कभी भी..मुझे कुत्तों से ..उनके नाम से..उनसे जुड़े किसी भी अहसास से बेचैनी होती है…लेकिन टॉमी की बैचेनी मेरी बेचैनी जैसी नहीं थी..वो अपनी मौत के सामने कभी बेचैन नहीं होता…वो दौड़कर उसी तरफ आ रहा होता जिस तरफ से किसी सिपाही ने उस पर गोली चलाई होती…मगर वो फिर भी न मरता….जिनके लिए वो बेटे सा था उनपर रोज उसे जहर देकर मारने का दबाव था..ऑपरेशन ब्लू स्टार ने भी तो राज्य के नौजवानों की बैचेनी को करार दिया था………
फिल्म – चौथी कूट
निर्देशक- गुरविन्दर सिंह
अवधि- लगभग दो घंटे
भाषा- पंजाबी
