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सिनेमा की सोच और उसका सच

देखिए वो बच्चा रो रहा है और आप भी: द बायसिकल थीफ़

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मैने जिनको भी सुना है या पढ़ा है अपनी सिनेमाई ज़मीन तलाशने की संघर्ष के दिनों के बारे में बताते हुए..उनमें से ज्यादातर इस एक फिल्म का ज़िक्र ज़रूर करते हैं। द बायसिकल थीव्स को सत्यजीत रे से लेकर आज तक के फिल्मकारों ने अपनी फिल्ममेकिंग का स्कूल कहा है। मेरे पास ये फिल्म लगभग 6 महीने से थी..मैने बहुत पहले से इसका ज़िक्र अपनी सिनेमाई रिसर्च में भी पाया था मगर किसी ना किसी कारण से इसे देख पाने के सौभाग्य से दूर रहा। लेकिन सच में ज़िंदगी का अपना कुछ डिज़ाइन है जिसकी वजह से मायानगरी मुंबई में ये फिल्म मैने देखी जबकी यहां कि रोज़ की आपाधापी से ज्यादा आसानी से मैं हैदराबाद में ये फिल्म देख सकता था। देखिए मुझे सच में खुशी हो रही है ये कहते हुए कि अच्छा हुआ ये फिल्म मैने मुंबई में देखी। मैं इस सिनेमा को शायद इस शहर में रहकर ज्यादा महसूस कर पाया हूं और साथ ही साथ इस फिल्म ने मेरी एक कहानी का एक कोण समझकर उसे आगे बढ़ाने में मदद की है, ना केवल इस फिल्म ने बल्कि मोहन राकेश के नाटक आषाढ़ का एक दिन भी मेरे लिए एक प्रेरणा पुंज बनकर आया और मेरी एक कहानी जो बहुत वक्त से आगे नहीं लिखी जा पा रही थी उसे राह मिल गई।

यूरोप की फिल्में हमेशा से भारतीय फिल्मकारों को ज्यादा अपनी ओर खींचती रही हैं..और इटली के विक्टोरिया द सीका के ज़रिए तराशी गयी द बायसिकल थीव्स का अध्ययन तो मेरे ख्याल से भारत के हर बेहतरीन डायरेक्टर ने अपने जीवन में किया है। सत्यजीत दा की अपु त्रयी में तो आप जबअपु और उसके पिता का संयुक्त संघर्ष देखते हैं तो इस फिल्म की झलक मिलती है हालांकि सत्यजीत रे का अपना स्टाइल ऑफ सीन डेवलपमेंट था।

इस फिल्म का कथानक बहुत आसान सा है मतलब आपको फिल्म के टाइटल से लेकर शुरू के पंद्रह बीस मिनट के सीन में ही पता चल जाता है कि पूरी फिल्म में क्या होना है मगर उसके बावजूद फिल्म की खूबसूरती कहें या सीन को शिद्दत से तराशने का हुनर पूरी फिल्म आपके प्रेडिक्शन को बस कहीं कहीं चुनौती देते हुए वैसी ही चलती रहती है जैसी आपने सोच रखी है। कहानियां अगर आपके हिसाब से चलकर भी आपको बांधे रखें तो ये डायरेक्टर का कन्विक्शन माना जायेगा जिसने कहानी को आपकी नज़रों के आगे नचाकर बगैर चौंकाये आपके दिलों को छुआ। दुनिया के किसी भी कोने में परिवार जैसी संस्थाएं कमोबेश एक जैसी ही हैं, खासतौर पर वंचित वर्ग की शक्लें और रहनसहन तो दुनिया के हर हिस्से में मिलते-जुलते प्रतीत होती हैं, ऐसे जैसे ईश्वर ने बस इन्हें एक जैसी शक्लें..एक जैसे दिल..आंसूंओ की एक जैसी मात्रा और छोटी खुशियों में ढेर सारा एक साथ हंस लेने का कलेजा बांटने में कोई भेदभाव ना किया हो। कोई फर्क आपको नज़र नहीं आयेगा अपने घर के पास किसी चाय की दुकान पर जल्दी जल्दी मेज़ साफ कर रहे लड़के और इटली की सड़क पर तेल का गैलन खुशी से उठाते लड़के में..आपकी मां जैसे परिवार के बुरे दिन में ज्योतिषियों..पंडितों के चक्कर बगैर आपसे बताये लगाती है वैसे ही वहां वो महिला किसी दूसरी महिला के घर में कुछ चढ़ावे के साथ ये आशा रखते हुए भाग्यवादी बनने गयी है कि उसके परिवार की भी तो कहीं ना कही भाग्य के साथ मित्रता हो सकती है। जब वो परिवार का मुखिया अपने सामने से चोरी हो गई सायकिल के लिए भागता है और आखिरकार डर और पीड़ा के मिश्रण में लेई के डब्बे और पोस्टर चिपकाने में ली गई इस्तेमाल की सीढ़ी पर गुस्सा करके पूरे तरीके से रो भी नहीं पाता तो आपको अपना कोई दिन याद आता है जब आपसे भी ऐसी कोई चीज़ चुरा ली गई थी जो कि तकलीफ के दिनों में आपके जीने का ज़रिया थी। लेकिन एक दिन आपको परिवार को बताना होता है कि आप तो लुट चुके हैं..अब क्या करेंगे..परिवार जो आप पर टिका है वो परेशान है मगर वो कहता है कि आप झूठ में परेशान हो रहे हैं.,,सब ठीक हो जायेगा..ईश्वर की याद बुरे वक्त में आती है ये हर जगह कॉमन है।

लेकिन फिर भी आप सहारे ढूंढते हैं…परिवार आपकी उंगली थामे हुए है लेकिन आप अपनी परेशानियों में बतौर मुखिया इतने गुम हैं कि रास्ते में उस परिवार के साथ क्या तकलीफें आ रही हैं..उसकी परवाह नहीं होती आपको…परिवार चोटिल हो रहा है तो आपको गुस्सा आ रहा है। जब आप उसे बोझ समझकर कहीं किसी फुटपाथ पर छोड़कर वहीं मिलने की बात करते हैं तो भी वो आपकी बात मान लेता है..लेकिन आपको होश आता है तब जब वो पानी में डूबने वाला बच्चा आपका नहीं होता है..क्योंकि बच्चे के डूबने का शोर आपको अपने बच्चे के लिए परेशां हाल कर देता है..वही जिसे आप फुटपाथ पर छोड़कर आये थे।

वो बच्चा अभी भी वहीं फुटपाथ पर है..आपके इंतज़ार में…कभी सोचते नहीं कि वो परिवार इतना आज्ञाकारी क्यों है..उसके लिए दुनिया भर के महान पुरूषों की कतार से अलग आप रोल मॉडल कैसे बन गये..कभी नहीं सोचते..और जब आप सोचते नहीं तो आप चोर बन जाते हैं..आपको लगता है कि जैसे किसी ने आपकी खुशियां चुरा ली वैसे ही आपको भी ये पूरा हक़ है कि आप भी किसी की खुशियों पर डाका डाल दें। ये हताशा और बावलापन आपको अपने बच्चे के सामने लोगों से पिटवाता है। वो बच्चा अभी भी रो रो कर अपने पापा को छोड़ देने का आग्रह किये जा रहा है…लोग उस बच्चे की वजह से आपको छोड़ रहे हैं….आपकी उंगली थामे वो बच्चा अभी भी रो रहा है….और आप भी। सरकारी दफ्तरों मे घूस लेते हैं आप ताकी आप अपने परिवार के लिए खुशियां खरीद सकें लेकिन वो घूस लेते आप पकड़े जाते हैं और उस वक्त आपका बच्चा आपको देख रहा हो तो क्या ऐसा न लगेगा कि आप अपने बच्चे के सामने भरी दोपहर सड़क पर पीटे जा रहे हैं। आप जेल जा रहे हैं और आपका बेटा रो रहा है…आप भी रो रहे हैं क्योंकि किसी दिन आपने अपनी पत्नी को सिर्फ इसलिए तलाक दे दिया था क्योंकि आपको अपने बेटे के लिए बेहतर औरत मिल गई है। वो तब भी रो रहा है जब उसकी मां से दूर आप दूसरी औरत पर गुस्सा कर रहे हैं…अभी कुछ ही दिन तो हुए थे उसे उस औरत को मां समझने में..और जब वो दूसरी औरत आपको पीट रही होती है..ज़बान से भद्दी गालियां निकाल रही होती है तो आपको बार बार पकड़कर आपका बेटा अभी भी रो रहा होता है…और आप भी…

फिल्मसिटी वर्ल्ड ेके लिए इस लेख को लिखा है फिल्म पत्रकार प्रशान्त पाण्डेय ने। 

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