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सिनेमा की सोच और उसका सच

मूड फ्रेश करना हो तो बासु चटर्जी की ये फिल्मेें ज़रूर देखना !

सोशल फिल्मों का सयाना फिल्मकार - बासु दा

10 जनवरी 1930 को अजमेर में पैदा हुए बासु दा की फिल्में क्लासिकल फिल्मों के एहसास वाली लोकप्रिय फिल्में रहीं।

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कॉमन मैन और मिडिल क्लास की थीम पर फिल्में बनाकर भरपूर मनोरंजन करने की कला में ऋषिकेश मुखर्जी के बाद सबसे अहम नाम है बासु चटर्जी का। वे भारतीय मध्यवर्ग की नब्ज को पर्दे पर उकेरने की कला के महारथी थे। बतौर कार्टूनिस्ट अपने कॅरियर की शुरुआत करनेवाले चटर्जी को आड़ी तिरछी रेखाओं से खेलने का शौक बचपन से ही था , आगे चलकर यही रचनाशीलता सिल्वर स्क्रीन पर भी साकार हुई और बॉलीवुड में लीक से हटकर कई फिल्मों का निर्माण हुआ। फिल्म सारा आकाश से सिनेमा का सफ़र शुरू करने वाले चटर्जी ने एक से बढ़कर एक सार्थक फिल्मों का निर्माण किया

चमेली की शादी से लेकर चितचोर तक ,, एक रुका हुआ फैसला से लेकर स्वामी तक ,, सिनेमा जिस एक नाम के इशारे पर करतब दिखा रहा था वो थे जाने माने फिल्मकार बासु चटर्जी…चटर्जी ने फिल्मों को एक अलग ट्रैक दिया ..बासु चटर्जी की फिल्मों का नायक तड़क भड़क से दूर , अपनी हुनर से दाद हासिल करता है। रजनीगंधा में दिल्ली में प्यार के पींगे बढ़ाते दीपा और संजय नाम के दो किरदार इतने स्वाभाविक लगते हैं मानों पड़ोस के किसी घर की कहानी हो । योगेश के लिखे गीत, सलिल के बनाये साजों पर कुछ यूं बैठ जाते हैं जैसे भंवरा फूलों का रस पी कर मदहोशी में गुनगुना रहा हो.

खट्टा मीठा में दर्जन भर कलाकारों के साथ काम किया और फिल्म को हल्के फुल्के अंदाज़ में दर्शकों को परोस दिया..जोखिम था कि ऐसी सादगी से कही गयी कहानी को मंजूरी मिलेगी या नहींं। मगर फिल्म चल निकली..इस फिल्म को देखते वक्त ऐसा लगता है कि बासु दा ने किसी पारसी अपर मिडिल क्लास होम में हिडेन कैमरे लगा दिये हों और उनके हाव भाव से लेकर तकलीफें खुशियां सब जस के तस कैमरे में उतार लिये हों..गुलज़ार और राजेश रोशन की जुगलबंदी जैसे ज़िंदगी से बतियाती मिलती है…

बासु दा के जीवन की सबसे यादगार फिल्मों में से एक है राजश्री प्रोडक्शन की चितचोर..कैसे खादिम का प्रेम गलतफहमी की वजह से अपने मालिक की भावी पत्नी से हो जाता है ये चितचोर की दिलचस्प और उतनी ही सरल कहानी का केंद्र है। येसुदास की आवाज़ में गाये हुए तमाम तराने इतने मीठे हैं कि शहद भी फीका लगे।

चितचोर से बिलकुल अलग शौकीन जैसी फिल्में आसानी से दर्शकों के जेहन को गुदगुदा जाती हैं है ..शौकीन से जुदा राहों पर चमेली की शादी को हम प्योर ह्रूमर की संज्ञा दे सकते हैं..अमज़द खान..अनिल कपूर, अमृता सिंह और पंकज कपूर की अदाकारी की गवाह ये फिल्म भारत में कास्ट सिस्टम जैसे बेहद संवेदनशील विषय को व्यंग्य की गिरहों में बांध के आपको लाजवाब कर जाती है।

बासु चटर्जी ने तीस से अधिक हिंदी फिल्मों का निर्देशन किया ..साथ ही कई बंगला फिल्में भी डायरेक्ट कीं। वे एक कुशल पटकथा लेखक भी थे ।उनके लिखे कई संवाद आज भी सिनेप्रेमियों की स्मृति में बरकरार है । उन्हें 1969 में सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखन के लिए फिल्म फेयर अवार्ड से नवाजा गया ..चटर्जी का सिनेमा पारिवारिक और साफ सुथरे अंदाज़ में लोगों का मनोरंजन करता है । सिनेमा की लोकप्रियता से अलग चटर्जी के काम ने छोटे पर्दे पर भी खूब वाहवाही बटोरी । दूरदर्शन के लिए बासु दा ने रजनी, दर्पण, कक्काजी कहिन और ब्योमकेश बक्शी जैसे धारावाहिकों का निर्माण किया । चटर्जी की शैली ने यहां भी उनके काम को अलग दिखाया । ब्योमकेश बक्शी दूसरे जासूसों की तरह ख़तरों से खेलने की बजाए, दिमाग से उलझने सुलझाने में यकीन रखते हुए दिखे । बड़े पर्दे पर जब बासु चटर्जी चितचोर जैसी फिल्मे बना रहे थे उस वक्त हिन्दी सिनेमा में हिंसा और अश्लीलता चरम पर थी लेकिन बावजूद इसके चटर्जी की फिल्मों में कोई समझौता नजर नहीं आया। नतीजा बॉलीवुड में कई सार्थक फिल्मों का निर्माण हुआ ,, बासु चटर्जी की फिल्में क्लासिकल सिनेमा की नज़र से पॉपुलर सिनेमा का चित्रण है।

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