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Basu Chatterjee Special : आम परिवारों की खास कहानी बयां करने वाले बासु चटर्जी

Basu दा यानि बासु चटर्जी हमारे बीच नहीं रहे..उनकी पॉपुलर फिल्मों की कहानी हर कोई कह रहा है लेकिन क्या आपको याद है सारा आकाश..जी हां बासु दा की पहली फिल्म..सारा आकाश को शब्दों के संसार में समेट कर लाई हैं हमारी होनहार लेखक प्राची उपाध्याय.

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चले गए Basu Chatterjee.. 90 साल की उम्र में उन्होने इस दुनिया को बीती 4 जून को अलविदा कह दिया। आम लोगों की कहानी को खास तरीके से कहनेवाले बासु चटर्जी देश में न्यू वेव सिनेमा के नींव ऱखनेवालों में एक थे। 1969 में तीन फिल्में आई थी, मृणाल सेन की भुवन शोम, मणि कौल की उसकी रोटी और बासु चटर्जी की फिल्म सारा आकाश….इन तीनों ही फिल्मों को भारतीय सिनेमा में समानांतर सिनेमा की शुरूआत माना जाता है। ये तीनों ही फिल्में एक दूसरे से बिलकुल अलग-बिलकुल जुदा है। उसकी रोटी जहां एक पत्नी के समर्पण और पति के उलाहना को सामने रखती है, तो भुवन शोम  एक कड़क अधिकारी के मोम की तरह पिघलने की कहानी दिखती है। वहीं सारा आकाश एक भरे-पूरे परिवार में एक नए-नवेले पति-पत्नी के आपसी रिश्ते के उतार-चढ़ाव की कहानी है।

बासु चटर्जी की सारा आकाश आपके सामने समर और प्रभा की कहानी लाती है। समर एक कॉलेज स्टूडेंट है। जो अपनी जिंदगी में कुछ अर्थपूर्ण करना चाहता है। उसके आदर्श सुभाषचंद्र बोस और विवेकानंद है। वो उनकी ही तरह देश और समाज के लिए अपना जीवन जीना चाहता है। लेकिन उसका परिवार उसकी शादी करना चाहता है। समर के बहुत मना करने के बावजूद उसकी एक नहीं चलती और उसका विवाह प्रभा के साथ हो जाता है। प्रभा जो कि बेहद सुंदर है और मैट्रिक पास है। वो ब्याहा करके जब समर के घर आती है तो हर कोई उसकी सुंदरता की तारीफ करता है। ऐसे में समर जिसको ये शादी अपनी मर्जी के बिना करनी पड़ी वो भी प्रभा की सुंदरता की उपेक्षा नहीं कर पाता। अपने ख्यालों में वो प्रभा को अपने पास, अपने करीब सोचता है। लेकिन हकीकत में जब उसके कमरे में दाखिल होने के बाद भी प्रभा यूं ही खिड़की के पास खड़ी रहती है, तो खुद को प्रगतिशील और विवेकशील समझनेवाला समर अपने दंभ के आगे घुटने टेक देता है। वो ये सोचता है कि मेरे कमरे में दाखिल होने के बाद भी प्रभा खुद मेरे पास क्यों नहीं आई। बस इसके बाद से दोनों के रिश्ते में जो मिठास आनी चाहिए वो ना आकर कड़वाहट घुलने लगती है।


प्रभा, एक शांत, सौम्य पढ़ी-लिखी लड़की, जिस को समझ नहीं आता कि समर उससे नाराज क्यों है, अपनी ननद के समझाने पर वो समर को मनाने की कोशिश करती है। लेकिन यहां भी दोनों के बीच का फासला भर नहीं पाता। समर खुद चाहता है कि प्रभा उसके पास आए उससे बात करे, लेकिन प्रभा की झिझक और समर के पुरूष होने का अंहकार आड़े आ जाता है।

प्रभा सुंदर है, पढ़ी-लिखी है, सिलाई-बुनाई कढ़ाई सब गुण है उसमें, लेकिन वो अपने मायके से दहेज नहीं लाई, और इस बात का ताना उसे जब-तब ससुराल में मिल ही जाता है। वहीं शादी को महीनों बीत गए लेकिन प्रभा और समर में कोई रिश्ता तो छोड़ो, कोई बात तक नहीं हुई, और इस बात को लेकर भी उसको ताने सुनने को मिलते हैं। सुसराल में प्रभा के दो ही सहारे हैं, एक उसकी ननद और दूसरी उसके कमरे की खिड़की, जिसके सहारे उसका वक्त बीत पाता है। आते-जाते लोग, उगता-ढलता दिन, प्रभा के लिए ये खिड़की उस सहारे की तरह है जो शायद उसके पति को होना चाहिए। लेकिन शादी के 6 महीने बाद भी अगर पति-पत्नी में किसी तरह की कोई भी आत्मीयता, कोई लगाव ना हो, गलती स्त्री की ही मानी जाती है। यहां भी प्रभा के साथ ये ही होता उसकी सास उसके और समर के रिश्ते का ताना देते हुए प्रभा के चरित्र पर उंगली उठती है। वो कहती हैं ना जाने क्या देखती रहती है उस खिड़की में से, शायद तभी पति इतना कटा-कटा रहता है।


इधर समर, अपनी एक अलग जद्दोजहद से गुजर रहा है। वो मन ही मन प्रभा को पसंद करता है, उसके मायके जाने पर उसे याद करता है, लेकिन इस बात को दिखाना या जताना तो जैसे उसके लिए पाप है। वो भले प्रभा से बात नहीं करता लेकिन डांटने का मौका नहीं छोड़ा, शायद इस डांट के जरिए वो प्रभा के लिए अपने अंदर के स्नेह, लगाव को छुपाने की कोशिश करता है। लेकिन प्रभा को डाटंने के बाद हर बार उसे अहसास होता है कि उसके गलत किया, वो उसके सहारे ही यहां आई है और वो ही उसकी उपेक्षा कर रहा है। एक मौके पर परिवारवालों के आवेश में आकर समर प्रभा पर हाथ तक उठा देता है, जिसके लिए उसे खुद से घृणा होने लगती है। वो खुद अपने स्वघोषित प्रगतिशील विचारधारा पर सवाल उठाने लगता है।

प्रभा और समर के बीच के फासले को भरने का एक ही जरिया है, बातचीत, शादी के 6 महीने बाद भी दोनों ने अबतक एक दूसरे से बात तक नहीं है। और दोनों के बीच की इस खाई के एक तरफ है झिझक, तो दूसरी तरफ है अंहकार… लेकिन कई उतर-चढ़ाव के बाद एक वक्त आता है समर की नजर अकेली, उदास, कमजोर प्रभा पर पड़ती है, जो अपने चरित्र पर सवाल उठाए जाने के बाद से टूट गई है, और इस मौके पर समर का अंहकार टूट जाता है और अपने मन में प्रभा के लिए जो प्यार वो महसूस करता है वो बाहर आ जाता है। आखिरकार, शादी के 6 महीने बाद समर और प्रभा एक दूसरे से पहली बार बात करते हैं, और ये एक ही कदम उनके बीच की खाई को भर देता है।

बासु चटर्जी के ये दोनों ही किरदार बेहद खूबसूरत और मासूम है। ये आपको उस दौर के भावनाओं से रूबरू कराता है। जिसे समझना आज के दौर में थोड़ा मुश्किल है। बिना मिले, बात किए शादी और शादी के बाद एक दूसरे को जानने समझने का सफर। वो भी एक भरे-पूरे परिवार के बीच।

इस फिल्म में एके हंगल और दीना पाठक जैसे दिग्गज कलाकारों ने काम किया था। वहीं पैरेलल सिनेमा के पायनियर डायरेक्टर में से एक मणि कौल ने भी इस फिल्म में अभिनय किय़ा था। मणि कौल ने मुख्य किरदार समर के बड़े भाई अमर ठाकुर का किरदार अदा किया था।

बासु चटर्जी ने कई पारिवारिक फिल्में बनाई, जिनकी कहानी आपके और हमारे परिवार की कहानी सरीखी थी। और शायद ये ही समानता उन फिल्मों को खास बनाती है। आज बासु दा हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनकी कहानी, उनकी फिल्में हमेशा हमारे बीच रहेंगी जो ये बताएंगी, आम लोगों की कहानियां उन्ही की तरह बेहद खास होती हैं।

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