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रामानंद सागर और लाॅक डाऊन साल 1942.

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फिल्मसिटी वर्ल्ड के लिए ये विशेष लेख लिखा है फिल्म लेखक अविनाश घोडके ने

अपनी नानी के पास रेहकर ग्रेजुएशन कर रहे रामानंद सागर टी.बी. से बीमार चल रहे थे. उस वक्त टी..बी. ‘लाइलाज’ था । टीका आने में अभी 20 साल का वक्त था । उन दिनों टी. बी. जानलेवा बीमारी थी । लोग खाॅंस खाॅंसकर जर्जर होकर मरते थे।टी.बी. होने के कारण मरीज को किसी कमरे में अलग  रखा जाता।रामानन्द को भी वैसे ही रखा गया। रामानन्द का पिंड लेखक का था।भाषा विषय में उनकी ख़ासी रूची थी । उसी साल उनको पंजाब विश्व विद्यालय से संस्कृत और पारसी भाषा में स्वर्ण पदक मिला था।लघुकथा , नाटक और कवितायें वो किया करते थे। टी..बी. की ये  बीमारी उनको निराशा के अंधेरे में झोंक सकती थी लेकिन उनकी लेखन प्रतिभा ने इस वक्त उनका साथ दिया। टी.बी की भयानक बीमारी से रोज के जूझने का अनुभव उन्होने डायरी की तरह लिखना शुरू कर दिया। इस अनुभव से दूसरे मरीजों का कुछ मार्गदर्शन हो जायेगा ऐसा उन्हे लगा। रामानंद जी की ये आत्मकथा लेखमाला के स्वरूप में ‘Diary of a T.B. Patient’ इस शीर्षक के साथ लाहौर के ‘अदब ए मशरिक़ ‘ साप्ताहिक में प्रसिद्ध हुई। हाल ही मे मैने फेसबुक पर प्रसिद्ध सिनेमा वितरक श्याम श्रॉफ़ जी की एक पोस्ट पढ़ी जिसमें लिखा था “एक ज़माने में जब रामानन्द सागर जी का रामायण सीरियल टीवी पर आता तो पूरे भारत की सड़कों पर जैसे कर्फ़्यू लग जाता…

आज कोरोना की महामारी की वजह से कर्फ़्यू लगा है इस लिये रामानन्द सागर की रामायण फिर से दिखायी जा रही है। 1987-88 के रामायण के वो दिन आज भी मुझे याद हैं। रास्तों पर सचमुच कर्फ्यू सा लग जाता जब रामायण का टीवी पर प्रसारण होता था . मगर घर घर में मंगल त्यौहार सा वातावरण बन जाता। रामानन्द जी ने नेशनल टेलिविजन की ताक़त को बडी व्यावसायिकता से भुना लियाा था।मंडी हाउस के बाबू कल्चर के साथ उन्होंने किस तरह रचनाशीलता को निभा लिया ये तो वो ही जाने लेकिन रामायण सीरियल टेलीविजन जगत में लोकप्रियता का उच्चांक दर्ज करते हुुए चलती रही। रामानंद जी ने खुद एकबार कहा था “ मेरी सारी फिल्में एकतरफ और रामायण एक तरफ”  रामायण सीरियल निर्माण के पहले रामानंद सागर एक कामयाब फिल्म निर्माता और निर्देशक थे।

अपने शुरूआती दिनों में उन्होने पृथ्वीराज कपूर जी के पृथ्वी थिएटर में अप्रेंटिस के तौर पर काम किया था। राज कपूर की ‘बरसात’ फिल्म की पटकथा लिखकर उन्होने सिनेजगत में अपना पहला कदम रखा था। स्क्रीन राइटर के तौर पर अपनी पहचान मुकम्मल करने के बाद रामानंद जी ने निर्देशन भी किया और फिल्मों का निर्माण भी किया। हाॅलीवूड की जेम्स बाॅंड जैसी Spy Thriller फिल्में भारत में पहली बार बनाने का श्रेय उन्ही को जाता है। इस मूड की पहली फिल्म उन्होने 1968 मे बनायी थी जिसका नाम ‘आंखें’ था । आँखें Spy thriller तो थी ही लेकिन वो एक नायिका प्रधान फ़िल्म थी।इससे ये पता चलता है कि रामानन्द जी ने हाॉलिवुड का फ़ॉर्मूला तो उठाया लेकिन विषय वस्तु के तौर पर वो पश्चिम से भी एक क़दम आगे थे। नायिका की भूमिका के लिये उन्होंने उस वक़्त की स्टार अभिनेत्री माला सिन्हा को साईन किया और अभिनेता के तौर पर नवोदित धर्मेंद्र को ले लिया। मुख्य भूमिका में एक अभिनेत्री होने के बावजूद ‘आंखे’ सुपरहिट रही। संयोग की बात ये है कि इसी साल 1968 में भारत सरकार ने अपनी खुफिया एजेन्सी RAW का गठन किया। आंखें की शूटिंग रामानंद जी ने लेबनान देश की राजधानी बेरुत में की थी । उस वक्त बेरुत को पूर्व का पेरिस माना जाता था। इस तरह विदेश मे जाकर फिल्म की अधिकतम शूटिंग करने की व्यावसायिक प्रथा की नींव भी रामानंद जी ने ही रखी। आँखें की कामयाबी के बाद रामानन्द जी ने फिर एक बार Spy thriller film बनाया जो बहोत बड़े पैमाने पे बनी। फ़िल्म का नाम था ‘चरस’। चरस के वक़्त रामानन्द जी ने फ़िल्म की कहानी का प्लॉट यूरोप में रच दिया। दुनिया के सबसे सुंदर देश इटली की पृष्ठभूमि पर ताना बाना रचा गया। रामानन्द जी जैसे एक सच्चे कलाकार को इटली का भा जाना स्वाभाविक सी बात थी क्योंकि इटली दुनिया की कला और संस्कृति की जन्मदाता है। जीवन का फ़लसफ़ा इटली के महान विचारकों ने दुनिया से रूबरू किया। तेरहवीं शताब्दी से लेकर सोलहवीं शताब्दी का Renaissance अर्थात पुनरुत्थान काल में अपनी बेजोड़ कला से संसार को कला की महत्तम ऊँचाई पर ले जानेवाले मायकल एंजलो और लिओनार्दो दा विंची जैसे महामानवों की इटली में रामानन्द सागर जी का कैमरा घूमने लगा। यहीं से तो सिनेमा जगत में New Wave सिनेमा की वास्तविकतावादी फ़िल्मों की एक नयी लहर उमड़ पड़ी थी।

आँखें का इटली की सडकों पर चित्रित किया एक गाना मुझे बेहद पसंद है। गाना धर्मेंद्र और हेमा मालिनी पर चित्रित किया गया है। दृश्यों में आप इटली के लोगो को रास्तों पर रुककर गाने की शूटिंग देखते देख पाते हैं। आनंद बक्षी जी के लिखे इस गाने के बोल हैं ‘ के आजा तेरी याद आयी .. ओ बालम हरजाई..’ मुख्य गीत के आग़ाज़ से पहले सूफ़ी ढंग में गाई हुई कुछ लाईनें दिल चीरती हुई जाती हैं.. “दिल इंसान का एक तराजू..जो इंसाफ को तोले.. अपनी जगह पर प्यार है कायम..धरती अंबर डोले सबसे बडा सच एक जगत में..भेद अनेक जो खोले प्रेम बिना जीवन सूना ..ये पागल प्रेमी बोले ” कोरोना के लॉकडाऊन में फिर एकबार ये गाना यू टयूब पर देख रहा था। गाने में यीशू की मूर्ती ;जो क्रूसपर खूनसे लथपथ और घायल नजर आती है वो कहीं पर आज की इटली की भयानक अवस्था का प्रतीक सी लगती है। यीशू मानो खुद लहुलुहान हो गया है ,कोरोना से मरे सोलह हज़ार शव देखकर। ये गाना ज़रूर प्रेमियों की भावनाओं को सुरों में अंकित करता है लेकिन आज के संदर्भ वेवजह गाने में दुनिया के दर्द को प्रतिबिंबित करते रहते है। इटली में ही जन्मे उस Humanism की याद दिलाता है जो केहता है ‘बस इंसान .. न इंसान के आगे कुछ .. ना पीछे.. ,उसका मन.. उसकी इच्छा ..उसका तर्क और कुछ नहीं.. भगवान भी नहीं”  बुद्ध वचन की याद दिलाने वाले इस फलसफे की साक्षी से आज हमें अपने अंदर की शक्ति को आवाज लगाते हुुए कहना है ..” के आजा तेरी याद आयी !!” लॉकडाऊन में ये गाना ज़रूर देखिये ….

 

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