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शिक्षा माफियाओं के संसार में घुसती फ़िल्म ‘सेटर्स’

पवन मल्होत्रा सेटर्स का सबसे बड़ा आकर्षण हैं । कहानी का नयापन व ट्रीटमेंट में वास्तविकता दूसरे बड़े कारण हैं। दो दोस्तों की कहानी में प्रेम व ज़ुर्म का एंगल इसे मनोरंजक बनाता है। आज की पैसा फेंको तमाशा देखो शिक्षा व्यवस्था की कहानी दिखाती प्रसांगिक फ़िल्म।

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श्रेयस तलपडे और आफताब शिवदासानी की फिल्म ‘सेटर्स’ रिलीज हो गई है। अश्विनी चौधरी की फिल्म को बहुत सकारात्मक रिस्पांस मिला है। सेटर्स का शाब्दिक अर्थ सेटिंग करने वाला होता है। शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाने वाले तत्वों को दिखाया गया है। देश में इतने तरह की परीक्षाएं होती हैं। पेपर लीक होने के मामले भी सामने आते हैं। गिरोह पकड़े जाने के दावे भी किए जाते हैं। इन सबके बीच कारोबार चलता रहता है। कुछ समय पहले इमरान हाशमी की ‘व्हाई चीट इंडिया’ आई थी।वहां भी देश की शिक्षा व्यवस्था को विषय बनाया गया था। चौधरी की ‘सेटर्स ‘बात को आगे ले जाती है। फ़िल्म पेपर लीक होने की प्रक्रिया को रोचक अंदाज में क्रिएट करती है। पेपर लीक व नकल करवाने के तरीकों का गहराई से अध्य्यन करती है । इससे कहानी व घटनाक्रम में रोचकता बनती है। जांच पड़ताल के पहलू ने ट्रीटमेंट को आकर्षक बना दिया है । वास्तविक लोकेशंस पर शूट किए गए दृश्य प्रमाणिकता बनाते हैं।

बनारस के भैया जी (पवन मल्होत्रा) परीक्षाओं में पास कराने का धंधा चलाते हैं। शिक्षा में व्याप्त गड़बड़ियों को अंजाम देने वाले माफिया हैं। कहानी बनारस, जयपुर, दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों के इर्दगिर्द घूमती है, लेकिन केंद्र बनारस है। भैयाजी अपूर्वा (श्रेयस तलपड़े) एवं दूसरे साथियों के सहयोग (जीशान कादरी, विजय राज, मनु ऋषि, नीरज सूद) से शिक्षा तंत्र में दीमक लगाने का काम कर रहे हैं। इंजीनियरिंग मेडिकल से लेकर शिक्षा व रेलवे आदि में नौकरियां दिलवाने का ठेका लेते हैं। शिक्षा में सेंध लगाने का नेटवर्क है। भैया जी कारोबार के मुखिया हैं। अपूर्वा (श्रेयस तलपड़े) उनका दायां हाथ है। परीक्षा में नकली परीक्षार्थी बिठाने से लेकर रियल टाइम में पेपर स्कैन करने तक के तरीके जानता है। अपूर्वा का बचपन का साथी आदित्य (आफताब शिवदसानी) उसकी राह का रोड़ा है। आदित्य बनारस का एसपी है। वो इस गिरोह का पर्दाफाश करने की कसम लिए है । आदित्य की पुलिस शिक्षा माफिया को रंगे-हाथों पकड़ना चाहती है । किंतु भाई लोग पुलिस को चकमा देने की कसम खाए बैठे हैं। मुख्यत ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात’ वाला खेल फिल्म में चलता रहता है।

अपनी रेग्युलर छवि से हटकर श्रेयस तलपड़े अलग अंदाज में नजर आए हैं । भाषा और अभिनय के साथ अपनी भूमिका को विश्वसनीय बनाया है। श्रेयस यूपी वाला लहजा सही पकड़े हैं। एक अरसे बाद आफताब शिवदासानी को पुलिसवाले की भूमिका में देखना स्वागत योग्य है। आफताब की एक्टिंग को लेकर बहुत कम लोगों प्रयोग किया है l लंबे समय से कॉमेडी ही करते नज़र आए हैं l यह फिल्म में उनका एक ताज़ा पहलू देती है l कैरेक्टर आर्टिस्ट विजय राज अपने किरदारों को हर बार नया आयाम देते हैं । इस फ़िल्म में भी वो अपने फॉर्म में हैं। नायिकाओं के हिस्से कुछ खास करने जैसा नहीं था। पवन मल्होत्रा, जीशान कादरी, जमील खान, मनु ऋषि, नीरज सूद, अनिल मांगे सरीखे कलाकारों किरदारों को अच्छे से जीया है। पवन मल्होत्रा का किरदार फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण है। कहानी का नयापन व ट्रीटमेंट में वास्तविकता दूसरे बड़े कारण हैं। दो दोस्तों की कहानी में प्रेम व ज़ुर्म का एंगल इसे मनोरंजक बनाता है। आज की पैसा फेंको तमाशा देखो शिक्षा व्यवस्था की कहानी दिखाती प्रसांगिक फ़िल्म।

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