‘पथेर पांचाली’ रे का सबसे खूबसूरत सपना
समाज की सच्चाई समाज तक पहुंचाने वाले महान फिल्मकार सत्यजीत रे की आज पुण्यतिथि है..
सत्यजीत रे के अप्पू का पहले संसार से आपका परिचय करा रहीं हैं हमारी सीनियर राइटर प्राची उपाध्याय.
‘अच्छी तकनीक वो है जिसका इस्तेमाल दिखाई ना पड़े’….बीसवीं सदी के सबसे महान फिल्मकारों में से एक सत्यजीत रे के ये शब्द आज भी उतने की प्रासंगिक है जितने तब थे…..रे की फिल्में अपने वक्त से आगे की थी, जो समाज की कुरीतियों और बेबस सोच को आईने की तरह लोगों के सामने रख देती थी….हालांकि उनकी इस तरह शैली पर उस वक्त की कई शख्सियतों को दिक्कत थी….लेकिन सबने एक स्वर में ये जरूर माना की रे एक महान फिल्मकार है, जिनका भारतीय सिनेमा के स्तर को और समृद्ध करने में अतुल्य योगदान है….

आज सत्यजीत रे की डेथ एनिर्वसरी है…..साल 1992 में आज ही के दिन यानी 23 अप्रैल को रे ने 70 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया….और अपने पीछे छोड़ गए कलात्मक सिनेमा की वो लालसा जिसे हर फिल्मकार ने ‘inspire and aspire’ किया….आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर हम आपको बताने जा रहे है उनकी पहली फिल्म ‘पथेर पांचाली’ के बनने की कुछ दिलचस्प कहानियां….
किसी भी फिल्मकार के लिए उसकी पहली फिल्म बेहद खास होती है….और उससे भी खास होता है उसके बनने का सफर….सत्यजीत रे के लिए भी पथेर पांचाली बेहद खास रही….फिल्म बनाने से पहले सत्यजीत रे एक विज्ञापन कंपनी में काम करते थे….लेकिन अंदर के फिल्मकार को कैसे शांत करें….तो उन्होने बीच का रास्ता निकाला….दरअसल फिल्म बनाने के लिए काफी पैसे की जरूरत थी और रे उस वक्त ना तो इतने समृद्ध थे और ना ही इतने स्थाई फिल्ममेकर की कोई उनकी फिल्म में पैसा लगाता….फिल्म की शूटिंग रोज तो होती नहीं थी….तो तब वो नौकरी करते और जब नौकरी से फुर्सत मिलती तब शूटिंग करते…फिर जब पैसे खत्म हो जाते तो शूटिंग रोक दी जाती और पैसे दोबारा जमा होने पर वापस शुरू होती….और इसी तरह चलते रूकते और फिर चलते हुए उनकी पहली फिल्म पथेर पांचाली का काम ढाई साल तक चला….

पथेर पांचाली में अप्पू के किरदार के लिए रे को 6-7 साल के एक लड़के की तलाश थी…काफी खोजबीन के बाद जब उनके मन मुताबिक लड़का नहीं मिला तो उन्होने अखबार में इश्तेहार दिया…लेकिन उससे भी उन्हे कोई खास सफलता नहीं…फिर एक दिन उनकी पत्नी उनसे बोली कि उन्होने पड़ोस में एक लड़का देखा है जो उन्हे अप्पू के किरदार के लिए सही लग रहा है जरा एक बार उससे मिल लो…..और फिर आगे चलकर वहीं लड़का (सुबीर बनर्जी) रे के संसार का अप्पू बना….
अब अगर आपने फिल्म देखी होगी तो आपको वो सीन तो याद जहां अप्पू और दुर्गा पहली बार ट्रेन यानी रेलगाड़ी देखते है….उसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है….दरसल फिल्म के मुताबिक ये काफी बड़ा सीन था और इसे एक ही दिन ने पूरा शूट करना नामुमकिन के समान था….तो पहले दिन जब शूटिंग करनी थी तो जगद्धात्री का त्योहार था…तो उस दिन फिल्म की आधी शूटिंग हुई जिसमें अप्पू के पीछे-पीछे भागते हुए दुर्गा काशफूलों के वन में पहुंचती है….रे ने आधे सीन की शूटिंग की और बाकी शूटिंग बाद में करने के फैसला लेकर वो अपने क्रू के साथ चले गए….फिर जब वो सात दिन बाद वहां सीन का दूसरा हिस्सा शूट करने दोबारा पहुंचे तो वो और पूरा क्रू चौंक गया…..सात दिन के अंदर वहां के जानवरों ने सारे काशफूल खा लिए थे और अब वो जगह बिलकुल पहले जैसी नहीं लग रही थी….अब इस तरह सैकेंड हाफ की शूटिंग करने पर सीन में जरा भी कंटिन्युइटी नहीं लगती….जिसके बाद रे उस बाकी आधे हिस्से की शूटिंग अगले साल शरद ऋतु के वक्त की जब वो वन एक बार फिर से काशफूलों से भर गया…..
इसी सीन को लेकर एक और बेहद रोचक किस्सा है….अच्छा अब जब अप्पू और दुर्गा पहली बार रेलगाड़ी देखते है बेहद खुशी और उत्सुकता से भर जाते है…..ऐसे में सीन में रेलगाड़ी के कई शॉट्स लेने थे जो कि एक रेलगाड़ी से मुमकिन नहीं था…. तो रे और उनकी टीम ने इस शॉट के लिए एक के बाद एक तीन रेलगाड़ियों का इस्तेमाल किया….पहले उन्होने रेलवे के टाइम टेबल से जाना की एक बाद एक कितनी रेलगाड़ियां इस रूट से जाती हैं….और फिर उनकी टीम के एक सदस्य स्टेशन पर मौजूद रहता और जब रेलगाड़ी स्टेशन से निकलती को उसमें चढ़ जाता….जिसके बाद गाड़ी जब शूटिंग की जगह पर पहुंचती तो वो बॉयलर में खूब कोयला डलवाते ताकि काला धुंआ निकले….सफेद काशफूलों के बीच रेलगाड़ी का काला धुआं उस सीन के लिए बेहद जरूरी जो था….हालांकि फिल्म देखने पर लोग ये नहीं समझ पाते की कि इस सीन में एक नहीं बल्कि तीन रेलगाड़ियों का इस्तेमाल हुआ है….
वहीं फिल्म का एक और सीन भी आपको याद होगा…जब बरसात होती है तो दुर्गा अपने भाई के साथ पेड़ के नीचे आसरा लेती है….अब उस वक्त आज के जमाने की तरह कृमित्र बारिश कराने की ना तो टेक्नोलॉजी थी और नहीं उनके पास इतना बजट….तो रे और उनकी टीम रोज बरसात के मौसम में देहात में जाकर इस आस में बैठती की आज बारिश होगी….और अगर उनको आकाश में एक भी काला बादल दिख जाता तो वो बस ये ही प्रार्थना करते कि वो बादल बहुत बड़ा हो जाए और बरसने लगे…..और फिर एक दिन भगवान ने उनकी सुन ली, आसमान में घने काले बादल छा गए और धुंआधार बारिश होने लगी…और रे ने अपने बेहतरीन शॉट लिया….जिसमें दुर्गा बारिश भीगते हुए भाग कर उसी पेड़ के नीचे आती जहां अप्पू ने आसरा लिया हुआ है और फिर दोनों भाई-बहन ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से चिपककर बैठ जाते है…जिस-जिस ने ये फिल्म देखी उन सबको पता है कि ये शॉट कितना शानदार है….
सत्यजीत रे को पथेर पांचाली बनाने में ढाई साल लगे….हालांकि शूटिंग के शुरूआती दौर में उन्हे ये नहीं पता था कि फिल्म पूरी होने में इतना वक्त लग जाएगा…लेकिन जैसे-जैसे वक्त बीतता गया रे को चिंता सताने लगी कि अप्पू और दुर्गा का किरदार निभानेवाले बच्चे अगर ज्यादा बड़े हो गए तो कहीं वो फिल्म में दिखाई ना देने लगे, या फिर इंदिरा ठाकुरन का किरदार निभानेवाली चुन्नीबाला देवी इतने वक्त काम कर पाएंगी या नहीं….हालांकि रे कहते हैं कि ये मेरी खुशकिस्मती है कि उस उम्र में बच्चे जितने बढ़ते है अप्पू और दुर्गा का किरदार निभाने वाले बच्चे उतने नहीं बढ़े….और तो और अस्सी साल की चुन्नीबाला देवी भी ढाई साल तक काम कर पाईं…..
