FilmCity World
सिनेमा की सोच और उसका सच

Today’s Classic : रोजमर्रा जिंदगी में रस खोजती बेहतरीन फिल्म PIKU

PIKU केवल एक  बुजुर्ग को  हुए कब्ज की कहानी भर नहीं। इससे उपजा हास्य- आनंद इस फिल्म का एक अहम पहलू रहा जो साथ आपके घर तक आ जाता है।

0 175

शूजित सरकार की PIKU रोजमर्रा जिंदगी में रस खोजती बेहतरीन फिल्मों मे गिनी जानी चाहिए। इसके किरदार, उनके जज्बात, इंसानी रिश्तों का अनोखापन आपका दिल जीत लेता है। आप बासु दा या ऋषि दा के ज़माने किस्म की  हल्की फुल्की लाईट कामेडी मिस कर रहें तो PIKU देखनी चाहिए।

दिल्ली के चितरंजन पार्क में रहने वाले एक बंगभाषी परिवार के भास्कर बनर्जी उर्फ दादू (अमिताभ बच्चन) और उनकी बेटी PIKU (दीपिका पादुकोण) की यह थोड़ी अलग कहानी है। सत्तर को पा चुके बुजुर्ग भास्कर को कब्ज की शिकायत है। कब्ज दूर करने के लिए कितने उपाय कर चुके, लेकिन मर्ज है कि जाता ही नहीं था ।

अब बुजुर्ग पिता को एक बीमारी हो तो बेटी PIKU संभाल भी ले, लेकिन यहां तो बीमारियों का पूरा पिटारा,एक उम्रदराज आदमी को सेहत लेकर बहुत शिकायतें रहती हैं । हालांकि दादू की मेडिकल रिपोर्ट सामान्य आती थी, लेकिन वो हमेशा  इस डर में हैं कि उन्हें कुछ हो न जाए। शायद एक वृद्ध आदमी जीवन को लेकर बहुत अधिक चिंतित रहने लगता है।

PIKU

रिटायर्ड भास्कर दादू का वक़्त गुजरते देखें तो समझ लेंगे कि उनका ज्यादा वक्त घर में ही गुजरता था। घर पे वो कुछ अजीबोगरीब टॉपिक पर बहस करने में बिजी हो जाते। बाहर में  पास-पड़ोस में रहने वालों के साथ बेवजह की गप। उनकी जिंदगी में डॉक्टर दोस्त एवम सलाहकार श्रीवास्तव का भी अपना मूल्य था।

उम्र के इस पड़ाव पर आदमी चिडचिड़ा भी हो जाया करता है। कब्ज की शिकायत किसी बात को लेकर ज्यादा चिंता लेने से भी होती है। दूसरी वजह बेटी PIKU को लेकर कि वो नहीं होगी तो उनकी देखभाल करेगा कौन? पुरानी बातों  में पुरखों के मकान को लेकर भी भास्कर थोड़े फिक्रमंद थे। उम्र का तकाजा था सो अलग। भास्कर दादू से मिलकर सभी बुजुर्गो का ख़याल आ जाता है, उनकी जिंदगी की तस्वीर को लेकर हम विचार करने लगेंगे। बुजुर्गो के रोज़मर्रा की जिंदगी पर पीकू एक सार्थक कोशिश है। बुढे परेशान की जिन्दगी को किसी फिल्म के बहाने अवगत कराने की अच्छी पहल रही यह फ़िल्म।

तीस पार कर रही PIKU के रिश्ते की जहां-जहां बात चलती है, पिता …यह कहकर उसे रोक देते हैं कि पीकू शादी करके क्या करेगी। आत्म संशय से पीडित बुजुर्ग पिता पीकू की अपनी जिंदगी को नज़र अंदाज़ कर रहें। कह रहें कि शादी के लिए कोई वजह तो होनी चाहिए, जो पीकू पास नहीं है। हमेशा चिडचिड़ा रहने वाले दादू एक दिन कोलकाता जाने की ठान लेते हैं । और वो भी कार से। काफी ना-नुकुर के बाद पीकू को इस सफर के लिए राजी होना पड़ता है।

Piku Promotional

राणा (इरफान) की टैक्सी लेकर दादू,PIKU और उनका सेवक बुधन कोलकाता रवाना होते हैं। यह फ़िल्म का बहुत ही दिलचस्प हिस्सा बन के उभरता है ।कब्ज की शिकायत से परेशान बुजुर्ग भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) अपने भावनात्मक उतार चढ़ाव से जूझता दिखता है। अपने घर के जुदा होने के गम में भास्कर दोबारा अपने घर जाना चाहते हैं, जहां उनका बचपन गुजरा था।

ऐसे में दिल्ली से कोलकाता सड़क मार्ग से जाने के दौरान उन्हें अलग  मुश्किलों से दो चार होना पड़ता है। टैक्सी सर्विस का मालिक राणा चौधरी (इरफान खान) चिड़चिड़े बनर्जी की सनक से झुंझला उठता है, लेकिन विकल्प नहीं होने पर इन दोनों को खुद ही कोलकाता ले जाने का फैसला करता है। सफर के दौरान भास्कर दादू के मर्ज का भी इलाज करता है।

बेटी PIKU  की  दुनिया अपने पिता के आस-पास घूमती है क्योंकि पिता को ना सिर्फ़ क़ब्ज़ की शिकायत है बल्कि वो हमेशा सिर्फ इसी के बारे में बात करते हैं। सुबह का नाश्ता हो या फिर डिनर टेबल, बातचीत का  विषय हमेशा पेट, क़ब्ज़ और मोशन ही था। रिटायर्ड भास्कर दादू के वक़्त को गुजरते देखें तो समझ लेंगे कि उनका ज्यादा वक्त घर में ही गुजरता था। घर पे वो कुछ अजीबोगरीब टॉपिक पर बहस करने में बिजी हो जाते। बाहर में पास-पड़ोस में रहने वालों के साथ बेवजह की गप। उनकी जिंदगी में डॉक्टर दोस्त और सलाहकार श्रीवास्तव का भी अपना मूल्य था।

शूजित सरकार की फिल्म PIKU  आपको पसंद आएगी । वजह है सहज हास्य, जो बिना किसी सतहीपन के लगभग हर सीन में दिखता है। हालात से बने हास्य में हमारी-आपकी  रोजमर्रा की जिंदगी से प्रेरित है, बनावटीपन की गुंजाइश न के बराबर रखी गयी । एक बुजुर्ग की  जिंदगी और उसे होने वाले कब्ज में किसी को क्या दिलचस्पी होगी! लेकिन फ़िल्म का सफ़ल होना यह  कह रहा कि बड़े-बुढ़े के मर्जों को लेकर हम फिक्र करते हैं। बुजुर्ग भास्कर के स्थान यदि कोई दूसरा रहा होता फिर भी कहानी मे हमारी रुचि वही होती।

PIKU यह भी देखाती है कि एक लड़की किस तरह अपने पिता की सेवा करती है। वह खुशी से जी रही है।क्या भास्कर दादू का बेटा वो कर सकता? पीकू को जीवन से कोई शिकायत नहीं और ऐसा भी नहीं कि आज की स्थिति को उसने नियति मान लिया है।

PIKU  सरीखी फिल्मों को देखकर ऋषिकेश मुखर्जी का याद आना स्वभाविक होगा । ऋषि दा की फिल्मों की तरह ये फिल्म ऊपर से सरल  है। लेकिन इसमें इंसानी रिश्तों में लिपटी हुई परतो को जूही चतुर्वेदी और शूजित सरकार ने बंगाली परिवार सेटअप एवं  उसके मुखिया भास्कर बनर्जी संदर्भ में तलाश किया । रोज़मर्रा के जीवन में रस की यहां तलाश मिलती है।

ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों इस तरह के रोल करने में उत्पल दत्त को महारत हासिल थी लेकिन अमिताभ बच्चन ने इसे अपना आयाम देने की कोशिश की । बेशक आप उत्पल दा के कामेडी की तुलना उनसे नहीं करे। बुजुर्ग भास्कर महिलाओं को लेकर एक अलग और बेहतर नज़रिया रखता है। लेकिन अखबार में पुराने टेलीग्राफ़ को ही पढता है। एक टिपिकल बंगाली बुज़ुर्ग इस किरदार की तरह ही होता है।

Irfan & deepika

फिल्म PIKU  केवल एक  बुजुर्ग को  हुए कब्ज की कहानी भर नहीं। इससे उपजा हास्य- आनंद इस फिल्म का एक अहम पहलू रहा जो साथ आपके घर तक आ जाता है। हम जानते कि यह केवल भास्कर बनर्जी की कहानी होती, तो शायद महत्व नही देते..लेकिन यह किसी भी परेशान उम्रदराज इंसान की कहानी हो सकती है। पेट की शिकायत एक आम शिकायत है।

कब्ज़ियत जैसे निजी मसले किसी भी फिल्म का हिस्सा हों, ऐसा कम होता है। इस तरह की कामेडी अक्सर सतही की तरफ़ मुड़ जाया करती है। लेकिन PIKU  में  सस्ता हास्य नहीं।साइकिल पर कलकत्ता घूमते हुए भास्कर दादू का चेहरा ही देखें।एक गम्भीर कथन मे उस किस्म के आव-भाव मुम्किन नही हो पाते । अमिताभ ने भावों को मुख पर बेहतर ढंग से लाया । वो हर सीन में बुजुर्ग भास्कर लगे हैं।

Mirzapur को क्या ऐसी बारीकी से देखा आपने ?

Leave A Reply

Your email address will not be published.