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Movie Review : नेटफ्लिक्स की फिल्म ‘रात अकेली है’ की खास बातों की गिनती नहीं

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रात अकेली है जिसे डायरेक्ट किया है फर्स्ट टाइम डायरेक्टर हनी त्रेहन ने..वो इससे पहले फिल्मों की कास्टिंग का काम करते थे..तो सबसे पहले फटाफट से जान लेते हैं कि फिल्म में मुझे अच्छा क्या लगा..

– फिल्म की कहानी मुझे बहुत पंसद आई
– फिल्म का सस्पेंस बहुत शानदार है
– सारे एक्टरों का काम बेहतरीन है
– फिल्म के डायलॉग्स बहुत जबरदस्त हैं
– इसे फिल्माया बहुत शानदार है

अब बात कि मुझे इस फिल्म की कौन सी बात खटकी

– क्लाईमैक्स सीन कमजोर है
– बैकग्राउंड म्यूजिक बढ़िया नहीं है

तो ये रही बात उन प्वाइंट्स की जिनपर मैने फिल्म को परखा..चलिए अब विस्तार से फिल्म पर बात करते हैं..एक अमीर घर का मुखिया अपनी दूसरी शादी के जश्न की रात घर में ही मरा मिलता है..पहली पत्नी कुछ साल पहले रहस्यमय हालात में मारी गई थी..अब इस केस को सुलझाने का जिम्मा मिला है जटिल यादव यानि नवाजुद्दीन सिद्दीकी को..वहीं दूसरी तरफ नवाज अपनी निजी जिंदगी में शादी न होने से परेशान है..मां इला अरुण के साथ उसकी इस बात पर हर रोज बहस होती रहती है..फिल्म में इन दोनों का रिश्ता और सीन बहुत ही शानदार लिखे गए हैं..इस हाइप्रोफाइल केस में लोकल विधायक से लेकर पुलिस के आला अधिकारी सभी दिलचस्पी ले रहे हैं..जटिल पर दबाव है लेकिन वो इस केस को सुलझाने में जी जान लगा देता है..और आखिर में जो पर्दाफाश होता है उसका अंदाजा दर्शक दूर दूर तक नहीं लगा पाएंगे…फिल्म की कहानी धीमे धीमे रंग में आता है और यही इस थ्रिलर की खासियत है..राइटर स्मिता सिह और डायरेक्टर हनी त्रेहन बहुत ढंग से फिल्म को गढ़ते हैं..इस रंग में कमाल करती है तुम्बाड शूट करने वाले पंकज सिंह की सिनेमैटाग्राफी और दिग्गज श्रीकर प्रसाद की एडिटिंग..

बहुत वक्त बाद एक ऐसी फिल्म देखने को मिली है जिसमें हर कलाकार का बेहतर इस्तेमाल हुआ है…नवाजुद्दीन सिद्दीकी पूरे रंग में नजर आएं है…मैं रईसे के समय से ये सोच रखता था कि एक रौबदार पुलिसवाले की फुल फ्लेज भूमिका नवाज के लिए कोई लिख दे तो मजा आ जाए…बतौर दर्शक अपने प्रिय कलाकारों के प्रति आपकी ये भूख होती है..मेरी ये भूख नवाज को बतौर इंस्पेक्टर जटिल यादव देख मिटी है..इस किरदार में नवाज अलग तरह का फ्लेवर लाते हैं..सबसे खास बात कि वो वेबवजह का लोकल डायलेक्ट लाने की कोशिश नहीं करते..मैं हमेशा कहता हूं 70 के दशक में अमिताभ बच्चन की आंखों में अंगार दिखता था वो अंगार या यूं कहूं उससे भी बेहतर इंटेसिटी नवाजुद्दीन की आंखों की अदाकारी में है….वहीं राधिका आप्टे ने एक बार फिर राधा के किरदार में जान डाल दी है..बाकी के रोल में आदित्य श्रीवास्तव मुझे बहुत जमे.न जाने क्यों उनके लिए बड़े रोल क्यों नहीं लिखे जा रहे..उनका स्क्रीन प्रजेंस दमदार है.., तिग्मांशु धूलिया, शिवानी रघुवंशी, श्वेता त्रिपाठी, निशांत दहिया और बाकी के किरदार बहुत बेहतरीन रहे हैं..एक लाइन में कहूं तो ये मूड फ्रेश कर देने वाली फिल्म है..मजा आ जाता है..फिल्म को मेरी तरफ से 5 में से 4 स्टार्स..देखिए और अपनी भी राय दीजिए.

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