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Exclusive : रॉकस्टार के गाने लिखने वाले Irshad Kamil के गीतों के पीछे की कहानी

Irshad Kamil जिन्होने रॉकस्टार, तमाशा और हालिया में फिल्म जीरो के गाने लिखे हैं उनके गीतों की पीछे की कहानी लेकर आये हैं वो खुद …

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‘सजना वे सजना’ एक मस्तीभरा खुशगवार गीत है लेकिन इस गीत के साथ एक उदासी भी जुडी हुई है। क्या है वो कहानी बता रहे हैं ख़ुद Irshad Kamil 

शाम उदास नहीं थी बल्कि शांत और सुकून भरी थी.. मैं सन्देश के नए खरीदे फ्लैट के तख्तपोश पर बहुत आत्मविश्वास के साथ बैठा उसका इंतज़ार कर था। मेरी और उसकी दोस्ती काफी गाढ़ी हो गयी थी अबतक। सन्देश के आने से पहले चाय आ गयी गरमागरम। चाय हर बार मिलती थी उसके यहाँ लेकिन इस बार मेरे आत्मविश्वास ने इसे थोड़ा और स्वाद कर दिया था। आखिरी घूँट हलक से नीचे उतरने से पहले वो आया और आते ही इंतज़ार करवाने के लिए माफ़ी मांगने लगा। मैंने उसकी माफ़ी की ओर ध्यान दिए बिना कहा,’सजना वे सजना’ का कुछ बना है।

Irshad Kamil Lyricist

  ‘सजना वे सजना’ इस गाने का नाम लिखे जाने से पहले ही सन्देश ने तय कर दिया था क्योंकि धुन सुनाते हुए वो अक्सर ‘ल लाला लाला ल सजना वे सजना’ कहता था। सन्देश के डम्मी बोल (वो बेसिर-पैर के बोल जो धुन बनाने या समझाने के लिए ज़्यादातर संगीतकार धुन में डालते हैं।) अक्सर पंजाबी से प्रभावित होते हैं हालाँकि पत्नी पंजाबी होने के अलावा उसका पंजाब से सम्बन्ध कोई नहीं। शायद पंजाबी शब्दों की ध्वनियां अच्छी लगती हैं उसे। 

सन्देश ने उत्सुकता में बैठते ही “इरशाद” कहा और मैंने 1993 की बलबीर डिस्टिल्लरी की डायरी, जो मेरे छोटे मामा ने मुझे दी थी, खोली और पूरा गीत सुना डाला। अन्तरे सुनकर तो वो झूम ही गया, मुखड़े का क्रॉस ‘ले तेरी हो गयी यार’ भी उसे बहुत पसंद आया लेकिन पहली दो पंक्त्तियां ‘बेकार’ । ‘तेरे प्यार में तपी तंदूर हुई, फिर कहने को मजबूर हुई, ले तेरी हो गयी यार सजना वे सजना’ । बात सही थी उसकी, गाना डांस बार में था, मस्ती भरा था लेकिन तंदूर कैसे ले आया मैं शुरू में? मैंने कुछ और विकल्प दिये थे जैसे “तन तार-तार मन चाक हुआ / पर प्यार में तन मन पाक हुआ / ले तेरी हो गयी…” पर उसे एक भी अच्छा नहीं लगा। खैर उस दिन मैं जल्दी में था तो कुछ नया सोचता हूँ कहकर निकल गया सन्देश के भरोसे कि वो शाम को प्रोडूसर को कुछ भी सुना कर गाना पास करवा लेगा क्योंकि मैं जानता था धुन बहुत गाढ़ी है और सन्देश का आत्मविश्वास आसमान पर । 

शाम को फ़ोन आया सन्देश का कि प्रोडूसर से मीटिंग नहीं हो पायी, फिल्म के निर्देशक अनंत बलानी नहीं रहे। रवीना टंडन के साथ ‘पत्थर के फूल’ के बाद, टीवी में संघर्ष करने के बाद अब फिल्म बनाने का मौका मिला था लेकिन स्टूडियो से घर जाते हुए ऑटो में ही दिल का दौरा पड़ गया था उन्हें। स्क्रिप्ट खुद उन्होंने लिखी थी, पूरी। कुछ दिन शूटिंग भी कर चुके थे। लेकिन बाद में फिल्म सुधीर मिश्रा ने संभाल ली। फिल्म के शुरू में अनंत बलानी को ऑरिजिनल कॉन्सेप्ट के अलावा कोई ज़्यादा क्रेडिट नहीं मिला ।

मुंबई में क्रेडिट्स को लेकर कैसे कैसे घपले हो सकते हैं। कैसे आपका हक़ मारा जा सकता है। कैसे आपको इस्तेमाल करके छोड़ा जा सकता है। पहली बार ‘चमेली’  फिल्म ने ही एहसास करवाया कि गला काट प्रतियोगिता किसे कहते हैं? इस फिल्म में शुरू के क्रेडिट्स में मेरा भी बतौर गीतकार नाम नहीं है। इसकी वजह से निर्माता और मुझमें बहुत झगड़ा हुआ, इसी झगडे की वजह से पहली बार मेरी मुंबई के टाइम्स ऑफ इंडिया में फोटो छपी थी। 

हर शायर वाह-वाही का भूखा होता है, सो मैं भी था। और उस दिन ग़लती से सबसे ज़्यादा दाद लिखी भी मेरे ही हिस्से में थी। चंडीगढ़ के 15 सेक्टर का लाजपत राय भवन था और हरियाणा उर्दू अकादमी ने मुशायरा मुनक्किद करवाया था। ये मेरे मुंबई आने के कुछ ही समय पहले की बात है। जो मैं बतौर शायर ग़ज़ल पढ़ रहा था वो असल में उन दिनों की मेरे अंदर की बेतरतीब सी खीझ, उठा-पटक और ख़ुद – एत्मादी यानि आत्मविश्वास को बयां कर रही थी।

एक दिन अचानक मुझे असीम भाई का फ़ोन आया कि घर आइये आपसे कुछ बात करनी है। मैं, लीना और असीम के घर गया तो मुझे लीना ने एक गाना सुनाया ‘खोया खोया’ और पूछा कैसा है। मुझे गाना बहुत अच्छा लगा। सुनाने के बाद उसने कहा मुझे इसमें लिखना है। यानि ये गीत उसकी फिल्म ‘शब्द’ का था और अब इसका संगीत विशाल और शेखर दे रहे थे। मैंने गीत सुनने के बाद लीना से कहा, ‘ये तो बहुत अच्छा लिखा हुआ गीत है इसमें क्या लिखना है।  लीना बोली, ‘इरशाद भाई गीत विशाल ने लिखा है आपको इसके बीच बीच में थोड़ी पोएट्री  लिखनी है। मैं थोड़ी देर के लिए सोच में पड़ गया, वो समझ गयी कि मैं क्या सोच रहा हूँ। वो बोली, ‘इस फिल्म के साथ जुड़ने वाले लोगों में कई उतार-चढ़ाव हो गए आप चाहें तो सन्देश से पूछ लें। मैंने सन्देश से बात की एक पल शायद सन्देश को भी बुरा लगा फिर उसने कहा, ‘इरशाद तुम करो यार फिल्म, इस इन्डस्ट्री में ज़्यादा भावुक होकर नहीं चलती ज़िन्दगी। …लीना और असीम अच्छे इंसान भी हैं और दोस्त भी, हम सबको एक दूसरे का साथ चाहिये। …मेरे हिस्से में ये नहीं तो कोई और फ़िल्म आ जाएगी। सन्देश एक सच्चा दोस्त है और उसने मुझे हमेशा सही रास्ता दिखाने  और सही बात समझाने की कोशिश की है। मैंने उसकी बात मानते हुये ‘शब्द’ शुरू कर दी। यह मेरे जीवन की पहली और शायद आख़िरी फिल्म है जिसमें माँगने पर भी निर्माता ने मुझे एक पैसा नहीं दिया था, और यह वही लोग थे जिन्होंने चमेली बनायी थी। ख़ैर, ‘खोया खोया’ गीत संगीतकार विशाल ददलानी का लिखा हुआ है और बीच बीच की पोएट्री मेरी है। 

न संघर्ष अभी खत्म हुआ था, न कोई सपना टूटा था और न ही कोई इच्छा मरी थी। कभी ज़िन्दगी का काम चल रहा था और कभी ज़िन्दगी में थोड़ा बहुत काम चल रहा था। ले-देकर मेरी ताक़त सिर्फ वो तारीफें ही थीं जो कभी कभार लोग मेरे काम की कर दिया करते थे। अपने जैसे ही कुछ लोग इधर उधर दिखाई दे जाते या मिल जाते तो ताक़त और उम्मीद थोड़ी और बढ़ जाती। 

ये मुझे जुहू-वर्सोवा लिंक रोड पर मिला था, वहीँ था उसका दफ़्तर, जिसके टॉयलेट के दरवाज़े पर लिखा था ‘हेयर क्रिएटिविटी फ़्लोज़।’ जी हाँ, बहुत प्रभावित हो गया था मैं उससे, दिखने में काफी खूबसूरत, बात चीत में बेहद मीठा। माँ-बाप दोनों डॉक्टर थे और उन्होंने अपना प्राइवेट क्लिनिक गिरवी रख कर पैसा दिया था शायद बेटे को फिल्म बनाने के लिये। यही बताया था उस समय ‘गफ्ला’ के लेखक-निर्देशक समीर हनचाटे ने। एक किरदार भी निभाया था उसने फिल्म में। फिल्म बाफ्टा में चुनी भी गयी थी लेकिन बॉक्स ऑफिस पर चली नहीं। समीर से मिलने के बाद उसकी ईमानदार कोशिश को देखते हुए मुझे लगा कि इस इंसान की फिल्म ज़रूर करनी चाहिए, बिना किसी  उम्मीद के। कार्तिक शाह का इस फिल्म में संगीत था और सिर्फ दो गाने ही थे । दो गाने होने के कारण कोई सी डी या कैसेट भी नहीं निकल पाया इस फिल्म का और लोगों तक भी ज़्यादा इस फिल्म का संगीत पहुंचा नहीं। पर इन दो गानों में मुझे ऐसा लगता है कि ज़िन्दगी के कुछ एहम मुद्दे उठते हैं, कई सवाल खड़े होते हैं। मुझे अफ़सोस है कि समीर ने अभी तक अपनी अगली फिल्म नहीं बनाई, उस जैसे ईमानदार तकनीशियनों की इस फिल्म इंडस्ट्री को बहुत ज़रुरत है और शायद हमेशा रहेगी। 

आपके लिहाज़ से जो काफी कुछ होता है कई बार वो काफी नहीं होता। यूँ तो मैं काफी कुछ कर चुका था लेकिन वो काफी नहीं था, वो जो एक ज़बरदस्त हिट होता है फ़िल्मी दुनिया की नज़र में, वो कई बार अच्छे काम से बहुत ज़्यादा ज़रूरी होता है। और ये ‘ज़बरदस्त हिट’ इतना मर्ज़ी का मालिक होता है कि कई बार पहले ही झटके में आ जाता है और कई बार सारी उम्र कलाकार इसकी उम्मीद में बैठा रहता है। सफर जितना लम्बा हो, इरादा उतना मजबूत होना चाहिए और मंज़िल की उम्मीद उससे भी पुख़्ता। इस तरह के फ़लसफ़े हमेशा बाद में समझ आते हैं। उस समय आप लगे रहते हो अपनी धुन में। 

ये सफ़र एक ख़्वाब का सफ़र था। और इस सफ़र के बाद मुझे ये समझ में आया कि ख़्वाब देखना जितना ज़रूरी है उन्हें पूरा करने की कोशिश करना उससे भी ज़्यादा ज़रूरी। ये भी सच है कि वक़्त, उम्र और समझ के साथ ख़्वाब और सफ़र बदलते रहते हैं। इस फिल्म के अंत में यही होता है जय अपनी मंज़िल पा लेता है लेकिन अपनी मंज़िल पाने के बाद उसे लगता है कि शायद उसे ये नहीं चाहिए था। कुछ और था… इससे भी ज़्यादा कुछ और।

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