REPORTER : Arjun फिल्म पानीपत में अपने बाल शेव करवाए हैं कि कुछ और तरीका अपनाया है ?
अर्जुन कपूर- पिछले साल १६ नवंबर को मैने अपने बाल शेव किये थे.. हमने लुक टेस्ट किा था एक बार बाल्ड पैच के साथ भी ये देखने के लिए कैसे लगते हैं.. हालाँकि मैंने 16 नवंबर पूरे बाल शेव कर लिये थे। हमने शूटिंग पूरी तरीक़े से जनवरी में स्टार्ट की ..तब मुझे कैप पहनना पड़ा था इसलिए कि बाहर मीडिया आप लोग न देख पाएं..आपने देखा होगा कि बहुत सारी फ़ोटो में कैप पहना है मैने.. सबको आदत हो गई होगी अजीब तरह की टोपी पहन रहा था ..ऐसा नहीं है कि मुझे कैप पसंद नहीं लेकिन मुझे अपना लुक छुपाना था।
REPORTER-.ऐक्शन सीन कैसे थे आपके लिए बाकी फिल्मों के मुकाबले अगर देखें ?
अर्जुन – ये आपको स्टंटमैन से पूछना चाहिए वो सब बहुत कमाल के थे.. हम तो कभी कभार अपनी वैनिटी वैन में जाकर आराम कर सकते थे, सेट पर भी हमें चेयर मिल जाती थी बैठने के लिए। मगर वो वहाँ सौ लोग थे जो हमारे लिए थे कि हम अच्छे स्टंट कर सकें।जब भी फाइटर्स गिरते थे वो आराम नहीं करते..वो लोग फिर से उठकर रिहर्सल करते.. उनको गिरना था. मारना था. जीतना था सिर्फ मेरे लिए..हमारे लिए वो ये सब कर रहे थे।मैंने जो आर्मर पहना हुआ था वो 80-90 किलो का था.. जैसा कि आप पोस्टर में देख सकते हैं..उसके साथ बाकी अस्त्र शस्त्र साथ में इसे लेकर घुड़सवारी करना.. कलाइमैक्स मैंने शूट किया था लेकिन सच बताउं तो थोड़ा मुश्किल था क्योंकि वेदर अच्छा नहीं था क्योंकि मुझे वो बख्तरबंद पहनाने के लिए चार आदमी लगते थे और मैं बैठ नहीं सकता था पूरा मैटल था इसलिएऔर हमने शूटिंग बाहर की थी। तो उस समय वो थोड़ा डिफिकल्ट था फिर घोड़े के साथ भाला पकड़ना बहुत मुश्किल थाऔर घोड़े के ऊपर बैठ के फ़ाइट करना भी थोड़ा मुश्किल होता था और मैं रोज़ सुबह वहाँ महालक्ष्मी रेसकोर्स जाता था सीखने के लिए। अगर आपको बहुत सुंदर सनराइज़ देखना है मुंबई में महालक्ष्मी रेसकोर्स में वॉक करने चले जाना सुबह ,बहुत ख़ूबसूरत नज़ारा होता है। दो महीना घोड़ा चलाना सीखा था। मुझे नहीं पता था मुझे पानीपत के लिए ये सीखना पड़ेगा । बहुत कुछ नया सीख कर निकला हूं मैं इस फिल्म से।

Reporter – कितनी रिसर्च करनी पड़ी आपको इस मूवी के लिए?
अर्जुन- आप आशु सर से मिले हों तो आपको पता चलेगा कि वो ख़ुद इनसाइक्लोपीडिया हैं वो इतिहास के बारे में..बहुत निश्चित हैं अपनी कहानी में वो..एक तो वो भी महाराष्ट्रीयन हैं। उनसे मैने ये सीखा है कि लोग चाहते है कि ऐसी कहानी आए क्योंकि ऐतिहासिक कहानियां लोगों को टूटी फूटी तरीक़े से पता हैं.. अंत पता है, शुरुआत भी पता लेकिन बीच में क्या क्या हुआ नही जानते।ये एक बड़ी कहानी है, बहुत से किरदार हैं..अगर आप गाने भी देखेंगे तो उसमें मल्हार राव, नाना फड़नविस और बहुत सारे किरदार थे और विश्वास राव जो नाना साहब पेशवा के बेटे थे..मुझे इन सारी बातों की रिसर्च आशु सर से मिली थी । अगर मैं कहानी खोल के पढ़ना शुरू करता तो मेरे पास इतने सवाल आते थे और सारे जवाब देते देते अगर आशु सर तो फ़िल्म नहीं बनती।उन्होंने समेटकर एक कहानी बनायी ताकि लोग इसमें दिलचस्पी ले सकें। हमें ऐसे लोगों की बात कर रहे हैं जो पहले जीवित थे जिन्होंने भारत के लिए लड़ाई लड़ी..
रिपोर्टर – लेकिन फिल्म पर खासकर आप पर बन रहे है मीम्स और ट्रोल को कैसे हैंडल कर रहे हैं आप ?
Arjun- आज के समय में सब ट्रोल होते हैं सबके लिए आज कल आसान हो गया है कि वो नेगेटिव हो जाए । मैं हमेशा बोलता हूं मेरा मज़ाक उड़ा लो मैं कौन हूं.. मैं आज हूँ कल नहीं रहूंगा अगर आप इस मूवी का मज़ाक उड़ा रहे हो ना मतलब आप उनका मज़ाक उड़ा रहे हो जिन्होंने देश के लिए जान दी।मैने कभी नहीं देखा कि लोग भगत सिंह का मज़ाक उड़ा रहे हों या सुभाष चंद्र बोस के उपर मीम बना रहे हो पर मैं देख रहा हूं कि सदाशिव भाऊ राव जी के लोग मजाक बना रहे हैं और कोई कुछ बोल भी नही रहा है। वो भी इतना ही मायने रखते हैं अपने भारत के लिए मगर मेरा काम नहीं है लोगों को बोलना या जो मीम बनाते हैं उनको कुछ कहना..मगर अफ़सोस की बात है ये जो भी हो रहा है।
रिपोर्टर – अर्जुन आपको नहीं लगता पानीपत जैसी बड़ी फ़िल्म को सोलो रिलीज़ मिलनी चाहिए थी?
अर्जुन –डेट मेरी ख़ुद की तो है नहीं ऐसा नहीं है कि पहले एक साथ और मूवी नहीं आई हैं..आ चुकी है मुझे याद है रेड,हिचकी और बागी तीनों एक के बात एक दिन परदे पर आयीं.. तीनों ही फिल्में बहुत अच्छी गईं। तो इस बात का कोई मतलब नही है।
