Gunjan Saxena The Kargil Girl : जो जैसी थी उसे वैसा नहीं दिखाया
गुंजन सक्सेना: फैक्ट जो भी हो, फिल्म बॉलीवुड के हिसाब से ही बनेगी!
Gunjan Saxena फिल्म को लेकर बहुत सी बातें हैं जो जागरुक दर्शक को जाननी चाहिएं. फिल्म अच्छी बनी है या नहीं इनबातों को कई और पैमाने पर परखा है आशुतोष ने.
Gunjan Saxene – Fact Check
बॉलीवुड में आज के दौर में बॉयोग्राफी काफी हिट हैं…. मुझे हॉलीवुड की एक बॉयोपिक फिल्म ‘अमेरिकन स्नाइपर’ याद आती है…जिसमें ब्रैडली कूपर ने क्रिस काइल का किरदार निभाया था…जब ब्रैडली कूपर क्रिस काइल के पिता से मिलने गए तो उन्होंने ब्रैडली कूपर से कहा कि ‘तुम मेरे बेटे का किरदार निभाने के लिए सही नहीं हो…मेरा बेटा बॉडी में तुमसे डबल था’…इस घटना के बाद ब्रैडली कूपर ने अपना वजन बढ़ाया और फिर जाकर फिल्म की शुटिंग शुरु की……लेकिन बॉलीवुड में ऐसा नहीं है…मैरीकॉम के लिए प्रियंका चोपड़ा हैं…तो गुंजन सक्सेना के लिए जान्हवी कपूर हैं…फिर फिल्म के प्लॉट में मसाले के लिए बदलाव तो कर ही सकते हैं…..करगिल गर्ल देखने के बाद मैंने क्या महसूस किया वो आपको अब मैं आगे बताने की कोशिश करुंगा.
आज भी हम अक्सर अपने आस-पास सुनते हैं…’क्या लड़कियों तरह रो रहा है’…पर असल में ये एक तरह का भाव है जो लड़कियों में ज्यादा होता है….ये भाव होना कमजोरी नहीं है…रोते तो लड़के भी हैं….फिल्म गुंजन सक्सेना द करगिल गर्ल में रोती हुई लड़की के सामने रुमाल फेंकते हुए दिखाना वाकई एक इमोशन का मजाक उड़ाना है…..खैर…
फिल्म गुंजन सक्सेना द करगिल गर्ल देखने के बाद उसे तीन अलग-अलग हिस्सों में समझना होगा…पहला हिस्सा जहां गुंजन सक्सेना की पायलट बनने की जिद है…दूसरा हिस्सा जहां वो अपने सपने को पूरा कर लेती हैं लेकिन उसकी खुशी से दूर हो जाती हैं, और तीसरा हिस्सा, जहां गुंजन सक्सेना द करगिल गर्ल की कहानी को नायिका एक सुकून भरा अंत देती है…

सबसे पहले बात फिल्म की शुरुआत की…एक 12 या 13 साल का लड़का अपनी बहन के सपने का मजाक उड़ाता है और उसके हाथ में सब्जी का डोंगा देकर खाना परोसने की एक्टिंग करता है….सवाल ये उठता है कि क्या वाकई एक परिवार में इस तरह का बर्ताव लड़के करते हैं ? गुंजन के पिता आर्मी ऑफीसर हैं…कर्नल हैं और उन्हें ये पता है कि प्लेन लड़का उड़ाए या लड़की फर्क नहीं पड़ता….गुंजन को उनके पिता आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं और वो एयरफोर्स में सलेक्ट हो जाती है….
फिल्म के इस दूसरे हिस्से को देखकर लगता है कि वाकई में बेवजह की ‘मर्दवादी’ बातें हो रही हैं…..एयरफोर्स के अधिकारियों की छवि एक जेंटलमैन ऑफिसर की बजाय सड़कछाप टपोरी की तरह दिखाई गई है…वो बेवजह पंजा लड़ा रहे हैं…कमरों में अश्लील पोस्टर हैं…यूनिफॉर्म की इज्जत नहीं है…और रैंक का ख्याल नहीं…यहां आपके लिए एक बात जानना जरूरी है…फौज में जो भी अफसर हो चाहे सीनियर हो या जूनियर हर महिला से मैम कहकर बात करता है…ऐसे में फिल्म में दिखाए गए फौजी अफसर एक लड़की को ऐसे घूरते हुए दिखाए गए हैं जैसे 90 के दशक की फिल्मों में कॉलेज के एंट्री सीन में हिरोइन के आगे पीछे चलने वाले मनचले एक दूसरे को देखकर कुटिल मुस्कान में सब कुछ कह जाते हों….हद तो तब हो गई जब ऑफिसर गुंजन सक्सेना कॉरिडोर में आगे बढ़ती हैं तो सार्जंट रैंक एयरफोर्स कर्मी उन्हें सल्यूट ना करके सिर्फ घूरते रहते हैं….मेरी करन जौहर को एक सलाह है…..हर फिल्म के किरदार स्टूडेंट्स ऑफ द ईयर की तरह नहीं होते….उन्हें सेना और सेना की नैतिकता, आदर्श और बहादुरी की रत्ती भर भी समझ नहीं है….

ये अभी खत्म नहीं हुआ है…अभी आगे की कहानी को समझिए…फिल्म के एक सीन में बीच ब्रीफिंग से गुंजन सक्सेना को हटा देना और फिर ये बताना कि वो पंजा लड़ाने में कमजोर में हैं इसलिए वो ब्रीफिंग नहीं कर सकती हैं…और वो फौज में सर्विस के काबिल नहीं है…वाह…मतलब क्या नरेटिव गढ़ा गया है….अगर ऐसा ही था तो SSB के इंटरव्यू में पंजा ही गुंजन सक्सेना से लड़वा लेते जो…सलेक्शन में इतना ड्रामा क्यों करते…पर अपना नरेटिव सेट करने के लिए कुछ तो करना ही होगा…
आइए और आगे बढ़ते हैं….गुंजन सक्सेना के साथ कोई शॉर्टी (उड़ान या उड़ान की ट्रेनिंग) पर नहीं जाना चाहता…क्योंकि फिल्म में दिखाए गए एयरफोर्स के अफसरों को लगता है कि गुंजन सक्सेना कहीं पैर लगाकर स्कूटी की तरह हेलीकॉप्टर का भी ब्रेक ना लगा दें…हां सच में ऐसा ही लग रहा था….
आगे पढ़िए…कॉरिडोर में दो एयरमैन जाते हैं तो गुंजन को देखकर मुड़ जाते हैं…कि कहीं सल्यूट ना करना पड़ जाए…एक लड़की को सल्यूट…पर शायद डायरेक्टर सरन शर्मा को ये नहीं पता कि फौज में रैंक को सल्यूट किया जाता है…किसी इंसान को नहीं…(सौ-बैंड ऑफ ब्रदर्स)।

फिल्म के आखिरी हिस्से में भी गुंजन सक्सेना को एयरफोर्स के एक ऑप्शनल पायलट के रुप में दिखाया जाता है…जो कहानी का अंत एक सुपरहीरो की तरह करती है…कहानी खत्म…मेरे भारत की बेटी गाना बजता है और क्रेडिट्स शुरु…
कुछ बातें जो समझनी बेहद जरूरी है…वो ये कि आप अपने समाज में जिन बराबरी के अधिकार को लेकर लड़ते हैं भारतीय सेना उन अधिकारों के साथ बहुत पहले से जी रही है….सही अर्थों में सेक्युलरिज्म देखना हो तो भारतीय सेना इसका सबसे सटीक उदाहरण है….हां हो सकता है कि फौज में शुरुआत में लड़कियों को लेकर झिझक रही हो लेकिन उसे ऐसे दिखाना कि सभी उस झिझक में शामिल हैं…ये बिल्कुल गलत है…बेहद सतही सोच है…
फिल्म के प्लॉट पर बात करें तो बड़ी गलतियां हैं…सबसे बड़ी गलती कि अकेली गुंजन सक्सेना युद्ध में जाने वाली पहली महिला पायलट नहीं थीं…उनके साथ श्रीविद्या राजन भी थीं…लेकिन फिल्म करन जौहर की थी तो ‘ट्रू स्टोरी’ भी बदल दी…अगली बात…फौजी शराब पीते हैं और जमकर पीते हैं लेकिन वो कभी ऐसा बर्ताव नहीं करते जैसा फिल्म में दिखाया गया है…कि कोई लेडी ऑफिसर आ जाए तो उसे छोड़कर सब अलग हो जाएं….फौज भेद करना नहीं सिखाती है…अगर कोई भाषा, लिंग जाति धर्म के आधार पर भेद करता है तो उसे उसी वक्त उसका सबक दिया जाता है…ना कि भेदभाव में सभी शामिल हो जाते हैं…जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है….

गुंजन के पिता भी फौज में कर्नल थे अगर लिंग के आधार पर भेद भाव रखते तो गुंजन को बचपन में ही डांट डपट कर कुछ और करने को कहते…लेकिन उन्होंने तो ऐसा नहीं किया…यहां ये पानी की तरह साफ था कि फिल्म में लिंग आधारित भेदभाव सिर्फ एक मसाले के तरह उपयोग में लाया गया है और कुछ भी नहीं है….वैसे आपको बता दें कि इस फिल्म को लेकर एयरफोर्स ने CBFC को एक पत्र लिखा है और साफ कहा है कि फिल्म में जो छवि सेना की दिखाई गई है वो बिल्कुल गलत है….
फिल्म के अंत में गुंजन सक्सेना की एक क्लिप दिखाते हैं जिसमें वो चीता हेलीकॉप्टर उड़ाने से पहले कुछ दस्तावेजों पर दस्तखत करती दिखती हैं…उनके साथ जो लोग हैं उनके चेहरों को जरा ध्यान से देखिए..उनके चेहरों पर आपको गर्व दिखेगा…खुशी दिखेगी लेकिन झिझक नहीं….
एक बेहद जरूरी बात…आज की जेनरेशन के ज्यादातर युवा किताबों और फैक्ट से दूर हैं…उन्हें वही सही लगता है जो वो फिल्म में देखते हैं…ऐसे में सेना की छवि को इस तरह से धूमिल करते हुए फिल्म बनाने से पहले डायरेक्टर-प्रोड्यूसर को सोचना चाहिए था. हालांकि अब नया नियम आ गया है कि फौज पर फिल्म बनाने से पहले सेना से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट लेना होगा तभी फिल्म बन सकेगी. फौज देश में सबसे सम्मानित संस्था है, अगर इसे ही भ्रष्ट दिखाने की कुत्सित कोशिश करेंगे तो आज की पीढ़ी के बीच क्या संदेश जाएगा, कि हमारी सेना भेदभाव करती है ? कतई नहीं फिल्म बनाने की इस सोच को बदलना होगा।
अंत में पंकज त्रिपाठी जी के लिए कहना चाहुंगा कि…कि सर कुछ नयापन लाइए अब आपकी लंबी मुस्कान..हाथ सीधे करके इशारो में हां हूं करके बोलना बहुत हो गया…
