जब एक महान साहित्यकार और एक बेहतरीन फिल्मकार साथ आते हैं। तो कुछ ऐसी कहानियां आपके सामने आती है…जो आपको आपकी अपनी हकीकत से रूबरू कराती है। ऐसी हकीकत जिसे हम रोज देखते हैं, झेलते हैं, कोसते है लेकिन उसके लिए कुछ करने की हिम्मत नहीं रखते।
लेकिन मोहन जोशी ने रखी….मोहन जोशी ने दिखाई हिम्मत और उम्र के जिस पड़ाव में लोग अपनी जिंदगी पूरी समझकर थककर बैठ जाते हैं उस उम्र में उन्होने लड़ने की ठानी।
नसीम और अलर्बट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है जैसी समाज को आइना दिखाने वाली फिल्में बनाने वाले सईद अख्तर मिर्जा और साहित्य की दुनिया को तमस और अमृतसर आ गए हैं जैसे क्लासिक देने वाले भीष्म साहनी। ये दोनों साथ आए फिल्म मोहन जोशी हाजिर हो के लिए….नेशनल अवॉर्ड जीतने वाली 1984 की ये फिल्म मुंबई की चकाचौंध के नीचे दबी लोगों की तकलीफों उजागर करती है।
फिल्म में एक डायलोग है….जब हौसला टूटा है ना तो शरीर भी टूट जाता है। सच है….मजबूत हौसला आपको लड़ने की, खड़े रहने की, डटे रहने की हिम्मत देता है। और इसी हौसले के साथ मोहन जोशी अपनी पत्नी रोहिणी के साथ कोर्ट जाते हैं अपने चॉल के मकान मालिक केशव कपाड़िया के खिलाफ…ये अर्जी लगाने की जहां वो रहते हैं वो जगह इंसानों के रहने के लायक तो बची ही नहीं है। बीते 50 साल से वहां किसी तरह की कोई मरम्मत नहीं हुई है। पीने के पानी के पाइप में गटर का पानी लीक करता है और छत ऐसी है कि जरा सी तेज हवा में गिर सकती है। वो यहां बीते 70-75 सालों से रहते आए हैं। यहां से उनकी यादें जुड़ी हुई है। ऐसे में वो अपने मकान मालिक के पास जाते हैं दरख्वास्त करने की चॉल को रिपेयरिंग की कराने की जरूरत है। लेकिन मकान मालिक को तो वो चॉल वहां से हटाकर वहां हाउसिंग सोसाइटी बनवानी है। वो उन्हे भगा देता है। और इसके बाद मोहन जोशी को एक आदमी समझाता है कि कोर्ट जाओ वहां आपको इंसाफ मिलेगा और आपकी चॉल की भी मरम्मत हो जाएगी।

और बस यहीं से शुरू होती मोहन जोशी की कभी ना खत्म होनेवाली वो लड़ाई जिससे उन्हे इंसाफ मिलने की उम्मीद थी। लेकिन जब लड़ाई ही खत्म नहीं होगी तो इंसाफ कैसे मिलेगा।
हमारे यहां बड़ी मशहूर कहावत है काले कोर्ट और खाकी वर्दी जितनी दूरी उतना भला….और ये फिल्म इसी कहावत को पूरी तरह से सार्थक करती है। मोहन जोशी मकान की मरम्मत के लिए कोर्ट जाते हैं। मिलना होता है लालवानी से और मिल जाते हैं मिंगलानी…मिंगलानी वो हे जो जब मोहन जोशी को मिलता हैं तो उसके पास केवल एक मेज–कुर्सी होती है….केस शुरू होता है और फिर चलता चला जाता है, चलता जला जाता है। केस दायर होने के 6 साल बाद मिंगलानी के पास आज एक शानदार ऑफिस है। जिसमें तमाम सुख–सुविधा है। लेकिन मोहन जोशी की छत आज भी उसी हालत में है जैसी 6 साल पहले थी। पीने के पानी में टपकता गटर का पानी आज उसमें मिलने लगा है। छत को लड़कियों के सहारे गिरने से रोका गया है।
लेकिन, मोहन जोशी अब भी हार नहीं मान रहे। और ये बात उसके मकान मालिक को अच्छी नहीं लगती। वो कोई ना कोई बहाने से जोशी और परेशान करता है। कभी नए–नए मुकदमे दायर करके तो कभी चॉल के बाथरूम सील करा कर….लेकिन बढ़ता वक्त और अटका इंसाफ भी अब उनके हौसला पर भारी पड़ने लगा है। लेकिन वो अब भी डटे हुए हैं क्योंकि उनके साथ उनकी पत्नी रोहिणी है। लेकिन अंदर से वो भी अब थकने लगी है। खत्म होते पैसे, बिकते गहने और टूटती हुई उम्मीद उनको अंदर से कचोटने लगी है।
ऐसे में एक उम्मीद जगती है जब जज बोलते हैं कि वो खुद पूरी चॉल का मुआय़ना करने आएंगे। जिसके बाद वो चॉल वाले जो कभी मोहन जोशी के खिलाफ थे। उनका मजाक उड़ाते थे। उन पर ताना कसते थे आज उनकी तारीफों के पुल बांधने लगते हैं। उनके साथ खड़े होने की बात करने लगते हैं। 6 साल बाद मोहन जोशी की उस सोच को सलाम करते हैं जिसका कभी उन लोगों ने ही मजाक बनाया था।
लेकिन जज आएगा तो चॉल की हकीकत उसके सामने आ जाएगी। ऐसे में चॉल का मालिक केशव कपाड़िया चॉल का ऊपरी मेकअप करने आता है। सामने–सामने की सफाई, कुछ रंगाई–पुताई, पेड़–पौधे…ताकि और वक्त ले सके और केस को और घसीट सकें….जज आते हैं, देखते है और फैसला सुनाते है कि कोर्ट की तरफ से सिविल इंजीनियर आएगा और चॉल को लेकर पूरी रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वक्त लगेगा।

वक्त…..बस ये वक्त ही तो मोहन जोशी की उम्मीद को पूरी तरह से तोड़ देता है। पिछले 6 साल से वो वक्त ही तो दे रहे हैं। कोर्ट को, मरम्मत के इंतजार को, खुद को मिल सकने वाले इंसाफ को… लेकिन अब नहीं वो चॉल की हकीकत दिखाने जाते हैं उस लकड़ी को हिलाते हैं जिसके सहारे छत टिकी है। इस दौरान वो खुद की भी परवाह नहीं करते। और फिर, उसी टूटी छत के नीचे दबकर मर जाते हैं जिसकी मरम्मत के लिए उन्होने 6 साल पहले आवाज उठाई थी।
फिल्म कोर्ट की उस हकीकत को दिखाती जो वहां जानेवाला और उसमें पीसनेवाला ही जानता होगा। एक मुकदमा, हजारों तारीखें, पैसा खानेवाला वकील और इंसाफ के नाम पर बस इंतजार…. सईद अख्तर मिर्जा की उम्दा कहानी और भीष्म साहनी और दीना पाठक की एक्टिंग, आपको उनकी तकलीफों के करीब ले जाने में पूरी तरह से कामयाब होती है। आपको महसूस कराती है कि हर चकाचौंध के नीचे अंधेरा है, हर उम्मीद के नीचे टूटा हुआ हौसला है, हर इसांफ के पीछे थकावट है। जो आपको केवल बेबस बनाती है। और कुछ नहीं….
