वर्ल्ड सिनेमा में आज की फिल्म है 2011 की THE HELP
THE HELP की कहानी पास्ट रियलिटी चेक होने के साथ साथ एक इन्सपिरेशनल मूवी भी है। कैथरेन स्टॉकेट के इसी नाम से आये नॉवेल पर बेस्ड होने के बावजूद इसमें किताबी नहीं प्रैक्टिकल बातों को स्पेस मिला है। कुल मिलाकर द हेल्प प्यौर पीस ऑॅफ सिनेमा है जिसे देखने के बाद दुनियाभर की सिनेमाई सोच पर फक्र होता है।
एक बार फिर विश्व सिनेमा से आपका तार्रूफ़ कराते हुए बात होगी THE HELP की..कहानी सिविल वॉर के टाईम की है जब अमेरिका रंगभेद की समस्या से जूझ रहा था या यूं कह लीजिए कि अमेरीका का एक हिस्सा जिसे साउथ अमेरिका कहते हैं, एक ऐसे नरक में तब्दील हो चुका था जहां काले लोग ना जी सकते थे ना मर सकते थे।सिक्सटीज़ में नीगर्स के लिए नरक बन चुकी मिसीसिपी की एक बस्ती जैक्सन की कहानी है द हेल्प।
THE HELP शुरू होती है मिसीसिपी की एक हाईक्लास सोसाईटी जैक्सन से..इस इलाके में तमाम गोरे लोगों के घर है जिनमें मेड के बतौर नीगर्स औरते काम करती है जिन्हें हेल्प कहा जाता है। वैसे तो ये सारी मेड इन गोरे लोगों के घर का हर काम करती हैं मगर बावजूद इसके इनसे एक तरह का भेदभाव किया जाता है जिसकी वो आदि हो चुकी हैं। फिल्म के सेंटर में ऐबलीन नाम की एक मिडिल एज मेड है जिसकी ज़िंदगी इन गोरे लोगों के बच्चों को पालने में गुज़र रही है। मिनी जैक्सन नाम की एक दूसरी मेड भी है जो बहुत हाज़िर जवाब होने के साथ साथ अच्छा खाना बनाना जानती है। थोड़ी बहुत उंच नीच के साथ इन मेड्स की जिंदगी चल रही होती है मगर तभी मिनी जैक्सन को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता है। मिनी को सिर्फ इसलिए निकाला जाता है क्योंकि वो तुफानी बारिश की वजह से मेड्स के लिए बने बाहर के टॉयलेट को इस्तेमाल करने की बजाय अपनी मालकिन का बाथरूम यूज़ करती है।
मनी को बाद में नौकरी नहीं मिलती जिसकी वजह से उसे अपनी बेटी को इस दलदल में धकेलना पड़ता है।वहीं दूसरी तरफ जैक्सन की ही रहने वाली स्किटर जो कि एक यंग व्हाइट गर्ल है, मिसिसिपी यूनिवर्सिटी से अपना ग्रेजुएशन खत्म कर लौटी है। उसे ये बताया जाता है कि उसे बचपन से पालने वाली कांस्टैनटीन नाम की ओल्ड मेड ने नौकरी छोड़ दी, स्किटर को ये यकीन नहीं होता कि वो उसे बगैर बताए नौकरी छोडेंगी। इन्ही सब उलझनों के बीच स्किटर को कॉलम राईटिंग का काम मिलता है और स्किटर डिसाइड करती है कि वो इन ब्लैक मेड्स की कहानी इनके ही नज़रिए से एक बुक की शक्ल में सामने लायेगी।
ज़ाहिर है जब स्किटर ये बात ऐबलीन से शेयर करती है तो वो मना कर देती है क्योंकि उसे पता है कि अगर उसने या उसके जैसे बाकी मेड्स ने मुंह खोला तो उनकी रोज़ी रोटी पर संकट आ जायेगा। मगर बाद में रेसिज़म की एक घटना उसे झकझोर कर रख देती है और वो इस नतीजे पर पहुंचती है कि वो बतायेगी कि आखिर इन गोरे लोगों के बीच हर मेड को किस ज़िल्लत भरे माहौल से गुज़रना पड़ता है।एबलीन की ही तरह मिनी भी पहले अपनी कहानी को सामने लाने से बचती है मगर बाद में हिम्मत करके तैयार होती है।
इस बीच सिविल वॉर चरम पर होता है और सिविल राइट मूवमेंट के कद्दावर लीडर की हत्या हो जाती है। इस विरोधी माहौल में भी मेड्स मिलकर स्किटर की बुक को कंप्लीट करने में मदद करती हैं क्योंकि वो इस बात से एहसासशुदा है कि ये उनकी आवाज़ बन कर उभरेगी। स्किटर पब्लिशर से बात करती है और बताती है कि उसके पास उन्नीस कहानिया हैं मगर प्रकाशक के द्वारा शर्त रखी जाती है कि कम से कम बीस कहानियों के साथ ही किताब छापने की गुंजाइश बनेगी।दुविधा में फंसी स्किटर अपनी मेड यानि कि कांस्टैनटीन की कहानी को लिखने का निर्णय करती है और जब उसे कांस्टैनटीन के नौकरी से जुदा होने की असल वजह पता चलती है तो उसे बहुत दुख होता है।
इन सारी तकलीफों के बीच किताब छपती है और उसे अप्रत्याशित ढंग से कामयाबी मिलती है। लेकिन ये किताब जैक्सन में रहने वाली गोरी महिलाओं को रास नहीं आती क्योंकि जिन घटनाओं का उसमे जिक्र होता है वो जैक्सन की ही होती है। नतीजतन एक के बाद एक मेड्स को ग़लत आरोपों में फंसाकर या तो पुलिस के हवाले किया जाता है या फिर नौकरी से निकाले जाने का फरमान सुनाया जाता है।फिल्म के इन सीन्स मे डायरेक्टर टेट टेलर सबकी आंखे नम कर जाते हैं।
द हेल्प की कहानी पास्ट रियलिटी चेक होने के साथ साथ एक इन्सपिरेशनल मूवी भी है। कैथरेन स्टॉकेट के इसी नाम से आये नॉवेल पर बेस्ड होने के बावजूद इसमें किताबी नहीं प्रैक्टिकल बातों को स्पेस मिला है। कुल मिलाकर द हेल्प प्यौर पीस ऑॅफ सिनेमा है जिसे देखने के बाद दुनियाभर की सिनेमाई सोच पर फक्र होता है।
