रिपोर्टर- Sidharth Malhotra किसी ने आपको ऐसे रोल में देखने का सोचा भी नहीं था। फिल्म ‘जबरिया जोड़ी’ में आपका रोल एकदम अलग किस्म का है, तो कैसा रहा इस रोल को करने का अनुभव ?
सिद्धार्थ – इसी में तो मजा आया । शायद लोगों को लगने लगा था कि मैं सिर्फ एक तरीके के ही किरदार निभा सकता हूं । लोगों का ये मिथ तोड़ने के लिए इस किरदार से बेहतर कुछ नहीं हो सकता था । ये किरदार और फिल्म की कहानी बहुत ही दिलचस्प है । पकड़वा विवाह सब्जेक्ट पर मैंने कभी कोई पिक्चर नहीं देखी । फिल्म में मेरा बड़ा रंगीन ही किरदार है और उसपर पटना का लहज़ा जिसको देखने में लोगों को बहुत ही मजा आएंगा।
रिपोर्टर- क्या आप इस फिल्म से अपनी लवर बॉय की इमेज को ब्रेक कर रहें हैं ?
सिद्धार्थ- इमेज तो नहीं कहूंगा मैं क्योंकि आप एक विलेन देखो या ब्रदर्स देखो तो वो टफ ही रहे हैं किरदार। पर ऐसा टफ किरदार मैने पहले नहीं किया है और यहां पर भी परी के साथ रोमांस ही कर रहा हूं कौनसा एक्शन कर रहा हूँ। इसमे एक्शन भी है थोड़ा बहुत हालांकि लेकिन वो पूरा एक्शन नहीं है। पटना का लड़का है, बंदूक रायफल रखता है.. वहां का बाहुबली है और पॉलिटिक्स में जाने की इच्छा रखता है। तो मैं सोचता हूँ इमेज ब्रेक की बजाए एक नई इमेज जो है वो बनाने की कोशिश की जाए या एक नए दायरे में जाने की शुरुआत हो।
रिपोर्टर -क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति से मिले थे जो आपके किरदार जैसा रहा है रियल लाइफ में?
सिद्धार्थ- जी हमारे जो राइटर हैं संजीव के. झा उन्होंने इसपर काफी रिसर्च कर रखी है और उन्होंने बताया मुझे काफी सारे किस्से। जो मेरा किरदार है अभय सिंह का ये 3-4 लोगों की पर्सनैलिटी का मिलाकर बनाया गया है..जिनमे कुछ जेल में हैं और कुछ पॉलिटिक्स में हैं। तो हमने कहा कि एक पोलिटिकल रुट लेते हैं तो फ़िल्म में भी अभय सिंह का गोल यही है की बड़ा पॉलिटिशियन बनना है उसे। तो उसको एमएलए की कुर्सी चाहिए। ये एक असल इशू है, सीरियस इशू है। तो इसको लेकर हमने एक एंटररटैनिंग फ़िल्म बनाई है। जैसे मैं कोई डायलॉग बोलता हूँ तो एक स्टाइल में बोलता हूँ, और हम लड़को को उठा रहे है। तो लोगो को एंटरटेनिंग तो लगेगा है और एक समझ भी आएगी की क्या सही है और क्या गलत।

रिपोर्टर -सिद्धार्थ पहले आप देखें तो हिंदी सिनेमा में माना जाता था कि कोई भी गरीब या छोटा इंसान हो तो सीधा भोजपुरी बोलेगा। मगर आज जागृत हो रहे हैं सब और बदल रही है ये बात। और आज तो मराठी अभिनेता भी आसानी से भोजपुरी बोल देते हैं। तो क्या आपको लगता है ये भाषा सरल है पकड़ने में?
सिद्धार्थ- मैं खुद दिल्ली से हूँ तो शायद ये भाषा लहजा मेरे ज़हन में है है। दिल्ली यूपी और बिहार से जुड़ा हुआ है तो मैने सुनी हुई है। कितने सारे लोग हैं वहां से और मेरे दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज में भी कितने सारे बच्चे थे तो हाँ मैं समझता हूँ कि क्योंकि जानी सुनी भाषा है मगर आप जब स्क्रीन पर बोलते हैं तो मेहनत करनी पड़ती है जैसे उनके ‘श’ और ‘स’ का चक्कर है जैसे वो ‘सादी’ बोलेंगे न कि शादी। तो हमने कुछ दो-ढाई महीना मेहनत की, मैने खुद एक ट्यूटर भी रखा था जो मेरी टीम के साथ जाते थे और जब भी मौका मिला हिंदी में बात करते थे जो भोजपुरी, मगही, मैथिली का मिक्स है और क्योंकि ये हिंदी फ़िल्म है तो आप इसको एक्सेंट भी बोल सकते हैं।
रिपोर्टर -फ़िल्म में आप पटना से हैं और परिणीति बाहर से आयीं है।क्या फ्लेवर है इस किरदार के.
सिद्धार्थ- वो वहां की पढ़ी लिखी है और हम वहां के गंवार हैं, ये है फ़िल्म में।तो वही मजा था.. हम हर किरदार को एक अपना अलग लहज़ा देना चाहते थे। मैं और मेरी जो गैंग है, हम सारी उटपटांग हरकतें करतें हैं क्योंकि हमारा ये फ़िल्म में पेशा सा बन गया है जो कि हम सोचते हैं कि अच्छा काम है कि लड़की की शादी नही हो रही है क्योंकि वो दहेज नही दे पा रही है तो हम दूल्हे को ज़बरदस्ती बिठाएंगे फिर चाहे वो पनवाड़ी की दुकान से हो या कॉलेज से उसे उठाना है बस।
रिपोर्टर – आपकी नजर में ये सिस्टम कितना सही या गलत है?
सिद्धार्थ – देखिये सिस्टम तो दोनों ही गलत हैं। दहेज गैरकानूनी है और किडनैपिंग भी ।जैसा मैने कहा कि बहुत ही सीरियस मुद्दा है लेकिन हमारी कोशिश भाषण की जगह इसे बड़े एंटरटेनिंग तरीके से समझाने की रही है। तो उसमे आपको समझ आएगा की क्या सही है और क्या गलत है। तो होता शुरू ऐसे है कि लड़के वाले कहते हैं कि हमारा लड़का डॉक्टर है तो लड़की वाले कहते हैं कि जी हम बहुत खुश हैं कि हमारी बेटी की शादी ऐसे लड़के से हो रही है। फिर लड़के वाले कहते हैं कि हमें ये दे दीजिए लो दे दीजिये।उन्होंने आधी दे दी किसी तरह और जो बाकी आधी नहीं दे पाए उसमे शादी रुक जाती है। तो तभी लड़कीवाले या उसके बेचारे पिताजी जो हैं जाते है ऐसे बाहुबलियों के पास की क्या करेे तो वो कहते है उठवा देंगे। तो वहीं से ये सब शुरू हुआ।तो जो प्रथा है पकड़वा विवाह की शुरू हुई थी एक अच्छे विचार से मगर फिर ये भी एक नेगेटिव बिज़नेस बन गया। तो हम ये नही कह रहे हैं जबरिया काम अच्छा है। हम कह रहे हैं कि हमारे स्टेट में होता है और हमारे ही देश में होता है। तो ये इतनी यूनिक चीज़ जो होती है हमारे देश के 2 स्टेट्स में उसी को लेकर हमने ये प्रेम कहानी बनाई है।

रिपोर्टर – आपने इमेज की बात की तो जैसे आपने कोई एक इमेज को पकड़ कर नहीं रखा। तो क्या ये आपने सोच समझकर फैसला लिया?
सिद्धार्थ – बिल्कुल हाँ क्योंकि मुझे लगा कि यहां पर एक ट्रेंड है कि अगर किसी एक्टर को एक ज़ोन में देखा जाता है तो उसे वहीं सीमित रखा जाता है। तो उसमे एक किस्म की बोरियत होती है जो आपको रोकती है रिस्क लेने से। हालांकि जो मैने तरीका चुना है वो थोड़ा रिस्की है कि हर फ़िल्म में कुछ अलग करना और नया दिखना लेकिन मुझे खुद के लिए सही लगता है । मैं हर 6 महीने कुछ नया देख रहा हूँ.. सीख रहा हूँ,. कुछ चलते हैं और कुछ नहीं चलते और ये मेरी सोच हमेशा से रही है कि अपने आपको चैलेंज करना और कुछ नया दर्शाना है। जैसे इसमे हमने पटनहिया( पटना में बोली जाने वाली) हिंदी पर बहुत मेहनत की है ताकि वो नैचुरल लगे और जैसे वहां जो हिंदी बोली जाती है वो एक्सेंट से ही बोलते हैं।
रिपोर्टर-आपकी पहली 5-6 फिल्में अच्छी चलीं और फिर अभी की फिल्में कुछ खास नहीं कर पायीं.. तो इसे कैसे देखते हैं आप ?
सिद्धार्थ –मुझे लगता है कि इस बिज़नेस में प्रेडिक्ट करना बहुत मुश्किल है। जब मैने पहली दो पिक्चरें साइन की हंसी तो फंसी और एक विलेन तो उसमे लोगों को लगा कि हसी तो फंसी एक रोमांटिक कॉमेडी वाला ज़ोन हैं जहां मैं और परी रोमांस करेंगे और एक विलेन में खून खराबा होगा। लेंकिन जब रिलीज हुई तो उल्टा हो गया। एक विलेन ने इतना कुछ दिया मुझे और इतने नए रास्ते खुले। तो ये समझ कुछ पिक्चरों के बाद ही आती है और आई थिंक चलना या ना चलना नहीं बता सकते आप…तो पहली बार तो हमें खुश होना चाहिए कि हमें स्वीकार किया गया है वही बहुत है। क्यूंकि हर जनरेशन में कुछ ही लोग होते हैं जो स्वीकार किए जाते हैं हीरो और हीरोइन के तौर पर। और कोई भी सुपरस्टार के ज़िन्दगी में ऐसा दौर नहीं है जहा उसकी सारी फिल्मे हमेशा चलीं हों। मैं पर्सनली इसे मोटिवेशन की तरह लेता हूँ कि यार इसपर टाइम नहीं खराब करना सोचकर.. और काम करो, कुछ अलग करो अतरंगी करो। और वैसे मेरी तीनो फिल्मों में एक बड़ी ऑडियंस देखने आ सकती है चाहे वो जबरिया जोड़ी हो , मरजावां या शेरशाह हो तो अभी मैं बहुत एक्साइटेड हूँ।
रिपोर्टर -सिद्धार्थ ऐसा लगता है कि आप ग्रे शेड के किरदार में भी बहुत जंचेंगे। लोगो ने पहले पसंद भी किया है। तो क्या लगता है आपको।
सिद्धार्थ – हां ..बिल्कुल। अगर आप बॉक्स आफिस के हिसाब से देखे तो हां। लेकिन फिर कपूर एंड संस भी उन्हें पसंद आई थी । मुझे लगता है कि हर तरह के रोल के लिए एक अलग ऑडियंस है और उस तरह के रोल्स के लिए एक बड़ी ऑडियंस है।
रिपोर्टर -राखी भी आने वाली है तो उसमे क्या कहना है।
सिद्धार्थ- जी हमारे घर में कभी राखी नही बांधते हैं मेरे दादू के टाइम से। कुछ तो अपशगुन हुआ होगा तो हम टीका लगाते है। अब क्यों कहां वो में खुद पूछुंगा पिताजी से।
रिपोर्टर -आने वाले प्रोजेक्ट्स के बारे में क्या बाता सकते हैं आप? शेरशाह पर काम कैसा चल रहा है।
सिद्धार्थ – अब अगली जो आएगी वो है मरजावां। मैं और रितेश वापस आ रहे हैं। लव स्टोरी है बॉम्बे में। शेरशाह उसके बाद जिसकी थोड़ी सी शूटिंग मैने की है। अब मैं कारगिल जाऊंगा शूट के लिए जहा ये वॉर सच में हुई है। बहुत सारा काम हो गया है इसमे। हम सब फौजी जाने वाले हैं एक इंटरनेशनल टीम एक्शन में मदद करने वाली है। विष्णुवर्धन है जिन्होंने बहुत सी साउथ में फिल्मे बनाई है और धरमा प्रोडक्शन्स भी है। इस फ़िल्म से में 2-3 साल जुड़ा हुआ हूँ। इसे आप एक पैशन प्रोजेक्ट भी कह सकते हो और ये अगले साल आएगी। सो होपिंग फ़ॉर द बेस्ट।
