आज अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस है यानी वर्ल्ड थिएटर डे…एक्टिंग के दुनिया में लोहा मनवाने वाले कई शानदार कलाकारों ने करियर की शुरूआत थिएटर से की….जहां से मिला अनुभव उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ…बॉलीवुड में भी कई शानदार कलाकार थे और हैं जिन्होने अपने रंगमंच के अनभवों को पर्दे पर बेहद खूबसूरती से उतारा…पुराने वक्त के सोहराब मेरवानजी मोदी से लेकर मौजूदा दौर के नसीरउद्दीन शाह तक और मशहूर फिल्म एक्टर मनोज वाजपई से लेकर अपने अनलिमिटेड टैलंट के लिए जाने जानेवाली कल्कि कोचलिन तक…ये वो कलाकार है जिनके अभिनय में उनकी आत्मा की झलक दिखती है…और इसी मौके पर हम आपको बॉलीवुड के 4 बेहतरीन कलाकरों के उनके पहले थिएटर के अनुभव से रूबरू कराएंगे….तो आइए जानते हैं थिएटर से उनकी पहली मुलाकात की दास्तां…
Richa Chadha
मुझे मेरा पहला प्ले याद है….क्लास 11th में मैंने पहली बार एक प्रोफेशनल प्ले में बतौर एक्स्ट्रा काम किया था….हालांकि ये नाटक का मेरा पहला अनुभव नहीं था….लेकिन इस में NSD के भी कुछ लोग शामिल थे…ये एक हिंदी प्ले था जिसका नाम था ‘और कितने टुकड़े’ और इसे डॉ. कीर्ति जैन ने डायरेक्ट किया था…प्ले में एक्स्ट्रा के तौर पर काम करने के दौरान मुझे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के शानदार एक्टरों के बेहतरीन काम को काफी नजदीक से देखने के मौका मिला…और उस दौरान मुझे ब्रेस्से भी लगे हुए थे तो मुझे जितना कम एटेंशन मिला उतना ही अच्छा था…

Pankaj Tripathi
मेरा पहला प्ले प्रख्यात लेखक भीष्म साहनी की कहानी ‘लीला नंदलाल की’ था, जिसे एनएसडी के पासआउट विजय कुमार ने डायरेक्ट किया था…नाटक की कहानी एक स्कूटर पर बेस्ड थी जो खो जाता है और उसका मुख्य कलाकार उसकी शिकायत दर्ज कराने पुलिस स्टेशन जाता है…इसमें मैंने चोर और पुलिस दोनों के किरदार निभाए थे….ये मेरा पहला प्ले था और पहली बार मैंने पटना की ऑडियंस के सामने परफॉर्म किया था….वहां के लोग मुझे जानते तक नहीं थे लेकिन बावजूद इसके आश्चर्य की बात ये है कि मेरे दोनों किरदार उन्हे काफी पसंद आए….उस वक्त ना तो मैं एक बड़ा आर्टिस्ट था और ना ही मेरा डिक्शन उतना अच्छा था लेकिन फिर भी वहां ऑडियंस ने मुझे एनएसडी पासआउट समझ लिया…इतना ही नहीं दूसरे दिन वहां के लोकल न्यूजपेपर में मेरे नाटक के बारे में आर्टिकल छपा जिसमें मेरा भी जिक्र था…मेरे बारे में कहा गया कि मुझमें एक बड़ा एक्टर बनने का काफी पोटेंशियल और पॉसिबिलिटी है….इस आर्टिकल ने मेरे अंदर के इंटरेस्ट और कॉन्फिडेंस को बढ़ाने में काफी मदद की…ये बात है साल 1996 के नवंबर-दिसंबर की… हालांकि रंगमंच से मेरी पहली मुलाकात इससे काफी पहले हो चुकी थी…मेरे गांव गोपालगंज में छठ पूजा के दौरान एक लोकल ड्रामा ग्रुप नाटक का आयोजन करता था…और इसमें हिस्सा लेने के कारण मेरे पहले डायरेक्टर राघव शरण तिवारी थे….उस वक्त भी वहां लोगों को मेरी एक्टिंग पसंद आती थी…जिसके बाद मेरे अंदर एक्टिंग का कीड़ा घुस गया कि अब तो एक्टिंग सीखनी है और एक्टर ही बनना है….

Gulshan Devaiah
मेरा थिएटर से पहला एनकाउंटर 5 साल की उम्र में हुआ…दरअसल मेरी मां एक बेहतरीन स्टेज एक्टर थी और वो प्ले के सिलसिले में जहां भी जाती थी तो मैं उनके साथ जाता था…मुझे याद है कि वो एक मलयालम प्ले थे जिसमें मेरा एक बेहद छोटा सा पासिंग रोल था…मुझे और मेरी मां को फर्श पर रंगोली बना रहे एक शख्स की तारीफ करते हुए गुजरना था…मुझे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि मैं क्या कर रहा हूं लेकिन सिर्फ स्टेज पर होने के ख्याल से ही मैं बेहद खुश था…मुझे आज भी याद है कि मैंने ब्लू चेक्स की शर्ट और शॉट्स पहने थे और मां ने शिफॉन की साड़ी…ये साल 1982-83 की बात है… हालांकि मेरा थिएटर को लेकर मेरा पहला प्रोफेशनल एक्सपीरियंस साल 2007 में हुआ, जब मैंने बंगलुरू में ‘Burning Kurukshetra’ नाम का प्ले किया…प्ले इंग्लिश लैंगवेज में था और ये एक मोनोलॉग सीरीज थी…जो महाभारत के युद्ध के बाद क्या हुआ उसको लेकर एक काल्पनिक दास्तां थी….हर मोनोलॉग 15 मिनट का था…मेरा किरदार दुर्योधन का था…मेरे पिता मेरे प्ले को देखने आए थे और वो ऑडियंस में बैठकर मेरे हौसला बढ़ा रहे थे….नाटक के बाद सबने मुझे और मेरी पर्फोरमेंस की इतनी तारीफ की, कि एक एक्टर के तौर मुझे अंदर तक बेहद खुशी महसूस हुई….जिसके बाद मैंने मुंबई आकर अपने अभिनय के सपने को पूरा करने की ठानी…मैं कभी थिएटर आर्टिस्ट नहीं बनना चाहता था लेकिन थिएटर से मुझे इतना कुछ सीखने को मिला है….थिएटर मेरा टीचर है जिसने मुझे अपने सपनों को पूरा करने का कॉन्फिडेंस दिया….

Vijay Verma
मुझे FTII से रिजेक्ट कर दिया गया था….जिसके बाद मैं हताश और निराश वापस हैदराबाद लौट आया…फिर मैंने एक थिएटर ग्रुप ‘सूत्रधार’ के चार महीने के एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया जिसके आखिर में एक प्ले होना था….एक दिन रिहर्सल में लेट पहुंचने के कारण मुझे प्ले निकालकर बैक स्टेज का काम सौंप दिया गया….इतनी मेहनत करने के बाद बैक स्टेज, जिसके बाद मुझे थिएटर की अहमियत का पूरी तरह से अंदाजा हुआ….फिर बाद में मेरे डिस्पिलिन और डेडिकेशन को देखते हुए मुझे दूसरे प्ले में कास्ट किया गया…ये बतौर एक्टर स्टेज पर मेरा पहला अनुभव था, मेरी जिंदगी का सबसे सुकूनदायक लम्हा…जब मैं स्टेज पर गया तो चारों तरफ अंधेरे के बीचो-बीच खड़ा मैं और मेरे ऊपर स्पॉटलाइट….लेकिन इस स्पॉटलाइट को पाने के लिए मुझे घने अंधेरे में काम करना पड़ा…दरअसल थिएटर आपको अंधेरे से डील करना और खुद को ढूंढना सीखता है… मैं अपने रंगमंच और अपने शिक्षक के प्रति बेहद आभारी रहूंगा…

