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सिनेमा की सोच और उसका सच

मुझे तो हीरो ही बनना था :इरफ़ान ख़ान EXCLUSIVE INTERVIEW

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अक्सर हम सितारों को उसके मुकाम से जानते हैं.उसकी मेहनत से नहीं..आज हम एक ऐसे सितारे से आपकी मुलाकात करा रहे हैं जिसकी जिन्दगी संघर्षों की तपिश से निकलकर चमकदार बनी है। पीकू या फिर हालिया रिलीज़ करीब करीब सिंगल…सब कुछ बड़ा इमानदार सा लगता है इरफान खान में…FILMCITY WORLD ने जब उनसे सिनेमा में आने की वजह पूछी तो कहने लगे-
.बचपन से ही सिनेमा का फैसिनेशन था ..बड़े हुए तो लगा इसके अलावा कुछ और कर नहीं सकते..जुनून धीरे धीरे बढ़ने लगा..मन करने लगा इस आर्ट को सीखने का ..समझने का..देखने का..मिथुन चक्रवती की मृग्या देखकर एक्टिंग करने का मन किया था..मृणाल सेन की फिल्म थी मृग्या..उन दिनो फिल्में देखने को ज्यादा मिलता नहीं था..पड़ोसी के घर मृग्या टीवी पर आ रही थी वहीं देखी क्योकि हमारे घरों में टीवी तो था नहीं..पता नहीं क्या एक खुलापन था मिथुन दा में..बड़े सच्चे कलाकार लगे..कुछ इमेजेज अटक गयीं थी जहन में और बाद में बारी बारी से उनकी बाकी फिल्में भी देखने लगा लेकिन मृग्या वाला किरदार कहीं अटक गया था..जो कहानी असर करती थी उसको बार बार देख लिया करता था..जो कहानी पकड़ ले,,दिल लग जाये जिस कहानी में वहीं रुक जाता था..तो एक्टिंग में आने का तो मृग्या देखकर ही चस्का लगा।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा बनी ख्वाबगाह
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परिवार को मैने एक्टिंग के बारे में बताया नहीं था..मैं रास्ते ढूंढ रहा था..किसी दोस्त ने बताया था..ड्रामा स्कूल के बारे में.ये भी कहा कि नसीर साहब ओम जी वहीं के हैं…बहुत मुस्किल से एडमिशन होता है ये सब बातें भी जयपुर में दोस्तों का, जानने वालों का सर्किल कहा करता था..लेकिन दिमाग में बात आ गयी थी क्योंकि वही एक जगह थी जहां एक्टिंग सीखायी जाती थी हालांकि वहां भी फिल्म एक्टिंग के लिए जगह नहीं थी..मैने तय कर लिया जाना है वहां..वहां एडमिशन लिया फिर गाड़ी चल निकली।

मुझे तौर तरीके बदलने को कहा गया..
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इस आर्ट में वो शुरु से ही था..मेरे शुभचिंतक मुझे गाइड कर रहे थे..वो कहा करते थे..अलग अलग गेटअप में फोटोज़ मत दिखाओ निर्देशकों को..आप एक इमेज पर ध्यान दो..मगर ये राय मेरे लिए उबाउ हो गयी थी..क्योंकि जो मैं सोच रहा था वो इससे मुख्तलिफ था दो अलग अलग बातें थी यें मेरे लिए..और ये फिल्म इंडस्ट्री में ही नहीं बल्कि ड्रामा स्कूल में भी था..आपका अपना सोचने का ढंग है ़ड्रामा स्कूल अपने तरीके से मुझे ढालना चाहता था तो वहां भी बेचैनी थी..ये होता है किसी भी आर्ट के साथ कि आपको वो तौर तरीके अपनाने को कहा जाता है जो ज्यादा चल रहा हो उसके विपरित आपका अपना सोचने का ढंग होता है और इन्ही सबके बीच आपको अपना रास्ता बनाना होता है।

थियेटर एक्टर नहीं बल्कि फिल्म हीरो ही बनना था
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जो लोग भी नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा को जानते हैं वो ये बात बड़ी अच्छी तरीके से जानते हैं कि ड्रामा स्कूल में अगर आपने ये बता दिया कि आप फिल्मों में जाने के लिए एक्टिंग सीखने जा रहे हैं तो मुश्किल हो जाती..तो मैं शुरु से सोच के गया था कि फिल्म हीरो बनूंगा लेकिन ड्रामा स्कूल वालों को ये बात मैने नहीं बतायी थी क्योंकि फिर मेरा एडंमिशन नहीं होता। ये एक तरह से उस वक्त मेरी मजबूरी थी बात छुपाने कि क्योंकि थियेटर करने से मुझे परहेज़ नहीं था लेकिन तभी तक जब तक मैं अपने आप को निखार पाउं..बतौर प्रोफेशन कोई इरादा नहीं था।

गोविन्द निहलानी की टेलिफिल्म्स रही महत्वपूर्ण
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ज्यादातर लोग मुझे बहुत सारी रिसर्च के साथ मिलते हैं और कहते हैं कि तपन सिन्हा की फिल्म एक डॉक्टर की मौत में आपको देखा बहुत शानदार काम किया आपने लेकिन मेरे लिए इस फिल्म से पहले जो महत्वपूर्ण काम था वो था गोविन्द निहलानी जी के लिए , उन्होने ने भी मेरे साथ फिल्में बनायीं लेकिन वो टेलिविजन के लिए थीं जिन्हे टेलीफिल्म्स का दर्जा हासिल था। उसमें से एक ज़जीरे थी जिसमें रत्ना पाठक शाह मेरे साथ थीं, ये एक मशहूर नाटक पर आधारित फिल्म थी। दूसरी एक खास फिल्म थी वो भी एक नाटक पर ही थी जिसका नाम था फादर (पिता) नाम से वो टेलिफिल्म थी और इसी कड़ी में दृष्टी मैने की थी उनके साथ तो उन टेलिफिल्म्स को देखने के बाद मुझे तपन सिन्हा साहब ने बुलाया था और एक डॉक्टर की मौत तब मिली मुझे।

तिगमांशु धुलिया ने दी दिशा
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ज्यादातर लोग मेरी और तिशु ( तिगमांशु धुलिया) की दोस्ती को हासिल और पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों के साथ जोड़ कर देखते हैं लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि मैं एक वक्त में जब टेलिविज़न से ऊब चुका था तब तिग्मांशु ने मुझे उर्जा दी और उस वक्त स्टार चैनल के लिए तिशु बेस्टसेलर्स पर काम कर रहा था और उसने टेलिविजन की उस बोरियत को तोड़ने में मदद की…पहला बेस्टसेलर उसने मुझे लेकर बनाया था..अभी भी यूट्यूब पर लोग देखते हैं नाम था एक शाम की मुलाकात..चैनल वालों को बहुत उम्मीद थी कि तिशु कुछ बढ़िया बनायेगा और ये कहानी बनाने के बाद हम चैनल की प्रतिक्रिया इंतजार करने लगे..लेकिन कोई रिस्पॉन्स आया नहीं तो हमने खुद पता किया तो चैनल वालों ने बताया कि 3 मिनट छोटा पड़ रहा है एपिसोड तो कोई सीन डाल दीजिए..फिर तिशु ने एक सीन डाला जहां एक घर का एजेंट मुझे राजी करने के लिए आया कि वो घर में न रहूं क्योंकि उस घर की मालकिन पान खाती है और इस वजह से उसका चरित्र ठीक नहीं है तो आप घर बदल लो। लेकिन मेरे किरदार की दिलचस्पी उस घर की मालकिन में होती है तो ये बड़ा दिलचस्प सीक्वेंस डाला था तिशु ने और चैनल को हमारा काम कमाल का लगा फिर कई सारे बेस्टसेलर्स किये थे मैने।

हासिल से मिली तसल्ली
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इरफान इस बातचीत में कहते हैं कि उन्हे अपने किसी काम पर फक्र नहीं होता बल्कि तसल्ली होती है और हासिल फिल्म के साथ उन्हे ये सिनेमाई तसल्ली बहुत दिन बाद मिली थी। हासिल लोगों के जेहन में जिन्दा है और मेरे नजरिये से उस एक फिल्म ने पूरी एक जेनरेशन को प्रेरणा दी है..उस फिल्म से निकले ज्यादातर लोग जिस भी भूमिका में है बेहतरीन काम कर रहे हैं सफल हैं। उस फिल्म के साथ तिगमांशु का एक बड़ा फ्रेश इम्प्रेशन था एक छोटे से शहर को उसी के तरीके से पेश कर पाना। तिशु ने अपने अनुभव को कमाल की सिनेमाई शक्ल दे दी थी..ये एक ऐसी फिल्म थी जिसमे नयापन था साथ ही साथ अपने तरह की एंटरटेनमेंट वैल्यू थी।

पैसे और पैशन का टकराव हमेशा
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ये एक बहुत बड़ा टकराव है जिससे निकल नहीं सकते आप..ये टकराव है और दोनों का नेचर अलग है..इकॉनॉमिक्स और क्रियेटिविटी दोनों का स्वभाव बिलकुल जुदा है..लेकिन सिनेमा इसका संगम है इसलिए संतुलन आपको ढूंढना पड़ता है और ये रहेगा। कई बार आपको पैसे कम करने पड़ते हैं क्योंकि आपके दिल की चीज़ है और कई बार पैसे बढ़ाने पड़ते हैं क्योंकि आपके दिल की चीज नहीं है।

सिनेमा आश्चर्य में डालेगा
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सिनेमा की कई बातें न सिर्फ इससे जुड़े लोगों बल्कि दर्शकोंं को भी आश्चर्य में डालती रहेंगी और यही खूबसूरती है फिल्मों की..आप सब कुछ नहीं समझ सकते कोई फॉर्मूला नहीं है। मुझे याद है पान सिंह तोमर में मध्यप्रदेश की भाषा थी और शूट के बाद मैने खुद तिशु से बोला यार ये मोढ़ा मोढ़ी मुंबई में कौन समझेगा लेकिन तिशु ने कहा नहीं ये भाषा फिल्म में रहेगी और वही हुआ फिल्म हर तरफ पसंद की गयी उल्टा लोग मोढ़ा मोढ़ी वाले डॉयलॉग बोलते आपस में उस भाषा की खूबसूरती शेयर करते थे। यही सिनेमा की ताकत और सिनेमा के प्रति लोगों का प्यार है।

वॉरियर और आसिफ कपाड़िया का शुक्रगुजार रहूंगा
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द वॉरियर मेरे सबसे पसंदीदा फिल्म रही…और इस फिल्म ने मेरी जिन्दगी को दिशा दी। कुछ फिल्में या कोई काम ऐसा होता है जो आपको परिभाषित कर देते हैं । वॉरियर ने मेरे लेिए मेरा रास्ता दिया जो रास्ता मैं चाहता था । मेरी एक्टिंग की दुनिया को पूरी तरह बदल देने में आसिफ कपाड़िया का बहुत बड़ा हाथ है जिन्होने वॉरियर जैसी बेहतरीन फिल्म उस वक्त मुझे दी जब मुझ पर ज्यादा लोग भरोसा नहीं करते थे । वो ऐसा वक्त आयी थी जब मुझे लगने लगा था कि इतने साल से मैं एक्टिंग कर रहा हूं लेकिन जो एक्टिंग मैं ,सोच कर आया था वो तो ये नहीं है। मुझे आनंद नहीं आ रहा था लेकिन अचानक ये फिल्म आयी और मेरे कलाकार को खुश करके चली गयी और उसके बाद मैने वही फिल्में की जिसमें मुझे मजा आये।

इरफान खान अपनी बातचीत में कुछ छुपाते नहीं है और हमे उम्मीद है कि आपको इस बातचीत के जरिए अपने पसंदीदा सितारे के अनछुए पहलु जानने का मौका मिला हो। इरफान की आने वाली फिल्मों में टॉम हैंक्स के साथ हॉलीवुड फिल्म इनफर्नो है साथ ही वो एक बांग्लादेशी फिल्म डूब कर रहे हैं और इसके अलावा सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियन में भी वो नज़र आयेंगे।

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