शहर शहर समीक्षक( ARTICLE 15) : हमें हीरो की नहीं उन लोगों की जरूरत है जो हीरो का इंतजार करना बंद कर दें
हम लगातार एक प्रयोग कर रहे हैं….अलग अलग शहर से जुड़े फिल्म उत्साहियों की राय किसी खास फिल्म पर आपके सामने रखने का..इस बार पढ़िए लखनऊ की प्राची क्या सोचती हैं ARTICLE 15 के बारे में..
ARTICLE 15- (spoiler alert)
आपने, मैंने, हम सब ने महाभारत कभी ना कभी देखी, सुनी या पढ़ी है। तो अगर आपको याद होगा तो उसमें एक किरदार था अभिमन्यू का। अभिमन्यू जो चक्रव्यूह को भेद सकता है, उसने अपनी मां की कोख में चक्रव्यूह को भेदने की रणनीति सुनी थी। लेकिन आखिर तक आते–आते उनकी मां सो गई और वो उससे निकलने का अंतिम रास्ता नहीं सुन पाए।
ARTICLE 15 भी आपको एक चक्रव्यूह से रूबरू कराती है। जातीय चक्रव्यूह, जिसके बारे में सबने सुना है, जाना है, पढ़ा है लेकिन पूरी उससे निकलने का तरीका किसी को मालूम नहीं। महाभारत के रणक्षेत्र में जब अभिमन्यू चक्रव्यूह में फंसते है तो आखिर तक लड़ते है लेकिन अंत में आकर हार जाते हैं। फिल्म में उसी अभिमन्यू से मिलता–जुलता नजर आता है आयुषमान खुराना का किरदार।

अनुभव सिन्हा की फिल्म ARTICLE 15 आपको वो सब दिखाती है जो हम रोज किसी ना किसी चैनल या अखबार में देखते–पढ़ते हैं। ग्रामीण इलाकों में धर्म–जाति के नाम पर हत्याएं, छोटी–छोटी और बेहद मामूली बातों पर बेबसों की पिटाई, सत्ता और पावर के लालच में दोस्ती और दुश्मनी। ये वो ही बातें है जिन्हें हम देखते–सुनते और पढ़ते हैं। इन खबरों पर थोड़ी देर तरस, गुस्सा और चिंता होती है और फिर हम भूल जाते हैं।
देश की मेट्रो सिटी में पला–बढ़ा और विदेशों में रहा अयान रंजन अपने पिता के कहने पर सिविल सर्विसेज ज्वाइन करता है। उसको पहली पोस्टिंग उत्तर प्रदेश के लालगांव में मिलती हैं। लालगांव का परिवेश उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से काफी मिलता जुलता है। जहां के जातीय समीकरण अब भी दिल्ली–मुंबई–लखनऊ जैसे कैपिटल शहरों से कोसों दूर और अलग हैं। आज भी यहां ऊंची जाति और नीची जाति के बीच की खाई जस की तस है। साथ काम तो कर सकते हैं लेकिन साथ खा–पी नहीं सकते, साथ उठ–बैठ नहीं सकते और अपने हक की आवाज तो बिलकुल नहीं उठा सकते। हक की आवाज उठाने पर सजा मिलती है और इसी सजा के जरिए आर्टिकल 15 आपको उस सोच से मिलवाती है जो हमारे देश के डेवलेप करने के बावजूद भी उसकी मानसिकता को डेवलेप नहीं होने दे रहा है।
लालगांव में एक बह्मदत्त हैं जो ऊंची जाति के हैं और एक जाटव है जो नीची जाति के हैं। बह्मदत्त वो शख्स है जो इलाके में सांप्रदायिक शांति बनाने की कोशिश में रहते हैं फिर चाहे इसके लिए उन्हें रेप केस को हॉनर किलिंग ही क्यों ना बनाना पड़े, या फिर खुद ही रेप क्यों ना करना पड़े। और जाटव वो है जो बिना कुछ कहे बह्मदत्त के पीछे–पीछे रहते आए हैं क्योंकि उनकी जाति उनको आगे आने और आवाज उठाने का हक नहीं देती।
लालगांव में हत्या होती है। अपनी दिहाड़ी में पैसे बढ़ाने की मांग पर तीन में से दो दलित लड़कियों को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता है। पुलिस समेत पूरा इलाका जानता है कि ये सब किसने और क्यों किया लेकिन बोलने की हिम्मत किसी में नहीं होती। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि होती है लेकिन डॉक्टर पर उसे बदलने का दबाव बनाया जाता है। मुख्य मुजरिम को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की जाती है, क्यों, क्योंकि वो रसूखवाला हैं, ऊंची जाति का है, सत्ता के गलियारों में उठना–बैठना है। दलितों का भी एक नेता है जो उनकी हक की आवाज ऊपर लाने के लिए उठा था लेकिन ‘सत्ता की तो अलग ही जात होती है’।

इधर मारी गई लड़कियों के पिता पर ही हॉनर किलिंग का आरोप मढ़ दिया जाता है। दोनों के समलैंगिक बताकर फाइल क्लोज करने की कोशिश की जाती है। इधर बतौर अपर पुलिस अधीक्षक इलाके की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लिए अयान के लिए ये सब समझना काफी मुश्किल है। हर बार कहीं ना कहीं से कोई ना कोई सोच अयान की विचारधारा से टकराती है, इसीलिए वो खुद उतरता है इस जातीय दलदल में पूजा को ढूंढने, पूजा वो ही तीसरी लड़की जो लटकायी तो नहीं गई लेकिन गायब है और उसे ढूंढने के दौरान अयान मिलता है उन तमाम किरदारों और ख्यालों से जो उसे ये सोचने पर मजबूर कर देता है कि क्या सच में हम आगे बढ़ रहे हैं, क्या सच में हमारे शहरों की तरह हमारे गांवों में भी बदलाव आ रहा है। सोच का बदलाव, विचार का बदलाव, विचारधारा का बदलाव। फिल्म में कई ऐसे डायलोग हैं जो आपको रियालटी चेक देते हैं। फिल्म से निकलने के बाद तक आपके दिमाग में गुंजते रहते है।
मैं खुद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से ताल्लुक रखती है। हिंदू होने के नाते हिंदू धर्म के चारों वर्ण के बारे में पता है लेकिन कभी उसके चालीस भेदभाव से आमना सामना नहीं हुआ। मां–बाप बताते आए हैं कि गांवों में अभी भी जाति के आधार पर लोगों के लिए प्लेटे अलग–अलग रखी जाती है, अलग–अलग पानी के कुएं होते हैं। लेकिन जिस तरह से दूसरों को एडवाइस देना खुद उस पर अमल करने से ज्यादा आसान होती है। ठीक वैसे ही इस जातीय असमानता को धिक्कारना, उसमें रहकर उससे बदलने की कोशिश के आगे कुछ नहीं हैं और अनुभव सिन्हा की आर्टिकल 15 ये ही फर्क समझाने की एक कोशिश है।
