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पुण्यतिथि विशेष: रवि बासवानी जिनकी दहलीज तक सिनेमा खुद चलकर आया

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जाने माने कलाकार रवि बासवानी की आज पुण्यतिथी है. हम में से ज्यादातर लोग मरहूम रवि जी को अलग अलग वजहों से याद कर सकते हैं. जिसमें बड़ी संख्या उन लोगों की होगी जो उन्हें चश्मे बद्दूर, जाने भी दो यारों या दूरदर्शन के सीरीयल इधर उधर से याद कर सकते हैं..बहुत नया अगर याद करना चाहें तो बंटी बबली में वो पहले शख्स थे जिन्हें ठगा जाता है. ये नया रेफरेंस इसलिए ताकि उनके बारे में जानने की दिलचस्पी कुछ और लोगों को भी हो जो उस जमाने के नहीं.

जाने भी दो यारों की टीम

29 सितंबर 1946 को दिल्ली में जन्मे बासवानी ने दिल्ली में ही अपने स्किल्स पर काम करना शुरू किया. वो दिल्ली के किरोड़ी मल कॉलेज की ड्रामा सोसाइटी का हिस्सा रहे. दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज में जिस वक्त सिर्फ शेक्सपीयर के अंग्रेजी नाटकों का मंचन होता था उस दौर में उन्होने बल्लभपुर की रूप कथा नाम के हिंदी नाटक से धूम मचा दी.

जरा सोचिए जिस कलाकार की कोई खास एक्टिंग ट्रेनिंग नहीं हुई थी, उसने खुद से अपने आप को इस कला में निखारा. वो बराबर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के छात्रों के साथ मिलते चर्चा करते. दिल्ली के अलग अलग थिएटर सोसाइटी से जुड़े रहे यही नहीं एलीट मॉडर्न स्कूल बाराखंबा रोड में थिएटर के बारे में पढ़ाने का काम भी किया.

जाने भी दो यारों किताब नाम की किताब में लेखक जय अर्जुन सिंह लिखते हैं कि रवि ने उनसे बातचीत में बताया कि शुरुआती दौर में उन्हें बंबई जाने का ख्याल नहीं आया था. वो मानते थे कि अगर सिनेमा उनके लिए बना है तो वो उनतक चलकर आएगा न कि वो वहां जाएंगे.

दिल्ली के थिएटर सोसाइटी में लगातार जुड़े रहने से उन्हें नसीरुद्दीन शाह के बारे में जानने का मौका मिला. सई परांजपे की 1980 में आई फिल्म स्पर्श में किरदार की तैयारी के दौरान रवि की मुलाकात नसीर साहब से हुई. नसीर फिल्म में एक अंधे व्यक्ति का रोल निभा रहे थे और इस दौरान स्पर्श की कहानी पढ़ने का मौका भी रवि को लगा. रवि ने नसीर से कहा कि वो इस फिल्म से जुड़ना चाहते हैं भले ही उन्हें स्पॉट ब्वॉय के तौर पर ही काम क्यों न मिले.

इस तरह उन्हें फिल्म के प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में काम मिल गया जो कम दिनों का था फिर वो दिल्ली लौट गए. इस छोटे से अंतराल में फिल्म की निर्देशक और पारखी नजरों वाली सईं परांजपे को उनमें कुछ खास नजर आया..सईं ने फिल्म खत्म की और हाथ से लिखे लेटर के जरिए अपनी अगली फिल्म धुंआ धुंआं में काम करने का प्रस्ताव रवि तक भेज दिया जिसमें फारुख शेख भी थे. सईं ने लिखा.

”अगर तुम्हारी तरफ से हां है तो 4 सितंबर को मुंबई में शूट है. राजधानी का किराया हम देख लेंगे लेकिन अगर नहीं आ सकते तो कोई बात नहीं लेकिन मुझे जल्दी बताओ”

चश्मे बद्दूर का दृश्य

रवि ने हां कही..मुंबई आ गए..बाद में यही फिल्म चश्में बद्दूर नाम से दर्शकों के सामने आई और उसके बाद जो हुआ वो हर फिल्म प्रेमी जानता है. रवि का काम सबको भा गया.इसी फिल्म ने बासवानी के लिए बेहतर सिनेमा के दरवाजे खोल दिए. कुंदन शाह को उनका काम इतना पसंद आया कि उन्होने जाने भी दो यारों में उन्हें फोटोग्राफर सुधीर का रोल ऑफर कर दिया जिसके लिए 1984 में उन्हें बेस्ट कॉमेडियन का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला. ये किरदार जाने माने फिल्मकार सुधीर मिश्रा के नाम पर रखा गया था और नसीर साहब का नाम विनोद विधु विनोद चोपड़ा के नाम पर जो कि कुंदन शाह के साथ FTII पुणें में थे.

लेकिन बासवानी को सिर्फ कॉमिक रोल के कारण ज्यादा सराहा गया और ये दो फिल्में हीं ज्यादा चर्चा में रहती हैं कोई भी उनके छोटे से सफर के बड़े योगदान को नहीं पहचानता. वो रवि ही थे जिन्होने 5 लाख के बजट वाली जाने भी दो यारों में सबसे पहले दिलचस्पी दिखाई. सेट पर दिग्गज कलाकारों जैसे सतीश शाह, पंकज कपूर और नसीर के बीच होने वाले टकराव को भी वो थिएटर के अपने अनुभवों से टालते बात करते सभी को साथ लेकर चलते. लेकिन अफसोस रवि जब अपने निर्देशन की तैयारी में थे एक खास कहानी पर काम कर रहे थे यहां तक कि शूटिंग के लिए लोकेशन तक तय कर ली थी..उसी वक्त 2010 में महज 63 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. आज उन्हें फिल्मसिटी वर्ल्ड ने याद किया.

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