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जब प्रेस ने अपनी लड़ाई मिलकर लड़ी: “THE POST” Review

विश्व सिनेमा में सम्मान की नजर से देखी जाने वाली फिल्म द पोस्ट( THE POST) की विशेष समीक्षा कर रहें हैं प्रशान्त प्रखर

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“The job of the press is to serve the governed, not the governors”

द पोस्ट (THE POST)  में ये लाइन बड़े जरूरी मौके पर है…द वाशिंगटन पोस्ट अखबार सरकार के खिलाफ़ सबसे उंची अदालत में फ्रीडम ऑफ प्रेस की जंग जीत चुका होता है…अखबार के दफ्तर में सभी दबाव से मुक्त जश्न में डूबे हैं..70 का दशक और अखबार की एक कर्मचारी इस फैसले की जानकारी फोन पर ले रही है….पूरी जानकारी होने पर सुप्रीम कोर्ट ने जो बात अपने जजमेंट में टिप्पणी के तौर पर कही होती है वो यही है…

“The job of the press is to serve the governed, not the governors”

चर्चित पेंटागन पेपर लीक्स मामले पर बनी द पोस्ट (THE POST) बात करती है फ्रीडम ऑफ प्रेस वर्सेज़ नेशनल सिक्युरिटी की..इसके बैकग्राउंड में है अमेरीकी इतिहास के सबसे विवादित राष्ट्रपतियों में से एक रिचर्ड निक्सन जो अमरीकी इतिहास में इकलौते राष्टपति रहे जिन्हे वॉटरगेट स्कैंडल की वजह से इस्तीफा देना पड़ा था..फिल्म अपनी आखिर में वॉटरगेट स्कैंडल की झलक भी दिखाती है..वैसे वॉटरगेट स्कैंडल पर एक बहुत ही शानदार फिल्म “ऑल द प्रेसिडेंट्स मेन” बन चुकी है। द पोस्ट बात करती है उस विवादित दस्तावेज़ के बारे में जो आधिकारिक दस्तावेज़ था अमरीका-वियेतनाम वॉर के बारे में जिसे लेकर अमरीकी इतिहास के चार राष्टपतियों ने तीस साल तक लोगों को अंधेरे में रखा। इन 7000 पन्नों के क्लासिफाइड डाक्यूमेंट को अमेरीकी सरकार के आधिकारिक डिफेंस एक्सपर्ट डेनियल ने देशहित में  प्रेस को सौपा..इसका पहला ब्यौरा द न्यूयॉर्क टाइम्स ने पब्लिश किया..जिसके बाद नेशनल सिक्युरिटी का हवाला देकर सरकार ने न्यूयॉर्क टाइम्स को बाकी के दस्तावेज़  छापने पर पाबंदी लगा दी..ये मौका था दबाव में चल रहे द वॉशिंगटन पोस्ट अखबार के पास कि वो इस दस्तावेज़ को छापकर मार्केट में अपनी पकड़ बना ले..एक बड़ी लीड स्टेट में ले ले। लेकिन खतरा वही कि सरकार अखबार को तबाह कर देगी…एडिटर्स को जेल जाना पड़ेगा..फिल्म इस प्वाइंट तक आपको बिना किसी शोर शराबे के लाती है..और यहां से आप न्यूज़ डेस्क की टेंशन, उनके दबाव..सिद्धांत और व्यवहार के बीच फंसे पब्लिशर्स..मीडिया हाउस के इनवेस्टर्स के दवाब से लेकर..एक एक फैसले के लिए जिरह को महसूस कर पाते हैं तो इसे डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग की काबिलियत मानिए..एक्टर्स का शानदार काम मानिए…

फिल्म THE POST कई और पहलुओं पर भी बात करती है..मसलन वीमन लीडरशिप..फिल्म में मेरा फेवरेट सीन वो है जहां द वॉशिंगटन पोस्ट की मालिक कैथरीन की योग्यता उनके निर्णय लेने की क्षमता पर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स सवाल उठा रहे हैं..वो उनके महिला होने को उनकी कमजोरी बता रहे हैं..और कैथरीन आकर कहती हैं..शुक्रिया इतने फ्रैंक ओपिनियन के लिए। आप देखते हैं कि कैसे एक एडिटर के लिए न्यूज उसकी जिन्दगी का मकसद बन जाती है..कैसे न्यूज मेकिंग टीम के लिए उनका करियर..उनका  भविष्य सब कुछ वो खबर बन जाता है..वो जानते हैं कि इस सच के सामने आने के बाद उनकी जगह जेल में होगी , उनका अखबार बंद कर दिया जायेगा..लेकिन इन सबके बावजूद वो सच के साथ खड़ा होना पसंद कर रहे हैं..क्योंकि सच के साथ बहुत कम लोग हैं..फिल्म सवाल करती है कि आखिर जनता के लिए प्रेस सरकार से जवाब नहीं मागेंगा तो मागेंगा कौन..कैसे हर देश के महान पत्रकारों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए उस सच को सामने लाने के लिए अपनी परवाह नहीं कि जिसकी वजह से किसी भी डेमोक्रेसी में उसे एक मजबूत पिलर के रूप में पहचान मिली। फिल्म बात करती है प्रेस को सरकार से मिलने वाले भ्रम की…प्रेस पर वेस्ट में बहुत सी अच्छी फिल्मे बनीं हैं…उनमें द पोस्ट कमजोर जरूर है लेकिन उसके बावजूद आज के वक्त की सबसे जरूरी फिल्म है…मुझे द पोस्ट पसंद आयी लेकिन ये स्पॉटलाइट, द इनसाइडर जैसी सिनेमैटिक मजबूती वाली फिल्म नहीं है..ये अपने स्टाइल की है जिसमें स्पॉटलाइट की छाप है लेकिन ये कहानी दूसरी है.प्रेस की आज़ादी को नेशनल सिक्युरिटी के भ्रम के सहारे कंट्रोल करने की सरकार और ब्यूरोक्रैट्स की रणनीति..कानूनी पेचीदगी..और प्रेस की एकता ..और आज के दौर में वाकई में प्रेस के मायने समझाने वाली फिल्म है द पोस्ट ..स्टेेट वर्सेज़ प्रेस की इस जंग में जीत प्रेस की ही होगी लेकिन बगैर किसी शोर शराबे के..जब सर्वोच्च अदालत का फैसला आयेगा तो एक बात जो आपके जहन में अटक जायेगी वो है…अदालत की प्रेस की आजादी के मद्देनजर दी गयी टिप्पणी …
“The job of the press is to serve the governed, not the governors”
जब प्रेस ने आज के वक्त में अपनी साइड तय कर ली है..जब सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले जर्नलिस्ट के रवैये में तर्क की जगह फ्रस्ट्रेशन ज्यादा नजर आने लगी है तो ऐसे वक्त में सभी को देखनी चाहिए द पोस्ट (THE POST ).

 

 

 

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