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विश्व सिनेमा विशेष ‘THE IRON LADY’ : महिलाओं को तमगा यूं ही नहीं मिलता!

THE IRON LADY पर ये लेख बस एक कोशिश भर है ये बताने की, कि हमेशा पुरूषों के लिए पदवी बहाल करने वाले महौल और मशीनरी को महिलाओं की क्षमता का पारितोषिक देने से हिचकना नहीं चाहिए।

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विश्व सिनेमा विशेष ‘THE IRON LADY’- ना जाने कितनी बार लौह पुरूषों के बखान सुने है  हमने..कुछ को नहीं बहुतों को ये हैसियत नसीब होती रही है..कुछ वाकई के आयरन मैन थे तो कुछ पर थोप कर बेवजह का शोरगुल किया गया। लेकिन कभी सोचा कि औरतों को ऐसे तमगे देने में कंजूसी क्यूं? हमें महिलाओं को बड़ी हैसियत देने का मन क्यों नहीं करता? जी हां..मन..हमारा मन करेगा तो तुम बनोगी..बढ़ोगी और नहीं तो नाक रगड़ोगी..दुनिया बदल दोगी तो भी हैसियत और हक़ से महरूम रखेंगे। ईमानदारी से कहूं तो मुझे भी मेरी ज़िंदगी में शुमार महिलाओं को किसी तरह का तमगा देने में परहेज़ ही भाता है। लेकिन इस बचत के बावजूद दुनिया के हर हिस्से में ऐसी महिलाएं रही हैं जिन्हें पुरूषों के बिलकुल बराबर के नाम मिले। और मैं यहां कहना चाहूंगा कि ये नाम उन्हें नसीब नहीं हुए बल्कि ये नाम उन्होंने बहुत कुछ साबित कर के हासिल किये और जब ज़िंदगी की दुश्वारियों की तपन से कोई महिला खुद को साबित करे तो श्रेष्ठ तमगे का वो सूर्य प्रकाश दुनियाभर के लिए दस्तूर बन जाता है और यकीनन तभी आयरन लेडी ये हैसियत गढ़ी जाती है..और इन्हे धारण करने वाली स्त्रियां साधारण तो कतई नहीं होती।

साल 1970..ब्रिटेन के आमचुनाव में कंज़रवेटिव पार्टी लौटी थी। प्रधानमंत्री टैड हीथ सत्तानशीं हुए..तब 45 वर्षीय मारग्रेट थैचर नाम की एक महिला शिक्षा मंत्री की बतौर ज़िम्मेदार बनी। वो लोकप्रिय नहीं..ज़िद्दी नेता के तौर पर पहचान बना रही थी। 7-11 साल के बच्चों को स्कूल में मिलने वाले दूध पर रोक लगाकर वो कुख्यात हुईं मारग्रेट थैचर..मिल्क स्नैचर के नारों से।

ये आगाज़ भर था..साल 1975 में पर्यावरण मंत्री के ओहदे पर होते हुए अपनी ही सरकार के खिलाफ खड़ी हो गईं। चुनाव हुए और हीथ को हरा दिया। वो ब्रिटेन के इतिहास में पहली किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी की पहली और इकलौती नेता साबित हुई। थैचर ब्रिटेन के इतिहास की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं।

मार्गरेट थैचर

मारग्रेट थैचर के जीवन पर साल 2011में एक फिल्म आयी नाम था आयरन लेडी..ये तमगा मारग्रेट थैचर को 1976 में अपनी उस स्पीच के लिए मिला जिसमे सोवियत संघ की दमनकारी नीतियों की जमकर मुखालफत की थी। ऐसा करने का माद्दा सिर्फ उनमे ही था ये भी सच है।खैर बायोपिक फिल्म आयरन लेडी में मारग्रेट थैचर की मुख्य भूमिका में हॉलीवुड की शानदार अदाकारा मर्लिन स्ट्रीप ने निभाई, वो खुद भी इस किरदार को सबसे यादगार किरदारों में से एक मानती हैं। वैसे द आयरन लेडी ये फिल्म एक सेमी बायग्रॉफिकल फिल्म कही जा सकती है क्योंकि ये पूरी तरह से मारग्रेट थैचर के जीवन को कवर नहीं करती। खैर ऐसा होता भी है कि किसी की पूरी ज़िंदगी को एक फिल्म में जगह दे पाना मुश्किल तो होता ही रहा है। Phyllida Lloyd की डायरेक्ट की हुई आयरन लेडी दूसरी बायोपिक की तरह ही बोर है लेकिन ये अपने उबाउपन में भी शानदार साबित होती है।फिल्म जहां से शुरू होती है वो दृश्य ऐसा है जो शायद बायोपिक फिल्मों की आदत जैसा नहीं है। बूढ़ी थैचर एक साधारण सी दुकान से दूध खरीदती हैं और इसके बाद अकेले चल रही हैं। वो सोच रही है कि अतीत में जो कुछ हुआ, जो हैसियत और रूतबा उन्हें नसीब हुआ उसकी कीमत तो कहीं ना कहीं चुकाई गयी है। दरअसल वो कीमत फिल्म में ज़बरदस्ती बतायी तो नहीं गई लेकिन हां उसका एहसास आपको शुरूआती सीन्स में इसलिए करा दिया गया है ताकि आप समझ पायें इस बात को कि पॉवर के लिए पे करना एक कंडीशन्स अप्लाय जैसा है। एक पति है जो अब बस यादों में जी रहा है, उन यादों में मारग्रैट थैचर को बहुत कुछ मिल रहा है वो सब कुछ जो वो शायद पति के जीते जी नहीं देख पायी थीं या देखने की फुर्सत नहीं थी। उनकी उस मसरूफियत में पति ये नहीं समझ पाया कि आखिर वो अपनी पत्नी के इस राष्ट्रीय हैसियत पर जश्न मनाये या शोक?एक जिंदा बेटा है जो साउथ अफ्रीका में रहता है और ऐसा रहता है मानो कि मां बस है, इस बेटे का नाम मार्क है, बेटी कैरोल के लिए मां महत्वहीन है। वो शायद बेटी बनी लेकिन मां तो आयरन लेडी थी उसे क्या हक था की लाडली के लिए मोम बने। वो तो आयरन लेडी जैसे ही जी सकती थी। फिल्म की जो आत्मा है वो ओजस्वी है, वो इतने स्पष्ट तरीके से पॉवर की पर्सनल प्राइस वाली बात कह जाती है कि फिल्म बहुत प्रभावी और महान बनती है।वैसे फिल्म हो या असलियत..आयरन लेडी कुछ ही हो पाती हैं। और जो होती हैं वो मारग्रैट थैचर से लेकर इंदिरा गांधी जैसे नामों से मुकाम पाती है।

मेरा ये लेख बस एक कोशिश भर है ये बताने की कि हमेशा पुरूषों के लिए पदवी बहाल करने वाले महौल और मशीनरी को महिलाओं की क्षमता का पारितोषिक देने से हिचकना नहीं चाहिए। साथ ही ऐसे ओहदे की कीमत चुकाने वाली महिलाओं की असल ज़िंदगी पर फिल्में बनते रहना सिनेमा के लिए शुभ है।

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